नरहड़ दरगाह राजस्थान: कृष्ण जन्माष्टमी पर लगता है मेला, आस्था और सौहार्द की अद्भुत मिसाल
Narhar Dargah Fair 2025 News: राजस्थान के झुंझुनूं जिले के नरहड़ गांव में स्थित नरहड़ पीर बाबा की दरगाह सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि साम्प्रदायिक सौहार्द का जिंदा प्रतीक है। यहां जन्माष्टमी के अवसर पर लगने वाला तीन दिन का मेला इस बात का सबूत है कि आस्था का कोई धर्म नहीं होता। हिंदू और मुस्लिम ही नहीं, बल्कि हर मजहब के लोग यहां बाबा के दरबार में माथा टेकते हैं, मन्नतें मांगते हैं और एक-दूसरे की खुशियों में शरीक होते हैं।

पीर बाबा की कहानी क्या है?
नरहड़ पीर बाबा, जिनका असली नाम सैयद अलाउद्दीन अहमद था, अजमेर शरीफ के महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के शिष्य थे। माना जाता है कि नरहड़ दरगाह अजमेर की दरगाह से भी पुरानी है। यहां के बारे में मशहूर है कि एक समय लोदी खां और राजपूतों के बीच युद्ध में पीर बाबा की मजार के आशीर्वाद से ही विजय मिली, तभी से लोग उन्हें अपना रक्षक मानने लगे।
जन्माष्टमी पर रंग-बिरंगा मेला
हर बार की तरह साल 2025 में भी 15 से 17 अगस्त तक जन्माष्टमी के मौके पर यहां भव्य मेला लगेगा। तैयारी जोरों पर है और लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है। मेले में कव्वाली, रात जागरण और 'जकड़ी' जैसे कार्यक्रमों की गूंज देर रात तक रहती है। इस दौरान कई श्रद्धालु अपने बच्चों का जात-कर्म और मुंडन संस्कार भी यहीं करवाते हैं।
चिड़ावा तहसील के गांव नरहड़ की दरगाह में जन्माष्टमी पर भरने वाले सालाना भादवा मेले की तैयारियों को लेकर पुलिस व प्रशासन ने व्यवस्थाओं का जायजा लिया। SDM नरेश सोनी, DSP विकास धींधवाल, तहसीलदार कमलदीप पूनिया, BDO अनीषा बिजारणियां ने निरीक्षण कर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। इस दौरान दरगाह फाउंडेशन निदेशक व खादिम शाहिद पठान, कमेटी चेयरमैन खलील बुडाना, सचिव करीम पीरजी भी मौजूद रहे।
जब कृष्ण जन्माष्टमी बनी हिन्दू-मुस्लिम एकता का पर्व
जन्माष्टमी का दिन भले ही हिंदू धर्म का बड़ा पर्व हो, लेकिन नरहड़ दरगाह पर इस दिन हिंदू श्रद्धालु मुस्लिमों से भी ज्यादा संख्या में आते हैं। वे बाबा की मजार पर चादर चढ़ाते हैं, धागा बांधते हैं और मन्नत मांगते हैं। दरगाह कमेटी के चेयरमैन खलील बुडाना कहते हैं, "यहां धर्म नहीं, सिर्फ आस्था बोलती है।"
मिट्टी में छुपा 'चमत्कार'
लोग मानते हैं कि यहां की मिट्टी में उपचार की शक्ति है। मानसिक रूप से परेशान लोग इसे शरीर पर लगाते हैं और कई श्रद्धालु इसे घर भी ले जाते हैं। दरगाह परिसर में लगे एक पेड़ पर श्रद्धालु धागा बांधते हैं, यह मानकर कि बाबा उनकी मनोकामना जरूर पूरी करेंगे।
ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत
कभी यह क्षेत्र जोध राजपूत राजाओं की राजधानी था, जहां 52 बाजार हुआ करते थे। दरगाह के बुलंद दरवाजे से गुजरना 'स्वर्ग द्वार' पार करने जैसा माना जाता है। मजार का गुंबद चिकनी मिट्टी से बना है, और मान्यता है कि कभी यहां से शक्कर बरसती थी। इसी वजह से बाबा को 'शक्कर बाबा' कहा जाता है।
नरहड़ दरगाह का यह मेला सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि वह पुल है जो हिंदू-मुस्लिम को जोड़ता है। यहां आकर महसूस होता है कि सच्ची भक्ति वही है जो लोगों के दिलों को करीब लाए। शायद यही इस दरगाह का सबसे बड़ा चमत्कार है।
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