The Ashes: क्रिकेट की सबसे पुरानी प्रतिद्वंदता के इतिहास में शामिल है एक प्रेम कहानी, कैसे पड़ा 'एशेज' नाम
The Ashes History: क्रिकेट के दो सबसे पुराने प्रतिद्वंदी इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया (England vs Australia) के बीच एशेज सीरीज 16 जून से शुरू होने जा रही है। इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच 1877 में पहला टेस्ट मैच खेला गया था लेकिन तब एशेज सीरीज नहीं होती थी।
'एशेज' नाम का इतिहास काफी रोमांचक है क्योंकि इस कहानी में कई रोमांचक मोड़ हैं जिसमें दो देशों के बीच आपसी कड़वाहट से लेकर एक प्रेम कहानी भी शामिल है। आइए जानते हैं एशेज नाम से लेकर एशेज कलश की कहानी क्या है।

असली कहानी 1882 में शुरू हुई
विश्व क्रिकेट की सबसे बड़ी सबसे पुरानी, प्रतिष्ठित और चर्चित प्रतिद्वंद्विता की असली कहानी 1882 में शुरू हुई थी जब ऑस्ट्रेलिया की टीम इंग्लैंड में एकमात्र टेस्ट मैच खेलने के लिए आई थी और उसने इंग्लैंड के ओवल में इतिहास रचते हुए मेजबान टीम को हरा दिया था।
ऑस्ट्रेलियाई थे 'मुजरिम अंग्रेज'
तब अंग्रेज क्रिकेट की बड़ी ताकत थे, दुनिया में उनका साम्राज्य चलता था और आस्ट्रेलिया को उन्होंने अपनी एक कॉलोनी बना रखा था जहां अंग्रेज अपने कैदियों को ट्रांसपोर्ट करते हुए ऑस्ट्रेलिया में छोड़ते थे। यानी आज जो ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट पर राज कर रहे हैं, वे उन्हीं 'मुजरिम अंग्रेजों' के वशंज हैं। अंग्रेज लोग ऑस्ट्रेलियाई कल्चर को बिल्कुल नापसंद करते थे, तो ऑस्ट्रेलियाई भी अपने 'इलीट' अंग्रेजों को दुश्मन के तौर पर देखते थे।
पहली बार एशेज शब्द का जिक्र
ऐसे में जब इंग्लैंड की टीम ऑस्ट्रेलिया से 1882 में लंदन में हारी, तब हाहाकार हो गया। इंग्लैंड के मीडिया ने इसको इंग्लिश क्रिकेट की मौत के शोक के तौर पर दर्शाया। इंग्लैंड के 'स्पोर्टिंग टाइम्स' में हार के अगले दिन जो 'शोक समाचार' छपा, उसमें पहली बार एशेज शब्द का जिक्र हुआ था।
पत्रकार रेगिनाल्ड शर्ली वॉकिन्सहॉव ब्रूक्स ने 'इंग्लैंड क्रिकेट की मौत' पर ऐसे लिखा था- इंग्लैंड क्रिकेट की मृत्यु 29 अगस्त 1882 को ओवल में हो गई है। ध्यान दीजिए कि शव को जलाकर 'एशेज' (राख) को ऑस्ट्रेलिया भेज दिया जाएगा। बस यही से एशेज शब्द की नींव पड़ गई थी।
इवो ब्लीग ने खाई एशेज वापस लाने की कसम-
तब इंग्लैंड के तत्कालीन कप्तान ईवो ब्लीग इस बात से इतना निराश हुए कि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर वादा किया कि वह अगली सीरीज में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एशेज वापस हासिल कर लेंगे और उन्होंने ऐसा किया। तीन मैचों की अगली सीरीज उसी साल हुई, जिसको अंग्रेजों ने 2-1 से जीत लिया था और 'एशेज' को अपने घर वापस लेकर आए।
प्रतिद्वंदता की कड़वाहट में शामिल है एक प्रेम कहानी
मजेदार बात यह तब तक दोनों देशों के बीच कोई ट्रॉफी देने का चलन नहीं था। ऐसे में एशेज कलश के कॉन्सेप्ट की कहानी एक प्रेम-कहानी से जुड़ी है। 1882 में क्रिसमस ईव पर इंग्लैंड की टीम ऑस्ट्रेलिया में एक दोस्ताना मैच खेल रही थी। इस मैच के बाद एक समारोह में 'मेलबर्न लेडीज ग्रुप' द्वारा ईवो ब्लीग को एक टेराकोटा उर्न (कलश) भेट के तौर पर दिया गया। बताया जाता है उसमें सीरीज के तीसरे टेस्ट मैच की गिल्लियों को जलाकर एकत्र की गई राख भरी थी।
ब्लीग ने मोर्फी को प्रपोज किया
इस ग्रुप को लीड करने वाली महिला फ्लोरेंस मोर्फी थीं, जिन्होंने कप्तान ब्लीग को कलश भेट किया था। यहीं से दोनों की प्रेम कहानी की शुरुआत हुई। कप्तान ने अगले साल ऑस्ट्रेलिया जाकर मोर्फी को प्रपोज किया और दोनों 1884 में शादी रचाकर वापस इंग्लैंड आ गए। ये साथ फिर जीवन भर बना रहा। इस दौरान वो कलश अगले 43 सालों तक ब्लिग फैमिली के साथ रहा।
एशेज कलश MMC को सौंप दिया गया-
ब्लीग की मृत्यू के बाद मोर्फी ने उस कलश को लंदन में मेरिलबोर्न क्रिकेट क्लब यानी MMC को सौंपने का फैसला किया। ये बाद 1929 की है और 1950 तक क्रिकेट में इस कलश को एशेज के सिंबल के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा। अब कई सालों से एशेज सीरीज में इस कलश की रेप्लिका के तौर पर क्रिस्टल एशेज ट्रॉफी का इस्तेमाल होता है। असली कलश आज भी लंदन के लॉर्ड्स क्रिकेट म्यूजियम की शोभा बढ़ा रहा है।
असली कलश की रेप्लिका है 'द एशेज'-
कलश की लोकप्रियता, एशेज कॉन्सेप्ट और इंग्लैंड-ऑस्ट्रेलिया के बीच पुरानी प्रतिद्वंदता पर लोगों की दिलचस्पी को देखते हुए 1990s में दोनों देशों के क्रिकेट बोर्ड ने तय किया कि अब से हर दो साल में एक सीरीज होगी जिसका नाम आधिकारिक तौर पर 'द एशेज' होगा। इस तरह से 'द एशेज' क्रिकेट की सबसे प्रतिष्ठित सीरीज के तौर पर चलती आ रही है।












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