पंजाब में दलित जातियों का वोटिंग पैटर्न कांग्रेस को कर सकता है परेशान, जानिए क्या कहते हैं आंकड़े ?
चंडीगढ़, 23 सितंबर: पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की जगह पर चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम बनाकर एकबार तो कांग्रेस ने सभी राजनीतिक पंडितों को झटका दे दिया। प्रदेश में पहला दलित सीएम बनाकर राहुल गांधी के करीबियों को लगने लगा कि उन्होंने तो ऐसी तरकीब निकाली है कि इसका असर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड चुनावों में भी देखने को मिल सकता है। पार्टी निश्चिंत होने लगी कि अब न तो अकाली दल और बसपा का गठबंधन काम आ पाएगा और ना ही आम आदमी पार्टी की लोक-लुभावन वादों के पिटारे से निकली राजनीतिक चालबाजियां। लेकिन, राजनीति में बहुत कुछ जो सामने से दिखता है, असल में धरातल पर वह हो नहीं पाता है और चरणजीत सिंह चन्नी के मामले में भी कांग्रेस को आने वाले दिनों में पंजाब में उन्हीं जातीय चुनौतियों से मुकाबला करना पड़ सकता है।

कांग्रेस दलित जातीयों में वर्चस्व की लड़ाई का कैसे करेगी सामना ?
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस के घायल शेर की तरह हैं। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के इशारे से पार्टी और पार्टी आलाकमान को लेकर जो कुछ भी कहा है, वह कुछ महीनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए दल की सेहत के लिए अच्छे संकेत नहीं माने जा सकते हैं। ऊपर से चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस यह मानकर कतई नहीं चल सकती की प्रदेश की करीब 32 फीसदी अनुसूचित जाति की आबादी अब उसके वोट बैंक में तब्दील हो चुका है। क्योंकि, एक्सपर्ट का मानना है कि पंजाब में दलित जातियों ने कभी भी किसी के लिए एकमुश्त वोट नहीं दिया है और उनमें आपस में भी राजनीतिक जबर्दस्त वर्चस्व की लड़ाई है।

पंजाब में अनुसूचित जातियों का अंकगणित
2011 की जनगणना के मुताबिक पंजाब में 32 फीसदी यानी करीब एक-तिहाई अनुसूचित आबादी के अलावा 19.4% सिख, 12.4% हिंदू और 0.98% बौद्ध हैं। दलितों को लेकर तथ्य यह है कि इनकी विभिन्न जातियां भी आपस में जातिगत आधार पर काफी विभाजित रही हैं। मसलन, राज्य में अनुसूचित जातियों की जनसंख्या की बात करें तो इनमें 26.33% मजहबी सिख, 20.76% रविदसिया और रामदसिया, 10.17% अद-धर्मी और 8.06% बाल्मीकि हैं। इनमें मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी रामदसिया समाज से आते हैं।

'किसी भी एक पार्टी के साथ नहीं रहती हैं दलित जातियां'
न्यूइंडियन एक्सप्रेस पोर्टल ने पंजाब की राजनीति को नजदीक से समझने वाले एक राजनीतिक पर्यवेक्षक के हवाले से कहा है कि, 'हिंदू और सिख समुदाय की अनुसूचित जातियां पंजाब में किसी भी एक पार्टी को वोट नहीं देतीं हैं। वह उसी पार्टी को वोट देती हैं, जिससे वह पहले से जुड़ी रही हैं। राजनीतिक वर्चस्व के लिए मजहबी सिखों, रविदसिया, रामदसिया और अद-धर्मी समाज के बीच आपसी प्रतियोगिता रहती है। इससे कांग्रेस के लिए परिस्थितियां उलझ सकती हैं।'

'कांग्रेस को मिलेगा फ्लोटिंग वोट का मौका'
उनका यह भी आकलन है कि 'राज्य में अनुसूचित जाति में मजहबी सिख सबसे बड़ा समुदाय है। विपक्षी पार्टियां अब उनपर डोरे डालने का काम करेंगी। शहरों में रहने वाले बाल्मीकि हमेशा कांग्रेस के साथ जाते हैं। शिरोमणि अकाली दल ने ग्रामीण इलाकों में रहने वाले मजहबू सिख समुदाय में अपनी पैठ बनाने में कामयाबी पाई है। अगर चन्नी का प्रदर्शन अच्छा रहता है तो पांच फीसदी फ्लोटिंग वोट कांग्रेस के हक में जा सकता है।'

कैप्टन यूं ही नाराज रहे तो कांग्रेस को हो सकता है बड़ा नुकसान
यानी दिल्ली में 10 जनपथ और उससे भी बढ़कर राहुल गांधी के सिपहसलारों ने चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर जरूर अपना मास्टरस्ट्रोक आजमाया है। लेकिन, पंजाब में अकेले दलित कार्ड के जरिए कांग्रेस अमरिंदर सिंह की नाराजगी का काट निकाल लेगी, यह कहना अभी बहुत ही जल्दबाजी है। वैसे भी कैप्टन ने राहुल और उनकी बहन प्रियंका गांधी को अपने 'बच्चे जैसा' समझकर जिस तरह से उनके अनुभव पर सवाल उठा दिया है और हर हाल में सिद्धू को हराने की ठान ली है, उससे कांग्रेस को काफी नुकसान हो सकता है। क्योंकि, राहुल ने भले ही चन्नी के नाम पर दांव लगाया है, लेकिन उनकी ओर से पार्टी के असल चेहरे के तौर पर तो भाजपा से गुलाटी मारकर आए सिद्धू को ही पेश किया जा रहा है। यानी अमरिंदर की ओर से सिद्धू को रोकने के लिए कोई भी 'त्याग' करने का मतलब होगा, कांग्रेस को नुकसान।












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