Ratinath ji Maharaj : मंडावा के रामवतार से रतिनाथ जी महाराज बनने की पूरी कहानी, भाई नंदकिशोर की जुबानी

Ratinath ji Maharaj Bau Dham Laxmangarh Sikar : राजस्‍थान में नाथ संप्रदाय के प्रमुख संतों में से एक रतिनाथ जी महाराज को 24 दिसम्‍बर 2022 को बऊ धाम लक्ष्‍मणगढ़ सीकर में समाधि दी गई।

Ratinath ji Maharaj Bau Dham

Ratinath ji Maharaj Complete Story From Ramavatar of Mandawa to Bau Dham laxmangarh Sikar : संत शिरोमणि रतिनाथ जी महाराज ब्रह्मलीन हो गए। वे राजस्‍थान के सीकर जिले के लक्ष्‍मणगढ़ स्थित बऊ धाम आश्रम के पीठाधीश्‍वर थे। 76 साल की उम्र में रतिनाथ जी ने 23 दिसम्‍बर 2022 को मुम्‍बई के लॉवर परेल इलाके में प्रवासी उद्योगपति नत्‍थू महराज के घर आखिरी सांस ली। फिर वहां उनकी पार्थिव देह चार्टर विमान से शनिवार को बऊधाम आश्रम लाई गई, जहां उनके अंतिम दर्शनों के लिए जन सैलाब उमड़ा। कई जाने-माने लोग बऊ धाम पहुंचे। बऊ धाम परिसर में ही रतिनाथ जी महाराज की पार्थिव देह को 24 दिसम्‍बर 2022 की दोपहर को समाधि दी गई है। (वीडियो नीचे)

अध्‍यात्‍म की प्रतिमूर्ति थे रतिनाथ जी महाराज

अध्‍यात्‍म की प्रतिमूर्ति थे रतिनाथ जी महाराज

यूं तो रतिनाथ जी महाराज किसी परिचय के मोहमाज नहीं थे। शेखावाटी अंचल ही नहीं बल्कि पूरे राजस्‍थान समेत आस पास के कई राज्‍यों में उनके अनुयायी हैं। लोग रतिनाथ जी महाराज को लोक कल्‍याण, दया व अध्‍यात्‍म की प्रतिमूर्ति मानते थे। रतिनाथ जी महाराज के देवलोकगमन की सूचना के बाद सोशल मीडिया पर भी शोक संदेशों की बाढ़ सी आ गई और बड़ी संख्‍या में लोग बऊ धाम भी पहुंचे।

 रतिनाथ जी महाराज का जीवन परिचय

रतिनाथ जी महाराज का जीवन परिचय

- रतिनाथ महाराज का जन्‍म राजस्‍थान के झुंझुनूं जिले के मंडावा कस्‍बे में ब्राह्मण परिवार में लक्ष्‍मीनारायण भादूपोता व त्रिवेण देवी के घर साल 1946 को हुआ था।

- रतिनाथ महाराज का बचपन का नाम रामवतार था। इन्‍होंने शुरुआती शिक्षा मंडावा कस्‍बे से ही ली। रतिनाथ नाम इन्‍हें गुरु से मिला।

- मंडावा से प्रारम्भिक शिक्षा पाने के बाद पास के ही कस्‍बे फतेहपुर स्थित चमड़िया कॉलेज में दाखिला लिया।

- फतेहपुर में अमृतनाथ आश्रम नाथ सम्‍प्रदाय की प्रमुख पीठों में एक है। फतेहपुर में पढ़ाई के दौरान अमृतनाथ आश्रम जाने लगे थे।

- मंडावा के रामवतार के मन में बचपन से ही वैराग्‍य भाव था। 10-12 साल की उम्र में अमृतनाथ आश्रम के तत्‍कालीन पीठाधीश्‍वर संत शुभनाथ महाराज के शिष्‍य बन गए थे।

-बाद में झुंझुनूं जिले के ही गांव टांई स्थित आश्रम के संत केशरनाथ महाराज रतिनाथ को अपने साथ टांई ले गए। लंबे समय तक वहां रहे।

-साल 1970 में लक्ष्‍मणगढ़ स्थित बऊधाम आश्रम के तत्‍कालीन पीठाधीश्‍वर संत नवांनाथ महाराज के देवलोकगमन के कारण उनके सेवक ने गद्दी संभालने से इनकार कर दिया था।

- इस पर अमृतनाथ आश्रम के तत्‍कालीन पीठाधीश्‍वर संत शुभनाथ महाराज ने 24 वर्षीय रतिनाथ को बऊधाम आश्रम की गद्दी संभलवा दी।

फतेहपुर के सारनाथ मंदिर में रहते थे रतिनाथ महाराज

फतेहपुर के सारनाथ मंदिर में रहते थे रतिनाथ महाराज

रतिनाथ महाराज पीठाधीश्‍वर बनने के बाद बऊधाम आश्रम में स्‍थायी रूप से नहीं रहे। घूमंतु स्‍वभाव के कारण अक्‍सर ये विभिन्‍न स्‍थानों पर आते जाते रहते थे। फेतहपुर स्थित सारनाथ मंदिर को अपना स्‍थान बसेरा बना रखा था। यहां से सुबह शाम आरती के समय बऊधाम आश्रम जाते थे। पिछले कुछ समय से सालासर में रह रहे थे। बऊधाम पीठाधीश्वर श्रीश्री 1008 संत शिरोमणि श्री रतिनाथ जी महाराज 52 साल से बऊधाम की गद्दी संभाल रहे थे। उनको पीर की भी उपाधि मिली हुई थी।

 बऊधाम में एक ही गाय का वंश बन गया गौशाला

बऊधाम में एक ही गाय का वंश बन गया गौशाला

बऊधाम आश्रम परिसर में एक गाय व नंदी की भी समाधि बनी हुई है। गाय के बारे में कहा जाता है कि ये वो गाय है, जो रतिनाथ जी महाराज को बऊ धाम आश्रम के पीठाधीश्‍वर बनने पर मिली थी। आज उसी एक गाय का वंश इतना बढ़ गया कि बऊ धाम आश्रम की गौशाला में करीब 700 गाय हो गई। गायों की देखभाल रतिनाथ महाराज के शिष्‍य करते हैं।

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     चार भाइयों में तीसरे नंबर के थे रतिनाथ महाराज

    चार भाइयों में तीसरे नंबर के थे रतिनाथ महाराज

    रतिनाथ महाराज के छोटे भाई नंदकिशोर जलधारी ने मीडिया से बातचीत में बताया कि रतिनाथ चार भाइयों में तीसरे नंबर के थे। 10-12 साल की उम्र में ही संतों के सानिध्‍य में आ गए थे। संत बनने के बाद सिर्फ साल 1991 में त्रिवेणी देवी की मौत हुई तब घर आए थे। तब रतिनाथ महाराज ने मां के क्रियाक्रम में हिस्‍सा लेने के बाद सबके सामने भाइयों से कहा कि 'ये तो जन्‍म देने वाली मां थी। इसलिए आया हूं। भविष्‍य में मेरा आपसे सांसारिक जीवन का कोई रिश्‍ता नहीं है। अब मेरा यहां कोई लेना-देना नहीं है'

    रामवतार कैसे बने रतिनाथ महाराज?

    रामवतार कैसे बने रतिनाथ महाराज?

    नंदकिशोर जलधारी ने बताया कि उनकी माता त्रिवेणी देवी फतेहपुर के अमृतनाथ आश्रम में शुभनाथ महाराज के गुरु जोतनाथ महाराज के धोक लगाने जाया करती थीं। तब उनके साथ भाई रामवतार (रतिनाथ महाराज) भी जाता था। एक बार रामवतार ने अपनी मां से इच्‍छा जताई कि वे भी हमेशा के लिए अमृतनाथ आश्रम में ही रहना चाहते हैं। तब शुभनाथ महाराज ने त्रिवेणी देवी से कहा कि 'रामवतार भले ही आपकी कोख से जन्‍मे हो, मगर ये हमारा है और हमारे पास आ गया है। इसको यहीं पर छोड़ जाओ।' तब मां त्रिवेणी करीब 12 साल बेटे रामवतार को अमृतनाथ आश्रम में छोड़कर घर आ गई।

     रतिनाथ जी महाराज ने फतेहपुर में ली दीक्षा

    रतिनाथ जी महाराज ने फतेहपुर में ली दीक्षा

    बेटे रामवतार के अमृतनाथ आश्रम फतेहपुर में ही रह जाने की बात त्रिवेणी देवी घर आकर परिजनों को बताई तो मामा व बड़ा भाई पोकर रामवतार को लेने अमृतनाथ आश्रम फतेहपुर गए। वहां जाकर शुभनाथ महाराज से रामवतार (रतिनाथ महाराज) के बारे में पूछा, मगर वे परिजनों को आश्रम में कहीं नहीं मिले। फिर गुरु की देखरेख में रतिनाथ महाराज ने खुद ही अपना कान छेद लिया ताकि घर वाले उनको कभी वापस नहीं ले जा सके। फिर भगवा वस्‍त्र धारण करके आश्रम में ही बस गए। गांगियासर रायमाता के नवरात्र पर सात दिन तक जांघ पर गेहू उगाए थे।

    Ratinath Ji Maharaj Bhajan Video

    संत रतिनाथ जी महाराज के भजन काफी लोकप्रिय हैं। रतिनाथ महाराज बिना रुके आठ घंटे तक लगातार भजन गा सकते थे। गले व आवाज के जादू को हमेशा बरकरार रखने के लिए रतिनाथ महाराज तुलस के काढे के साथ शहद का सेवन करते थे। इनइनके पसंदीदा भजनों में भैरवी, लावण, शब्‍दावाणी, शिवभक्ति व दुर्गा भक्ति आदि प्रमुख थे।

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