पंजाब में सियासी घमासान, प्रशांत किशोर के सहयोगी रहे बद्री नाथ ने बताया इस तरह के बन सकते हैं समीकरण
चुनावी रणनीतिकार बद्री नाथ ने बताया कि कांग्रेस अगर देश में कमजोर हो रही है तो इसकी ख़ास वजह प्रबंधन की कमजोरी और केंद्रीय नेतृत्व की पकड़ का कमजोर होना और राजनीतिक कुप्रबंधन है।
चंडीगढ़, सितंबर 18, 2021। पंजाब विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र जहां सियासी पार्टियां चुनावी तैयारियों में जुटी हुई हैं। वहीं पंजाब कांग्रेस को कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस्तीफ़ा देकर बड़ा झटका दिया है। वन इंडिया हिंदी ने इस बाबत प्रशांत किशोर के सहयोगी रहे चुनावी रणनीतिकार बद्री नाथ से बात की उन्होंने बताया की किस तरह से कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफ़ा से कांग्रेस कमज़ोर होगी। चुनावी रणनीतिकार बद्री नाथ ने बताया कि कांग्रेस अगर देश में कमजोर हो रही है तो इसकी ख़ास वजह प्रबंधन की कमजोरी और केंद्रीय नेतृत्व की पकड़ का कमजोर होना और राजनीतिक कुप्रबंधन है। जो भी हो बाहर से आने वाले व्यक्ति को अगर ज़रूरत से ज्यादे महत्व दिया जाता है तो पार्टी में पहले से विद्यमान लोग असहज होने लगते हैं । इसलिए सबसे ज़रूरी बात यह है कि बाहर से आने वाले नेता अपनी पूरी टीम लेकर आएं या फिर कम से कम पार्टी में 10 साल रहकर काम करें ताकि पार्टी पूरी तरह जुड़ पाएं।

बीजेपी तुरंत डिसिजन मेकिंग की ज़िम्मेदारी नहीं देती है
बीजेपी में बाहर से आने वाले बड़े नेता इसलिए बीजेपी में सही तरह से फिट हो जाते हैं क्योंकि बीजेपी बाहर से आए नेताओं को तुरंत डिसिजन मेकिंग जिम्मेदारी नहीं देती है पहले उनका इम्तेहान लेती है फिर पास होने पर उन्हें आगे करती है । ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस सरकार गिराने से लेकर उपचुनाव जीताकर बीजेपी को मध्य प्रदेश में स्थापित करने तक मंत्रालय नहीं पा सके । वही असम में कांग्रेस से बीजेपी में आए हेमंत विश्वा शर्मा के मामले में देखना पड़ा । मेरा मतलब 5 साल से ज्यादा अग्नि परीक्षा देना पड़ा । और ये दोनों नेता बीजेपी में अपनी पूरी टीम के साथ आए जबकि कांग्रेस में दूसरे दलों से आए कीर्ति आजाद हों राजबब्बर हों या फिर नवजोत सिंह सिद्धू सभी आए और बड़े पदों पर बिना रिजल्ट दिए स्थापित हो गए । इसका नतीजा ये रहा कि पार्टी से बड़े स्तर पर लोग दूसरे दलों में गए।

विपक्षी दल बना सकती है सरकार !
चुनावी रणनीतिकार बद्री नाथ ने कहा कि आसन्न चुनाव के बीचोबिच पंजाब में उपजे इस राजनीतिक संकट में कांग्रेस के सामने जहां 3 चुनौतियां वहीं आम आदमी पार्टी के पास 2 अवसर हैं। आम आदमी पार्टी कांग्रेस के लोगों को बड़े स्तर पर जोड़कर सरकार का गठन कर सकती है। मुख्य विपक्ष होने और आक्रामक प्रचार नीति के दम पर अगली सरकार भी बना सकती है। जिस तरह 2013 में 33 दिन वाली दिल्ली की कांग्रेस के गठबंधन वाली सरकार जैसा कुछ करते हुए उसे मॉडल बनाकर जनता के बीच अपनी सरकार बनाई थी । वैसे आम आदमी पार्टी के लिए सरकार बना पाना काफी मुश्किल है क्योंकि कांग्रेस के पास 77, आम आदमी पार्टी के पास 22 तो वहीं शिरोमणि अकाली दल के 18 विधायक हैं । आम आदमी पार्टी और शिरोमणि अकाली दल मिले और कांग्रेस के कुछ विधायक तोड़े तो ऐसा सरकार बनान मुमकिन हो सकता है । अगर ऐसा नहीं हो पाया तो बीजेपी वहां पर राष्ट्रपति शासन लगाकर सत्ता का 6 माही नियंत्रण लेने की भी पूरी कोशिश करेगी । पर केजरीवाल को इस समय यह निर्णय तुरंत लेना होगा उनका चेहरा कौन होगा ? और सरकार बनाने के लिए अविलंब जोड़ तोड़ में लगना होगा ।

कांग्रेस पहले भी कर चुकी है ऐसी ग़लती
चुनावी रणनीतिकार बद्री नाथ ने कहा कि अब वक़्त बहुत कम बचा है लेकिन कैप्टन अमरिंदर सिंह नई पार्टी बनाकर अपना राजनीतिक भविष्य तलाश सकते हैं । वैसे कहावत है बूढ़ा हाथी भी 9 लाख का । कैप्टन कांग्रेस को तोड़कर और 77 विधायकों को जोड़कर भी सरकार बचा सकते थे पर ऐसा उन्होंने नहीं किया, क्यों नहीं किया ? यह अबतक उजागर नहीं हुआ है। ऐसी ग़लती कांग्रेस पहली बार नहीं कर रही है, हरियाणा में तंवर और हुड्डा के बीच द्वंद में 5 साल तक संगठनों का कोई ढांचा नहीं तैयार हो सका था और चुनाव आने तक स्थिति साफ़ नहीं हो सकी और अंत में तंवर चले गए । वहीं हुड्डा अंत में अपनी पूरी ताकत झोककर भी सरकार नहीं बना सके ।

शिअद उठा सकती है सियासी फ़ायदा
कांग्रेस दिशाहीन स्थिति में प्रयास कर रही है इस वजह से बीजेपी के कमजोर होने पर भी कांग्रेस के आने की संभावना कम होती जा रही है । बीजेपी के कमजोर होने पर क्षेत्रीय दलों के आने की संभावना बढ़ेगी । उम्मीद है महंगाई बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर होने वाले चुनावों में राज्यों में फिर से क्षेत्रीय दलों की सरकारें बनेगी और केंद्र में गठबंधन की सरकारों का जमाना फिर से आएगा। कुल मिलाकर कांग्रेस अब पंजाब की सियासत में हासिए पर जा चुकीं है । इस राजनीतिक संकट में अकाली दल के लिए भी उभरने का अवसर मिलेगा ये उनपर निर्भर करता है कि वो कैसा और कितना प्रभावी रणनीति के तहत राजनीतिक परिस्थितियों का फ़ायदा उठाते हैं ।
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