Rajasthan: एक बुजुर्ग महिला की उम्र 100 पार, फिर भी अब तक नहीं देखा कभी अस्पताल, जानिए क्या है पूरा मामला ?
Rajasthan: भारत में शतायु होने की कामना कर दीर्घायु होने का आशीर्वाद सदैव ही दिया जाता है। लेकिन बिरले ही होते है जो शतायु से भी अधिक उम्र तक भी अपने दैनिक कार्यों को करते हुए जीवित रह पाते है।
इतना ही नहीं हर व्यक्ति की कामना होती हैं उसके बेटे-बेटियों का विवाह, उनके पोता-पोती हो और पोते के भी संताने हो जिन्हें वह स्वंय अपनी आंखों से जीते जी देख ले। लेकिन यह चाहत जिनकी पूरी होती है ऐसे अगर ढूंढने निकलों तो शायद ही बहुत ही कम मिलेंगे।
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कई बुजुर्गों में वो उत्साह देखने को मिलता हैं जो आज के युवाओं में भी नजर नहीं आता है। यह वृद्ध कहीं न कहीं युवाओं को प्रेरित भी करते हैं कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।

हमने राजस्थान में टोंक जिले की पीपलू उपखंड क्षेत्र में बुजुर्गों की कार्यशैली व जज्बे को देखा तो लगा कि दादाजी-दादी के जज्बात अभी भी बेटे, पौते से अधिक जवां है।
आईए विश्व वृद्धजन दिवस पर मिलिए एक ऐसी ही बुजुर्ग महिला से जिसमें 100 वर्ष से अधिक उम्र के बावजूद उत्साह बरकरार है तथा स्वयं का कार्य खुद कर लेती हैं।
80 सदस्यों के परिवार की मुखिया मूली देवी
टोंक जिले में पीपलू क्षेत्र की ग्राम पंचायत निमेड़ा के गांव बीजवाड़ में 80 सदस्यों के परिवार की मुखिया मूली देवी पत्नी लादूलाल 100 वर्ष से अधिक उम्र की है। उम्र भले ही शतायु पार पहुंच गई लेकिन अभी तक भी स्वयं का दैनिक कार्य खुद कर लेती है।
मूली देवी की संयमित जीवनशैली एवं जीवटता के चलते कोरोना काल में बुखार तक भी पास में नहीं फटका। वे इस उम्र में भी नियमित रूप से सुबह 5 बजे उठती है। अपनी दिनचर्या से संबंधित सभी बिना किसी की मदद लिए वे स्ययं करती है। मूली देवी ने युवा अवस्था में जहां खेती-बाड़ी करते हुए परिवार का पालन पोषण करने में योगदान दिया है।
वहीं प्रार्थना, भजन आज उसके जीवन का हिस्सा है। मूली देवी गुर्जर अपनी लडख़ड़ाती आवाज में बताती हैं कि चक्की का आटा, कुएं का पानी, खेत का अनाज खाकर जीवन जीया हैं। अपने खान पान के बूते ही आज वह पूर्णत: स्वस्थ है। साथ ही कभी मेडिकल दवा के सेवन की आवश्यकता नहीं पड़ी है।
घटी में पीसते थे आटा
वृद्धा मूली देवी ने 100 साल पहले के नवाबों, पटवारियों, चौकीदारों की कहानियां सुनाई। उन्होंने उस समय की सामाजिक, धार्मिक, रीति रिवाजों के बारे में भी बताया।
मूली देवी ने कहा कि टोंक नवाब सआदत अली के समय पटवारियों द्वारा गेूहं खाने के वक्त मक्का, बाजार, ज्वार तथा बेजड़ खाने के वक्त गेहूं खिलाए जाते थे। घटी में आटा पीसते थे। पैदल ही आने जाने का साधन हुआ करता था। पहले घने जंगल थे। हिरण सहित पशु पक्षी विचरण करते हुए आसानी से नजर आते थे।
सबसे बड़े बेटे की उम्र 80 वर्ष, बेटे-पोते बने सरपंच
मूली देवी ने बताया कि उसके चार बेटे, तीन बेटियां है। सभी को खेती करते हुए पाल-पोष कर बड़ा किया हैं। मूली देवी के सबसे बड़े बेटे उद्दालाल की उम्र 80 साल की हो गई है। मूली देवी के तीसरे नंबर का पुत्र बद्रीलाल गुर्जर तथा उनकी पत्नी प्रेम देवी भी निमेड़ा ग्राम पंचायत के सरपंच रह चुके है।
वहीं पोते तुलसीराम गुर्जर वर्तमान में निमेड़ा ग्राम पंचायत के सरंपच है। जिनका कहना हैं कि उनकी दादी इस उम्र में भी प्रतिदिन सुबह 5 बजे उठकर अपना काम करती है। 100 वर्ष से अधिक की उम्र के दौरान कभी चिकित्सालय नहीं गई। कोरोना काल में भी बुखार तक उन्हें नहीं आई।
पूर्व सरपचं बद्रीलाल गुर्जर का कहना है कि मेरी मां सादा एवं सात्विक भोजना किया करती थी, हमने भी वहीं किया है। पंरपरागत तरीके से खेती करते है। मां ने 100 साल की उम्र में कभी चश्मा नहीं लगाया है। उसे आज भी बिना चश्में के साफ दिखाई देता है।
भरपेट राबड़ी खाती है
वृद्धा मूली देवी के पोते गिर्राज ने बताया कि दादी आज भी भरपेट राबड़ी सुबह के समय खाती है। हम सब इतनी उम्र तक दादी के जीने तथा स्वस्थ रहने पर काफी खुश है। हालांकि वर्तमान में मूली देवी के परिवार के कई सदस्यों अपने काम काज के चलते अलग-अलग स्थानों पर रहते हैं।
यह वृद्धा एक मिसाल है, जो यह बताती है कि संयमित जीवशैली, रोग प्रतिरोधक क्षमता और आशावादी दृष्टिकोण के आधार पर हम जीवन की हर परिस्थिति का सामना कर सकते हैं।












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