Ashok Gehlot:राजस्थान के मुख्यमंत्री कहलाते हैं राजनीति के 'जादूगर', उनके बारे में सबकुछ जानिए
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का जन्म एक पेशेवर जादूगर परिवार में हुआ है और आज भी उनकी इसमें रुचि है। लेकिन, अब वे असली जादूगरी से ज्यादा राजनीतिक जादूगरी करते देखे जाते हैं। सक्रिय राजनीति में 71 वर्षीय गहलोत पिछले 51 वर्षों से ऐक्टिव हैं और करीब ढाई दशकों से वे राजस्थान में कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली चेहरा हैं। सियासत में बहुत कम लोग ही होंगे, जिसके काम में कोई प्रधानमंत्री इतना डूबा होगा कि उन्हें खुद ही ऐक्टिव राजनीति में एंट्री करवाई होगी। लेकिन, गहलोत को वह सौभाग्य मिला कि उनकी सेवा भाव और कार्य करने की लगन पर इंदिरा गांधी की नजर पड़ी और उन्होंने तत्काल ना सिर्फ उन्हें मौका दिया, बल्कि विपरीत हालातों के बावजूद उनपर भरोसा कायम रखा।

अशोक गहलोत की इंदिरा गांधी ने करवाई थी सक्रिय राजनीति में एंट्री
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सक्रिय राजनीति में लाने वाली कोई और नहीं, बल्कि खुद पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। 1971 की बात है अशोक गहलोत को इंदिरा ने पश्चिम बंगाल के बनगांव और 24 परगना जिलों में शरणार्थी कैंपों में काम करते देखा और वहीं पर तय कर लिया कि वह उन्हें मुख्यधारा की राजनीति में लेकर आएंगी। 1974 में उन्होंने ही गहलोत को राजस्थान में कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई का पहला प्रदेश अध्यक्ष बनाया। हालांकि, गहलोत छात्र संघ चुनाव नहीं जीत सके और अपना पहला विधानसभा चुनाव भी 1977 में चार हजार से ज्यादा वोटों से हर गए। लेकिन, उन्होंने हार के बावजूद जिस तरह से खुद को वोट देने वालों का धन्यवाद दिया, उससे प्रदेश की राजनीति में उनकी ऐसी सुलझे हुए नेता की छवि बनी, जो आजतक कायम है। उन्हें इसका आगे चलकर लाभ भी मिला।

इंदिरा गांधी ने ही पहली बार केंद्र में मंत्री बनाया
राजस्थान के मुख्यमंत्री के तौर पर अशोक गहलोत का 17 दिसंबर, 2018 से तीसरा कार्यकाल है। वे पहली बार 1998 में राजस्थान के मुख्यमंत्री बने थे और 2003 तक इस पद पर रहे थे। दूसरी बार उन्हें 2008 में सीएम बनने का मौका मिला और 2013 तक अपना कार्यकाल पूरा किया। पिछले करीब ढाई दशकों से अशोक गहलोत राजस्थान में कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेता बने हुए हैं। राजनीति में वह अपने विनम्र स्वभाव के लिए भी मशहूर हैं, तो गांधीवादी जीवनशैली के लिए भी जाने जाते हैं। लेकिन, इन सबके बावजूद राजनीति में इतने धुरंधर हैं कि यह सियासी बाजी पलटने के जादूगर समझे जाते हैं। अशोक गहलोत राजस्थान से पांच बार (1980-84,1984-1989,1991-96,1996-98 और 1998-1999) लोकसभा के लिए भी चुने जा चुके हैं। उन्होंने अपना पहला लोकसभा चुनाव 1980 में जोधपुर से जीता था और हर बार वहीं का प्रतिनिधित्व किया। सिर्फ दो साल बाद ही इंदिरा गांधी ने उन्हें अपनी मंत्री परिषद में जगह दी और केंद्रीय राज्यमंत्री बनाया।

जब ऑटो रिक्शा में बैठकर शपथ लेने पहुंचे थे अशोक गहलोत
राजनीति की चकाचौंध से दूर अशोक गहलोत की सादगी के बारे में बताया जाता है कि जब वे इंदिरा मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए शपथ लेने पहली बार राष्ट्रपति भवन पहुंचे थे तो सिक्योरिटी ने उन्हें रोक दिया। गहलोत के साथ ऐसा इसलिए हुआ था, क्योंकि उनके पास तब कोई कार नहीं थी। वे ऑटो-रिक्शा में बैठकर केंद्रीय मंत्री बनने पहुंचे थे। गहलोत को तभी शपथ ग्रहण के लिए अंदर जाने दिया गया, जब उन्होंने अपना लोकसभा सदस्य वाला पहचान पत्र दिखाया। उन्होंने जोधपुर की ही सरदारपुरा विधानसभा क्षेत्र से पहली बार 1999 में जीत दर्ज की। फिर इसी सीट का 2003, 2008, 2013 में भी प्रतिनिधित्व किया। 11 दिसंबर, 2018 से भी वे सरदारपुरा विधानसभा क्षेत्र का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। अशोक गहलोत दो बार राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर भी रहे हैं। पहली बार 1985 से 1989 तक और दूसरी बार 1994 से लेकर 1999 तक।

अशोक गहलोत का सामाजिक बैकग्राउंड
अशोक गहलोत अन्य पिछड़ा वर्ग की माली जाति से ताल्लुक रखते हैं। जब गहलोत को पहली बार 1998 में राजस्थान का सीएम बनने का मौका मिला था, तब प्रदेश की सियासत पर दो जाट परिवारों का दबदबा हुआ करता था। ये थे मदेरणा और मिर्धा। आज 24 साल बाद मिर्धा परिवार का कोई खास राजनीतिक वजूद नहीं रह गया है और महिपाल मदेरणा की वजह से दूसरे राजनीतिक परिवार का भी सूर्य अस्त लग रहा है। राजस्थान की राजनीति को करीब से देखने वाले बताते हैं कि जब उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने का मौका मिला तो उन्होंने प्रदेश कांग्रेस कमेटी में ऐसे लोगों को जगह दी, जो आज उनकी पूंजी बन चुके हैं। यह समाज के बेहद निम्न तबके के लोग हैं। शायद यही वजह है कि 2022 में जब कांग्रेस आलाकमान की ओर से उन्हें केंद्र की राजनीति में आने का संकेत दिया जा रहा था, तब ऐसे ही नेता उनकी ढाल बन गए और उनकी 'जादूगरी' के सामने कांग्रेस नेतृत्व को भी घुटने टेकने पड़ गए।

अशोक गहलोत का व्यक्तिगत जीवन और परिवार
अशोक गलोत का जन्म 3 मई, 1951 को राजस्थान के जोधपुर के महामंदिर इलाके में हुआ। अशोक गहलोत के पिता लक्ष्मण सिंह गहलोत एक मशहूर और पेशेवर जादूगर थे। अशोक गहलोत की शादी 27 नवंबर, 1977 को सुनीता गहलोत के साथ हुई। दोनों का एक बेटा और एक बेटी है। वैभव गहलोत अशोक गहलोत के बेटे और सोनिया गहलोत उनकी बेटी हैं। आज भी गहलोत को जादूगरी पसंद है। लेकिन, उनकी राजनीतिक जादूगरी उनके विरोधियों को परेशानी में डालती रहती है। (ऊपर वाली तस्वीर-अशोक गहलोत जोधपुर में अपनी बहन विमला शंखला से मुलाकात करते हुए- 5 अक्टूबर, 2022)

अशोक गहलोत की शिक्षा
अशोक गहलोत विज्ञान और कानून में ग्रैजुएट हैं। जबकि, उन्होंने अर्थशास्त्र विषय से पोस्ट-ग्रैजुएट की डिग्री हासिल कर रखी है। गहलोत के जोधपुर कॉलेज के एक सहपाठी प्रकाश भंडारी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि जब भी जोधपुर में उनके पिता जादू का शो दिखाने जाते थे, तो अशोक गहलोत भी उनका सहयोग करने उनके साथ जाते थे। उन्होंने यह भी बताया कि छात्र जीवन में अशोक गहलोत डॉक्टर बनना चाहते थे, लेकिन आखिरकार राजनीति के जादूगर बन गए।

अशोक गहलोत की संपत्ति
2018 के विधानसभा चुनाव में नामांकन भरते वक्त अशोक गहलोत ने चुनाव आयोग में अपनी संपत्ति का जो ब्योरा दिया था, उसके मुताबिक तब उनके पास कुल 6.53 करोड़ रुपए से ज्यादा की संपत्ति थी। इसमें 1.44 करोड़ रुपए से ज्यादा की चल और 5 करोड़ रुपए से अधिक की अचल संपत्ति थी। वे तब सालाना 18,56,828 रुपए का इनकम टैक्स दे रहे थे। हालांकि, तबतक उनके पास अपनी कोई गाड़ी नहीं थी।












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