पंजाब चुनाव: शहरी मतदाताओं सें नहीं जुड़ पा रहा संयुक्त किसान मोर्चा, बात पहुंचाने में हो रही मुश्किल

पंजाब चुनाव: शहरी मतदाताओं सें नहीं जुड़ पा रहा संयुक्त किसान मोर्चा, बात पहुंचाने में हो रही मुश्किल

चंडीगढ़, 26 जनवरी: पंजाब में हो रहे विधानसभा चुनाव में इस बार कई किसान संगठन, संयुक्त समाज मोर्चा (एसएसएम) के बैनर तले उतरे हैं। संयुक्त समाज मोर्चा के कैंडिडेट ग्रामीण इलाकों में तो आसानी से कैंपेन कर रहे हैं लेकिन शहरी मतदाताओं के बीच अपनी बात रखने में उनको मुश्किल आ रही है। शहरों में किसान संगठनों की राजनीतिक पार्टियों की तरह ना तो पहचान है और ना ही उनके कार्यकर्ता हैं। ऐसे में एसएसएम के सामने ये चुनौती है कि शहरी मतदाताओं तक अपनी बात कैसे पहुंचाएं।

 पंजाब चुनाव

एसएसएम का हिस्सा, अखिल भारतीय किसान के उपाध्यक्ष लखबीर सिंह निजामपुरा का कहना है कि हमारा कैडर ग्रामीण पृष्ठभूमि से है। उसने केंद्र को तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए मजबूर किया लेकिन और शहरी मतदाताओं को लगता है कि एसएसएम उम्मीदवारों को उनके मुद्दों की जानकारी नहीं है। उन्होंने मानना है कि एसएसएम को इस पर फिर से विचार करना चाहिए कि शहरी सीटों पर चुनाव लड़ा जाए या नहीं।

निजामपुरा कहते हैं कि उन्होंने शहरी क्षेत्रों में एसएसएम के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए उद्योगपतियों और बड़े किसानों को टिकट दिए हैं, फिर भी उन्हें लगता है कि पारंपरिक राजनीतिक दल अपने संगठन और कैडर के चलते शहरों में ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं। उन्होंने ये भी कहा कि हालांकि अब यह किसान आंदोलन नहीं है, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन है। इसलिए शहरी लोग भी हमारी विचारधारा के प्रति झुकाव रखते हैं।

हमें सभी का समर्थन मिल रहा लेकिन

जम्हूरी किसान सभा के प्रदेश अध्यक्ष सतनाम सिंह अजनाला ने कहा कि पंजाब को कर्ज से मुक्ति दिलाना, पंजाब के युवाओं को रोजगार के अवसर पैदा कर विदेश जाने से रोकना, नशा खत्म करना और बेहतर शासन देना, जो कि पंजाब की जनता ने नहीं देखा है, हमारे मुद्दे हैं। इसी पर हम चुनाव में हैं।

अमृतसर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र से एसएसएम उम्मीदवार अमरजीत सिंह असल कहते हैं कि एसएसएम भले ही किसानों संगठनों का मोर्चा है लेकिन उद्योगपतियों, दुकानदारों, मजदूरों और कर्मचारियों से अपार समर्थन हमको मिला है। जब हम प्रचार करने जाते हैं तो लोग हमें समझते हैं और जानते हैं कि हमने एक आंदोलन जीता है। हालांकि वो ये भी मानते हैं कि शहरी मुद्दे कुछ अलग हैं।

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