VIDEO: गुजरात के इस गांव में बीड़ी की फूंक से किया जाता है इलाज, मरीजों की लगीं कतार
Gujarat News, राजकोट। गुजरात में राजकोट के मोरबी रोड क्षेत्र में स्थित एक गांव में बीड़ी की फूंक से लोगों का इलाज किए जाने का मामला सामने आया है। यहां 50 साल के एक शख्स का दावा कि वह सभी दुःख-दर्द या बीमारी दूर करने में सक्षम है। वहीं, इसके चर्चे दूर-दूर तक हुए तो उसके पास लोगों की भीड़ लगनी शुरू हो गई है।

राजकोट में इस गांव के होने लगे चर्चे
इस गांव का नाम है हडाला, जिसकी आबादी 3 हजार से कम ही है। मगर, यहां हप्ते में तीन दिन यानी मंगलवार, गुरुवार और शनिवार को लोगों की भीड़ जुटती है। इसका कारण बताए रहे हैं वही 50 साल के शख्स। उनका नाम है नगीनभाई आंबलिया। उनके पास आने वाले मरीजों का कहना है कि नगीनभाई बीड़ी की फूंक बीमारी में आराम पहुंचा देते हैं। नगीनभाई अपने घर की छत पर ही 'धूम्रशेर' द्वारा लोगों का इलाज करते हैं।

बीड़ी से इलाज के पीछे का दावा
बीड़ी के जरिए मरीजों का इलाज करने के पीछे नगीनभाई का कहना है कि वो दो साल पहले तक अपनी क्षौरकर्म की दुकान चलाते थे। एक दिन दोपहर के वक़्त वो पास वाले रामजी मंदिर में सो गए थे। तभी किसी साधु ने उन्हें उठाया। उन्होंने उस साधू को 10 रुपए बतौर सम्मान देने की कोशिश की तो साधु ने कुछ बातें उनसे कहीं। साधू ने कहा, हम गांजा पीते हैं, तुम बीड़ी पीना और जिसे भी कोई दर्द हो उस पर फूंक देना, आराम हो जाएगा।''

यह बताईं इलाज करने की शर्त
नगीन के मुताबिक, 'साधू ने कुछ बातें ध्यान रखने के लिए कहा था, पहली ये कि ये इल्म सिर्फ एक बार ही करना है, बाद में उसको घर पहुंचकर खाखी बाबा को धूप देना होगी। दूसरी बात यह कि कभी इसके पैसे नहीं लेने हैं। तीसरी बात, सामने बैठी बहन-बेटी को कभी बुरी नजर से नहीं देखना।''
नगीनभाई का दावा है कि इतना कहते ही साधू ने सिर पर हाथ रख आर्शीवाद दिया और गायब हो गया।तबसे मैं लोगों के भले के लिए यही कर रहा हूं।'

'डेढ़ साल तक किसी को नहीं बताया'
नगीन का कहना है कि, 'साधू के मिलने के बाद से तकरीबन डेढ़ साल तक किसी को नहीं बताया। इसलिए कि लोग क्या सोचेंगे, लेकिन तीन महीने पहले खाखी बाबा की प्रेरणा से एक आदमी का दुःख दूर किया था। बाद में धीरे-धीरे गांव से और फिर सौराष्ट्र से भी मरीज दिखाने के लिए आने लगे। पहले में दोपहर 3 से रात को 12 बजे तक यह क्रम चलता था। अब दोपहर 12 बजे से लेकर रात के 12 बजे तक ये करता हूंं।'
रोजाना फूंकनी पड़ती हैं 100 बीड़ी
बताया जा रहा है कि मरीजों की संख्या यहां लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में नगीन को दिनभर में 100 बीड़ी भी जलानी पड़ जाती हैं। जिनमें से नगीन दो-चार बीड़ी ही पीते हैं और गली में खड़े लोगो को थाली के द्वारा ही धूम्रशेर दे दी जाती है। गांव के लगभग हर घर से कुछ लोग नगीन के स्वयंसेवक भी बन गए हैं, जो मदद करते रहते हैं। नगीन की बीवी गीताबेन आंगनवाड़ी के साथ रसोई का काम करती थीं, बाद में लोग घर बैठे कुछ न कुछ देने लगे।












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