दूसरों को सीएम-पीएम बनाने वाले प्रशांत किशोर खुद नेतागिरी में हो गये फेल

पटना। प्रशांत किशोर दलीय राजनीति में न जम सके न रम सके। अब उन्होंने फिर चुनावी रणनीतिकार बनने का फैसला किया है। एक नेता के रूप में वे भले नाकाम रहे लेकिन चुनावी रणनीति बनाने में उनका कोई जवाब नहीं। इलेक्शन कैंपेन के वे माहिर खिलाड़ी हैं। अगर यूपी में कांग्रेस के कड़वे अनुभव को छोड़ दिया जाए तो उनको इस काम में अब तक कामयाबी ही मिली है। ताजा उदाहरण आंध्र प्रदेश का है जहां उन्होंने जगन मोहन रेड्डी को अपनी रणनीति से जबर्दस्त कामयाबी दिलायी। प्रशांत किशोर की सेवाएं लेने के बाद जगन मोहन रेड्डी की वाइएसआर कांग्रेस 171 में 151 सीटें जीतने में कामयाब हुई। नरेन्द्र मोदी, नीतीश कुमार और कैप्टन अमरिंदर सिंह को वे पहले ही जीत का स्वाद चखा चुके हैं। अब वे हार से घबरायीं ममता बनर्जी को जीत का गुरुमंत्र बताएंगे।

कौन हैं प्रशांत किशोर?

कौन हैं प्रशांत किशोर?

प्रशांत किशोर के बिहार के बक्सर के रहने वाले हैं। उनकी उम्र अभी 42 साल है। उनके पिता डॉ. श्रीकांत पांडेय बक्सर के जिला अस्पताल में मेडिकल सुपरिन्टेंडेंट थे। रिटायर होने के बाद वे बक्सर में प्रैक्टिस करते थे। कुछ समय पहले ही उनका निधन हुआ है। प्रशांत किशोर के बड़े भाई अजय किशोर दिल्ली में रहते हैं। पटना में भी उनका व्यवसाय है। उनकी दो बहनें भी हैं। उनके एक बहनोई सेना में अधिकारी हैं। प्रशांत किशोर की शुरुआती पढ़ाई बिहार में हुई। फिर वे इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के लिए हैदराबाद चले गये। इंजीनियर बनने के बाद उनको यूनिसेफ में नौकरी मिल गयी। यहां उनको अलग-अलग वैश्विक मुद्दों की ब्रांडिंग का काम सौंपा गया। प्रशांत किशोर ने यहीं सीखा कि किसी खास मुद्दे को कैसे लोगों के बीच लोकप्रिय बनाना है। अमेरिका में रहने के दौरान उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में आधुनिक चुनाव प्रचार को नजदीक से देखा और समझा था। 2011 में प्रशांत किशोर भारत लौटे।

2011 में नरेन्द्र मोदी से मुलाकात

2011 में नरेन्द्र मोदी से मुलाकात

प्रशांत किशोर जब भारत लौटे तो उसके कुछ दिनों के बाद नरेन्द्र मोदी ने 'वाइब्रेंट गुजरात' कार्यक्रम आयोजित किया। एक मित्र के जरिये प्रशांत किशोर भी इस कार्यक्रम से जुड़ गये। मोदी उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे और राज्य के विकास के लिए नये-नये सपने बुन रहे थे। इसी समय प्रशांत किशोर की मुलाकात नरेन्द्र मोदी से हुई। मोदी प्रशांत किशोर से बहुत प्रभावित हुए। जब मोदी ने जाना कि पीके यूनिसेफ में ब्रांडिंग का काम कर चुके हैं तो उन्होंने भी एक बड़ी जिम्मेदारी दे दी। प्रशांत किशोर ने वाइब्रेंट गुजरात की ब्रांडिंग का काम संभाल लिया। उन्होंने इस काम को बेहतर तरीके से अंजाम दिया। वाइब्रेंट गुजरात कार्यक्रम सफल हुआ तो मोदी का प्रशांत किशोर भरोसा बढ़ गया। इसके बाद प्रशांत किशोर ने 2012 के विधानसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के लिए बिना कोई फीस लिये इलेक्शन स्ट्रेटजी बनायी। इस काम को भी उन्होंने बखूबी किया। मोदी की फिर जीत हुई। अब मोदी प्रशांत के मुरीद बन चुके थे।

2014 के चुनाव में प्रोफेशनल एप्रोच

गुजरात की कामयाबी के बाद प्रशांत किशोर ने चुनावी प्रबंधन को प्रोफेशनल एप्रोच दिया। 2013 में उन्होंने सिटिजंस फॉर एकाउंटेबल गवर्नेंस (कैग) नामक संस्था बनायी। इसमें पेशेवर लोगों को जोड़ा। इसका मकसद आधुनिक तौर तरीकों से चुनाव का प्रबंधन करना था। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा लोकसभा चुनाव में उतरी तो इलेक्शन कैंपेन की रणनीति बनाने के जिम्मेवारी प्रशांत किशोर को मिली। प्रशांत किशोर ने मोदी की ब्रांडिंग के लिए नये नये आइडिया इजाद किये। इस चुनाव में 'चाय पे चर्चा' और 'थ्री डी रैली' ने कमाल कर दिया। भाजपा को प्रचंड जमसमर्थन मिला। नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन गये। लेकिन इसके बाद प्रशांत किशोर का भाजपा से मोहभंग हो गया। कहा जाता है कि अमित शाह जीत का क्रेडिट प्रशांत किशोर को नहीं देना चाहते थे। इसके बाद उन्होंने भाजपा से किनारा कर लिया था ।

2015 में आये थे नीतीश के साथ

2015 में आये थे नीतीश के साथ

नीतीश जब एनडीए में थे तब अरुण जेटली के घर उन्होंने प्रशांत किशोर को देखा था। उनके चर्चे भी सुने थे। 2015 के विधानसभा चुनाव के समय नीतीश को प्रशांत किशोर की याद आयी। तब तक दोनों भाजपा से अलग हो चुके थे। दोनों ही भाजपा को सबक सिखाना चाहते थे। प्रशांत किशोर नीतीश से जुड़ गये। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के लिए प्रशांत किशोर ने कैग को नये सिरे संगठित किया और इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आइपैक) के नाम से एक नया ग्रुप बनाया। उन्होंने अमेरिकी राजनीतिक दबाव समूह पैक यानी पॉलिटिकल एक्शन कमेटी की तर्ज पर इसका गठन किया। प्रशांत किशोर का गढ़ा नारा- 'बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो' सुपरहिट साबित हुआ। लोगों से जुड़ने के लिए 'घर घर दस्तक' अभियान चलाया। फिर तो नीतीश और महागठबंधन की बंपर जीत हुई। इसके बाद प्रशांत किशोर, नीतीश के सबसे करीबी बन गये।

2017 में प्रशांत के लिए धूप-छांव

2017 में प्रशांत किशोर ने यूपी में कांग्रेस के लिए चुनावी रणनीति बनायी थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के साथ प्रशांत किशोर का तालमेल नहीं बैठा। प्रशांत सीधे राहुल गांधी को रिपोर्ट करते थे, जिससे बड़े नेता असहज हो गये। कांग्रेस नेताओं की खींचतान में प्रशांत किशोर का अभियान फेल हो गया। कांग्रेस की करारी हार हुई। इससे प्रशांत किशोर की साख पर बट्टा भी लगा। लेकिन जब उन्होंने पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को जीत का सेहरा पहना दिया तो एक बार फिर उनकी पूछ बढ़ गयी। दो लगातार चुनाव हारने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह फिर सीएम बनने में कामयाब हुए। 2019 में प्रशांत ने दक्षिण के राज्य आंध्र प्रदेश में भी अपनी चुनावी रणनीति का सिक्का जमाया। जगन मोहन रेड्डी ने उनकी सेवाएं ली तो वे भी मुख्यमंत्री बन गये। अब वे पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी की चुनावी किस्मत चमकाएंगे।

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