'आरक्षण नहीं होता तो मांझी-पासवान जैसे लोग नेता भी नहीं होते'
पटना (मुकुंद सिंह)। अारएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण नीति पर पुनर्विचार की बात कहकर एक भूचाल ला दिया है। अब वक्त चुनाव का है और बिहार में चुनावी माहौल है तो ऐसे में विरोधी खेमा भी इसे पूरी तरह से भूनाने में लगा है। लेकिन अब भागवत के बचाव और विरोधियों का मुंह बंद करने के लिए सुशील मोदी और मांझी ने करारा जवाब दिया है। लेकिन यह जवाब भाजपा के पक्ष में है या विपक्ष में यह सोचने वाली बात है।
लालू की चुनौती- हिम्मत है तो आरक्षण समाप्त करके दिखाओ
सुशील मोदी का कहना है कि आरक्षण के बारे में कोई पुर्नविचार करने की आवश्यकता नहीं है और जबतक भाजपा देश की राजनीति में है, तबतक दुनिया की कोई ताकत दलितों और पिछड़ों का आरक्षण छीन नहीं सकती है। ये उनका संवैधानिक अधिकार है और इसपर कोई पुनर्विचार की आवश्यकता नहीं है। आज यदि आरक्षण नहीं होता तो रामविलास पासवान और जीतनराम मांझी जैसे लोग नेता नहीं बन पाते।
खास बात यह है कि सुशील मोदी का यह बयान मांझी आैर पासवान की काबलियत पर सवाल उठा रहा है। सवाल यह है कि ये दोनों इतने बड़े नेता अपनी मेहतन के बल पर बने हैं या फिर आरक्षण ने उन्हें यहां तक पहुंचाया है।
इसके बाद जोर देते हुए सुशील मोदी ने भागवत के पक्ष में खुलकर समर्थन करते हुए कहा कि उनके बयानों को तोड़ - मरोड़ कर पेश किया गया है। उन्होंने तो ये कहा है कि नये वर्गों को भी आरक्षण में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने तो ये कहा है कि जो तबके आरक्षण से वंचित हैं। उन तबकों को भी आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।
गौरतलब है कि भागवत ने संघ के मुखपत्रों ‘पांचजन्य' और ‘आर्गेनाइजर' को एक साक्षात्कार दिया था। उस साक्षात्कार में भागवत ने सरकार को सुक्षाव दिया है कि, आरक्षण की नीति पर पुनर्विचार का समय आ गया है और इसके लिए एक गैर-राजनीतिक समिति बनाई जानी चाहिए जो यह तय करे कि कितने लोगों को कितने दिनों तक आरक्षण की जरूरत होनी चाहिए।
क्या कहा मांझी ने
एनडीए गठबंधन में शामिल जीतनराम मांझी भागवत के बयान के बचाव में उतरे हैं। उन्होंने कहा है कि, जवाहरलाल नेहरू ने भी 1962 में पार्लियामेंट में कहा था कि, इस तरह से बेतरतीब आरक्षण का कोड आगे नहीं बढ़ाना चाहिए बल्कि उसको रिव्यू करना चाहिए। तो वैसी परिस्थिति में आज जब भागवत जी रिव्यू की बात कर रहे हैं और उन्होंने कोई इसे रोकने की बात तो नहीं की है। और हम भी कहते हैं कि आज इसका रिव्यू होना चाहिए।
बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा पूरे रणनीति के तहत अपना वोट बैंक जुटाने की कोशिश में लगी हुई है। गठबंधम में भी अपने नेताओं को खुश करने का पूरा प्रयास कर रही है। टिकट बंटवारे पर जो भी मुश्किलें हो रही हैं, उसमें एक बीच का रास्ता निकालने के पूरे प्रयास भी कर रही है। कुल मिलाकर वो अपनी तरफ से कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती। लेकिन भाजपा का ये पूरा खेल अब बिगड़ता दिख रहा है।













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