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Ajmer Dargah News: बेटा सलीम हुआ तो अकबर पैदल चले आए अजमेर दरगाह, साथ में लाए भारत की सबसे बड़ी देग

Ajmer Dargah Today News: राजस्‍थान के अजमेर में स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह इन दिनों हिंदू सेना अध्‍यक्ष विष्‍णु गुप्‍ता द्वारा उसकी जगह शिव मंदिर होने के दावा करने वाली याचिका की वजह से चर्चा में है। गरीब नवाज अजमेर शरीफ में मुगल बादशाह अकबर की गहरी आस्‍था थी। अकबर के बेटा पैदा हुआ तो वे पैदल ही अजमेर दरगाह चले आए थे और अपने साथ भारत की सबसे देग भी लेकर आए, जो आज भी दरगाह में मौजूद है।

अजमेर शरीफ दरगाह इतिहास से कई दिलचस्‍प किस्‍से जुड़े हैं। उन्‍हीं में से एक किस्‍सा दो देग (छोटी व बड़ी) का भी है। कहते हैं कि 1567 में अबकर ने अजमेर दरगाह में मन्‍नत मांगी कि अगर एक बेटा हो जाए तो पैदल आकर अजमेर दरगाह में शीश नवाएंगे। दो साल अकबर की मन्‍नत पूरी हुई और 1569 में बेटा सलीम पैदा हुआ।

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Ajmer Dargah Degh Cooking

सलीम के पैदा होने पर बादशाह अकबर 15 दिन तक पैदल सफर करके अजमेर दरगाह पहुंचा और सिर झुकाया। अजमेर में अकबर ने अकबरी मजिस्‍द का भी निर्माण करवाया। इसके अलावा जब अकबर अजमेर आया तो अपने साथ भारत की सबसे बड़ी देग (भोजन पकाने की बड़ी कढ़ाई) भी लाया, जो दरगाह में भेंट की। अकबर के बाद बादशाह जहांगीर ने भी अजमेर दरगाह को देग भेंट की, जिसे छोटी देग के नाम से जाना जाता है।

ajmerdargahsharif.com के अनुसार प्राचीन काल से ही दरबार-ए-ख्वाजा में दो देग हैं। बड़ी देग 37 फीट चौड़ी है तथा इसका वजन 4800 किलो है। इस देग में मीठे चावल (जर्दा) पकाए जाते हैं। जिसमें चावल, घी, काजू, बादाम, पिस्ता तथा केसर का प्रयोग किया जाता है। बादशाह अकबर ने पुत्र प्राप्‍ति की अपनी इच्छा पूरी होने पर ख्वाजा साहब के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए यह देग चढ़ाई थी। इस देग को अकबर देग के नाम से जाना जाता है।

अजमेर दरगाह में छोटी देग 22 फीट चौड़ी है। इसका वजन 2400 किलो है। इस देग में मीठे चावल पकाए जाते हैं। इस देग में भी उपरोक्त सामग्री का प्रयोग किया जाता है। यह छोटी देग बादशाह जहांगीर ने चढ़ाई थी। मीठे चावल केवल इन्हीं दो देगों में पकाए जाते हैं। बिरयानी या पुलाव नहीं, क्योंकि हर धर्म के श्रद्धालु यहां आकर इस नियाज को खाते हैं।

अजमेर शरीफ़ दरगाह में देग से जुड़ी कुछ खास बातें

बड़ी देग तैयार करने का खर्च 1,51,000 रुपये है और छोटी देग 80,000 रुपये है।
मन्‍नत पूरी होने पर देग के लिए कोई भी व्‍यक्ति ऑनलाइन बुकिंग करवा सकता है।
देग में चावल, घी, चीनी, ज़ाफ़रान, सूखे मेवे व इलायची मिलाकर जर्दा बनाया जाता है।
देग में पकने वाले मीठे चावल को सुबह-सुबह जायरीन में बांटा जाता है।
रमज़ान और उर्स के मौके पर अकीदतमंद लोग देग पकवाते हैं।
देग पकवाने का मकसद ख्वाजा गरीब नवाज़ की शिक्षाओं को आगे बढ़ाना भी है।
इस देग में सदियों से शाकाहारी भोजन तैयार किया जा रहा है।
विभिन्न धर्मों के श्रद्धालु भी इस लंगर के लिए योगदान देते हैं।

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