Punjab Congress में कलह फिर शुरू! चन्नी-वड़िंग आमने-सामने, 2027 चुनाव से पहले कांग्रेस में तीन धड़ों की लड़ाई
Punjab Congress Crisis: पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 के ठीक पहले पंजाब कांग्रेस के भीतर एक बार फिर वैसी ही विस्फोटक स्थिति पैदा हो गई है, जैसी साल 2021 में देखने को मिली थी। साल 2021 में कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच की तनातनी ने कांग्रेस को पंजाब की सत्ता से बाहर कर दिया था।
अब 2026 में इतिहास खुद को दोहरा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार चेहरे बदल गए हैं। अब वर्चस्व की यह जंग पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के बीच छिड़ चुकी है।

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि दिल्ली में बैठा कांग्रेस हाईकमान इस बार भी बिल्कुल पुराने ढर्रे पर चल रहा है। हाईकमान ने इस गंभीर संकट पर भी 'साइलेंट मोड' (चुप्पी) धारण कर रखी है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दिल्ली के नेताओं को पंजाब के राजनीतिक 'इमोशन' का अंदाजा ही नहीं है। इसी ढीले रवैये के कारण पार्टी एक बार फिर बर्बादी की कगार पर पहुंच गई है।
आखिर विवाद की शुरुआत क्यों हुई?
बताया जा रहा है कि पंजाब कांग्रेस संगठन के पुनर्गठन के बाद अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को फिर से प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने से चन्नी समर्थक नाराज हैं। चन्नी खेमे का कहना है कि पार्टी को 2027 चुनाव के लिए अभी से मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करना चाहिए। वहीं राजा वड़िंग समर्थक संगठन को मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं। यही मतभेद अब खुली लड़ाई में बदल चुका है।
सड़कों पर आई जंग: चन्नी का शक्ति प्रदर्शन, राजा वड़िंग का पलटवार
पंजाब कांग्रेस के दोनों गुटों की यह लड़ाई अब बंद कमरों से निकलकर सड़कों पर आ चुकी है। दोनों नेता अपनी-अपनी ताकत दिखाने में जुटे हैं। पूर्व सीएम चरणजीत सिंह चन्नी ने मोरिंडा में स्थित अपने घर पर नाराज पूर्व विधायकों और दिग्गज नेताओं की एक बड़ी बैठक बुलाई। इस जमघट के जरिए चन्नी ने हाईकमान को अपनी ताकत का अहसास कराया है।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक-प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग पंजाब के हर क्षेत्र का दौरा कर रहे हैं। वे स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं से मिलकर अपने समर्थन में सरेआम नारेबाजी और खुले ऐलान करवा रहे हैं।
सिद्धू गुट की एंट्री से मामला हुआ त्रिकोणीय; सीधे इस्तीफे की मांग
चन्नी और राजा वड़िंग की इस लड़ाई के बीच अब नवजोत सिंह सिद्धू गुट ने भी एंट्री मार दी है। इससे पंजाब कांग्रेस में दो नहीं बल्कि तीन फाड़ होने की स्थिति बन गई है। सिद्धू के बेहद करीबी और पूर्व मंत्री रजिया सुल्ताना के पति, पूर्व डीजीपी (DGP) मोहम्मद मुस्तफा ने इस विवाद में कूदते हुए सीधे राजा वड़िंग के इस्तीफे की मांग कर दी है। इस त्रिकोणीय घमासान के कारण कार्यकर्ताओं में भारी असमंजस है कि वे आखिर किस नेता के पीछे खड़े हों।
2021 बनाम 2026: जानिए कैसे बिल्कुल सेम है कलह का पूरा पैटर्न
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2021 और आज के संकट में बहुत सी हैरान करने वाली समानताएं हैं। 2021 में लड़ाई तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच थी। आज 2026 में यही मुकाबला पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष राजा वड़िंग के बीच खुला रूप ले चुका है।
2021 में विवाद की वजह संगठन पर कब्जे और बेअदबी के मुद्दे को लेकर थी। वहीं, 2026 में विवाद की असली वजह पंजाब संगठन के पुनर्गठन में राजा वड़िंग को दोबारा कमान सौंपना है। इसके विरोध में चन्नी समर्थक अड़ गए हैं कि चन्नी को तुरंत मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया जाए।
2021 में विवाद शुरू होने के बाद हाईकमान 60 दिनों तक चुप बैठा रहा, जिससे स्थिति बिगड़ी और कैप्टन को जबरन हटाना पड़ा। ठीक इसी तरह 2026 में भी अजय माकन और मीनाक्षी नटराजन कमेटी ने अपनी फीडबैक रिपोर्ट में राजा वड़िंग को लेकर नेगेटिव बातें कही थीं। इसके बावजूद हाईकमान ने वड़िंग को पद पर बनाए रखा, जिससे चन्नी खेमा भड़क गया।
2021 में कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत की सरकार थी, लेकिन आपसी कलह के कारण कैप्टन भाजपा में चले गए और कांग्रेस 2022 का चुनाव हार गई। आज 2026 में कांग्रेस पहले से ही विपक्ष में है, फिर भी नेताओं की गुटबाजी अपने चरम स्तर पर है।
2026 की इस कलह का विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस पर क्या होगा असर?
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इस आंतरिक कलह का खामियाजा कांग्रेस को 2027 के चुनावों में भुगतना पड़ेगा। जब बूथ स्तर का छोटा कार्यकर्ता अपने बड़े नेताओं को एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी करते देखता है, तो उसका चुनावी जोश खत्म हो जाता है। जमीन पर काम करने के बजाय कैडर पूरी तरह निराश बैठ गया है।
साल 2021 की गुटबाजी के चलते 2022 के चुनाव में कांग्रेस सिमटकर सिर्फ 18 सीटों पर आ गई थी। इस बार भी अगर यह कलह नहीं थमी, तो कांग्रेस का विरोधी वोट पूरी तरह से भाजपा (BJP) की तरफ शिफ्ट हो जाएगा। कांग्रेस खुद अपने हाथों अपनी हार की स्क्रिप्ट लिख रही है।
पंजाब कांग्रेस के कई नेता इस समय सिर्फ सत्ता और पावर की तलाश में हैं। अगर उन्हें कांग्रेस के भीतर अपनी मनमर्जी की पावर नहीं मिली, तो वे पाला बदलकर भाजपा का दामन थाम सकते हैं। वैसे भी इस समय पंजाब में जमीन मजबूत करने के लिए भाजपा के पास बाहरी नेताओं के लिए काफी 'वेकेंसी' है।














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