वनडे में वेस्टइंडीज के खिलाफ भारत की पहली जीत, फिर तो तकदीर ही बदल गयी

एकदिवसीय क्रिकेट मैचों में भारत की सबसे बड़ी जीत कौन सी है ? 1983 में विश्वकप, 1985 में विश्व क्रिकेट चौम्पियनशिप, 2017 टी-20 विश्वकप, 2011 में विश्वकप जीतना नि:संदेह भारत की बहुत बड़ा जीत है।

स्पोर्ट्स डेस्क, जुलाई 21: एकदिवसीय क्रिकेट मैचों में भारत की सबसे बड़ी जीत कौन सी है? 1983 में विश्वकप, 1985 में विश्व क्रिकेट चौम्पियनशिप, 2017 टी20 विश्व कप, 2011 में विश्व कप जीतना नि:संदेह भारत की बहुत बड़ा जीत है। लेकिन इस विजय पथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा कहां से मिली? वो कौन सी जीत है जिसने भारत में यह आत्मविश्वास पैदा किया कि वह महाशक्तिमान को भी हरा सकता है। युद्ध, सैनिक साजो-सामान से अधिक, आत्मबल से जीता जाता है। इस लिहाज से भारत को सबसे बड़ी जीत 29 मार्च 1983 को मिली थी। भारत ने वेस्टइंडीज को गुयाना के अलबियोन में 27 रन से हराया था। तब भारत ने एकदिवसीय मैचों में पहली बार वेस्टइंडीज को हराया था। ये जीत ऐसी थी जैसे किसी मेमने ने शेर को हरा दिया हो।

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29 मार्च 1983 क्यों है स्पेशल

29 मार्च 1983 क्यों है स्पेशल

उस समय वेस्टइंडीज की टीम विश्व विजेता थी और माना जाता था कि इस टीम को हराया नहीं जा सकता। लेकिन भारत ने असंभव को संभव कर दिखाया। इसी जीत ने भारत के सोचने और खेलने का अंदाज बदल दिया था। यहीं भारत को प्रेरणा मिली कि वह किसी को भी हरा सकता है। महाबली को भी। इस विश्वास की वजह से ही भारत ने 1983 के विश्वकप में वेस्टइंडीज को दो बार (लीग मैच और फाइनल) हराया था। विश्वकप में भारत का पहला मैच ही वेस्टइंडीज से था। तब भारत के कप्तान कपिल देव ने गुयाना विजय की कहानी सुना कर भारतीय खिलाड़ियों में जोश भरा था।

कपिल देव ने भी कि थी तारीफ

कपिल देव ने भी कि थी तारीफ

जब भारत ने यह मैच जीत लिया तब रात को टीम मीटिंग ने कपिल देव ने कहा था, हम लोगों ने महाशक्तिमान कही जाने वाली वेस्टइंडीज टीम को दो बार दिया है। यह बहुत बड़ी बात है। कोई माने या न माने, अब हम विश्वकप भी जीत सकते हैं। इस मैच की तरह ही अगर हम अपनी जान झोंक देंगे तो कुछ भी असंभव नहीं। फिर तो 25 जून 1983 को भारत ने विश्वकप जीत कर इतिहास रच दिया। दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ गयी। एक इसके बाद भारत का विश्वविजयी अभियान साल दर साल आगे बढ़ता गया।

गुयाना वनडे की पृष्ठभूमि

गुयाना वनडे की पृष्ठभूमि

फरवरी 1983 में भारत की टीम वेस्टइंडीज के दौरे पर गयी थी। इस दौरे में पांच टेस्ट और तीन एकदिवसीय मैच खेले गये थे। भारत के कप्तान कपिल देव थे। उन्हें गावस्कर की जगह टीम का कप्तान बनाया गया था। उस समय वेस्टइंडीज की टीम क्रिकेट की महाशक्ति थी। ग्रीनिज, हेंस, विव रिचर्ड्स, क्लाइव लॉयड जैसे प्रलयंकारी बल्लेबाज थे। एंडी रॉबर्ट्स, माइकेल होल्डिंग और मैलकम मार्शल जैसे विध्वंसकारी गेंदबाज थे। क्लाइव लॉयड कप्तान थे। क्लाइव लॉयड की कप्तानी वाली वेस्टइंडीज की टीम को सर्वकालिक श्रेष्ठ टीम माना जाता है।

जबकि उस समय भारतीय टीम में केवल सुनील गावस्कर और कपिल देव को ही विश्व स्तरीय क्रिकेटर माना जाता था। वेस्टइंडीज ने अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए भारत को पहले टेस्ट और पहले एकदिवसीय मैच में हरा दिया था। तीसरा टेस्ट ड्रॉ हो गया था। इसके बाद 29 मार्च 1983 को गुयाना के अलबियोन स्पोर्ट्स कम्प्लेक्स में तीसरा एकदिवसीय मैच था। शुरुआती दो हार से भारतीय टीम विचलित थी। वह कुछ नया करना चाहती थी। कपिल देव जोशीले कप्तान थे। तब उन्होंने जोखिम उठाने का फैसला किया।

गावस्कर और शास्त्री की शानदार साझेदारी

गावस्कर और शास्त्री की शानदार साझेदारी

भारत ने नया प्रयोग किया। गावस्कर के साथ रवि शास्त्री ओपनिंग के लिए उतरे। रवि शास्त्री को ओपनिंग के लिए भेजना, चौंकाने वाला फैसला था। गावस्कर बदले हुए रंग में थे। आमतौर पर गावस्कर रक्षात्मक बल्लेबाजी के लिए जाने जाते थे। लेकिन उस दिन वे ताबड़तोड़ बल्लेबाजी कर रहे थे। उन्होंने करीब 52 गोंदों में अर्धशतक ठोक दिया। दूसरे छोर पर शास्त्री विकेट पर जमे हुए थे। उनकी जिम्मेदारी थी कि वे वेस्टइंडीज के तूफानी गेंदबाजी के सामने विकेट पर डटे रहें। पहले विकेट के लिए 93 रनों की साझेदारी हुई। शास्त्री 30 रन बना कर मार्शल का शिकार बने। गावस्कर जब 90 रनों पर थे तभी रन आउट हो गये। उस समय स्कोर 2 विकेट पर 152 रन था।

कपिल की शानदार बैटिंग

कपिल की शानदार बैटिंग

यहां कपिल देव ने एक बार फिर सबको चौंकाया। गावस्कर के आउट होने के बाद कपिल खुद मैदान पर आ गये। जब कि दिलीप वेंगसरकर, यशपाल शर्मा जैसे धाकड़ बल्लेबाज बाकी थे। कपिल कुछ ठान कर मैदान पर उतरे थे। यह बहुत जोखिम वाला प्रयोग था। लेकिन कपिल ने मैदान पर उतरते ही बता दिया कि वे आज वेस्टइंडीज के खौफनाक तेज गेंदबाजों की बखिया उधेड़ने वाले हैं। उन्होंने मात्र 38 गेंदों पर 72 रन बनाये जिसमें 7 चौके और 3 छक्के शामिल थे। ऐसी विस्फोटक बैटिंग देख कर क्लाइव लॉयड भौंचक रह गये। भारत से ऐसे आक्रमण की उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। मोहिंद अमरनाथ के 30, यशपाल शर्मा के 23 और दिलीप बेंगसरकार के 18 नाबाद रनों की बदौलत भारत का स्कोर 47 ओवर में 282 रनों पर पहुंच गया। वेस्टइंडीज ने नियत समय से तीन ओवर कम डाले थे। भारत ने एक सम्मानजनक स्कोर खड़ा किया।

जब भारत ने वनडे में पहली बार हराया था वेस्टइंडीज को

जब भारत ने वनडे में पहली बार हराया था वेस्टइंडीज को

भारत ने बॉलिंग में भी कमाल किया। वेस्टइंडीज के सामने 283 रनों का लक्ष्य था। बलविंदर संधु ने वेस्टइंडीज को पहला झटका तब दिया जब उसका स्कोर केवल 6 रन था। हेंस 2 रन बना कर आउट हो गये। 22 रन के स्कोर पर दूसरा विकेट गिर गया। कपिल ने ग्रीनिज को 16 रनों पर आउट किया। रिचर्ड्स खतरनाक हो रहे थे कि मदन लाल ने उन्हें बोल्ड कर दिया। रिचर्ड्स ने 64 रन बनाये। लॉयड को मदन लाल ने ही केवल 8 रनों पर पवेलियन भेज दिया। फाउद बेकस ने 52 रन बनाये। वे शास्त्री का शिकार बने। वेस्टइंडीज के 154 पर पांच विकेट गिर चुके थे। उसकी मजबूत बैटिंग लड़खड़ा चुकी थी।

47 ओवर में वेस्टइंडीज की टीम 9 विकेट पर 255 रन ही बना सकी। इस तरह भारत 27 रनों से यह मैच जीत गया। वेस्टइंडीज ने जिस मदन लाल, बलविंदर संधू और रवि शास्त्री को कमजोर गेंदबाज माना था उन्होंने लाजवाब प्रदर्शन किया। कपिल, संधू और मदन लाल को 2-2 विकेट मिले। रवि शास्त्री को 3 विकेट मिले। इस तरह भारत ने पहली बार वेस्टइंडीज को उसके घर में हरा कर एक ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। यह जीत इसलिए ऐतिहासिक है क्यों कि इसके पहले भारत आठ साल में केवल पांच वनडे मैच ही जीत पाया था।

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