नीतीश के अधिकारियों को नही पता कहां गये 34 हजार करोड़ रुपए!
पटना। यह अजीब विडंबना है कि साल दर साल गुजरने के बाद भी विकास मत में जारी किए गए पैसे का हिसाब बिहार सरकार को नहीं मिला है। वेतन बंदी से लेकर बैठक का दौरा चला, पर मुख्य सचिव के डंडा का असर विभागीय अधिकारी पर नहीं दिख रहा है। परिणाम यह की वर्तमान में 34 हजार करोड़ का हिसाब सरकार को नहीं मिल रहा है। क्षेत्रीय अधिकारी बहाना बनाने में भी माहिर हैं। कहीं बाढ़ में वाउचर बह जाते हैं तो कहीं अग्निकांड में रसीदों के जल जाने की बात करते हैं।

हाल ही में मुख्य सचिव अंजनी कुमार ने एसी-डीसी बिल के समायोजन और अनुदान मत में जारी किए राशि के उपयोगिता प्रमाण पत्र के समर्पित करने की स्थिति की समीक्षा की, जिसमें यह खुलासा हुआ कि 24 हजार करोड़ का हिसाब का कोई अता-पता नहीं है। समायोजन हो भी रहा है तो उसकी सत्यता पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है। यह पहले ही अस्पष्ट हो चुका है कि 2001-02 से लेकर 2005 -06 तक की अवधि के वाउचर्स नहीं मिल रहे हैं। बावजूद उस अवधि के हर माह 10 से 12 करोड़ का डीसी बिल समर्पित किया जा रहा है।
ट्रेजरी में जमा नहीं किय जा रहे बिल
हद तो यह है कि वर्ष 2012 में ट्रेजरी कोर्ट में संशोधन कर यह प्रावधान किया गया था कि एक एसी बिल के आधार पर निकासी की गई राशि की डीसी बिल जमा नहीं होगा तब तक दूसरा बिल की राशि जारी नहीं होगी। बावजूद 32 सो करोड़ की निकासी 31 मार्च 2015 की अवधि में की गई, जिसका डीसी बिल महालेखाकार को नहीं मिला है। जबकि डीसी बिल जमा कराने की जिम्मेवारी कोषागार पदाधिकारी को देने का प्रावधान नए कोड में किया गया है।
वित विभाग के आंकड़े के अनुसार 2001- 2 से लेकर 31 मार्च 2015 तक की अवधि में ऐसी बिल के आधार पर 34714 करोड़ 65 लाख की निकासी की गई, जिसमें अब तक 4758.33 करोड़ के डीसी बिल का अब तक समायोजन नहीं हो सका। इसी तरह 2001- 2 से लेकर 31 अगस्त 2014 की अवधि तक सहायक अनुदान कीमत में 11362.73 करोड़ की निकासी की गई। अब तक 21184 करोड़ का उपयोगिता प्रमाण पत्र महालेखा व सरकार को नहीं मिला है। यानि अब तक कुल 34,142 करोड़ का हिसाब मिल नहीं मिला है। जबकी समय पर उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं भेजने के कारण अक्सर केंद्र सरकार अगली किस्त की राशि रोक देती है।












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