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1989 में वीपी सिंह ने लालू-नीतीश को क्यों नहीं बनाया था केन्द्रीय मंत्री ?

1989 में लालू यादव और नीतीश कुमार लोकसभा चुनाव जीते तो जरूर थे लेकिन प्रधानमंत्री वीपी ने उन्हें मंत्री नहीं बनाया था। बिहार से रामविलास पासवान को कैबिनेट मंत्री बनाया गया था। उस समय शरद यादव उत्तर प्रदेश के बदायूं से जीते थे। वीपी सिंह उन्हें भी कैबिनेट मंत्री बनाया था। यानी दिसम्बर 1989 में रामविलास पासवान और शरद यादव की राजनीतिक हैसियत लालू-नीतीश से अधिक थी। जब वीपी सिंह ने लालू-नीतीश को मंत्री नहीं बनाया तो उन्हें ये बात अखर गयी थी। लालू यादव इस दर्द को 24 साल से सीने में दफन किये हुए थे। लेकिन सोमवार को पटना में उन्होंने आखिरकार इसे सार्वजनिक कर दिया। मौका था मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जीवन पर प्रकाशित पुस्तक का विमोचन।

1989- केन्द्रीय मंत्री नहीं बनने की पीड़ा जाहिर की लालू ने

लालू यादव ने कहा, मैं और नीतीश 1989 में जनता दल से सांसद चुने गये थे। केन्द्र में वीपी सिंह की सरकार बन रही थी। हम भी मंत्री बनाये जाने की उम्मीद कर रहे थे। हम रोज नया कपड़ा पहन कर इस आस में बैठे रहते कि शायद आज मंत्री पद के लिए बुलावा आ जाए। दोनों साथ में ओथ लेंगे। लेकिन वीपी सिंह ने शरद यादव को मंत्री बना दिया और हम नया-नया कपड़ा पहने बैठे ही रह गये।

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विवाद के साथ हुई वीपी सरकार की शुरुआत

1989 में राजीव गांधी की सरकार चुनाव हार गयी थी लेकिन किसी दल को बहुमत नहीं मिला था। जनता दल 144 सीटें मिलीं थीं। जनता दल ने भाजपा और वाम दलों के सहयोग से सरकार बनाने का निर्णय लिया। चुनाव के समय जनता दल ने वीपी सिंह के नाम पर वोट मांगा था और वादा किया था कि जीत मिलने पर वीपी सिंह ही प्रधानमंत्री बनेंगे। चुनाव में जीत मिलने पर चंद्रशेखर ने कह दिया कि अगर वीपी सिंह संसदीय दल के नेता पद का चुनाव लड़ेंगे तो वे भी लड़ेंगे। इससे गतिरोध पैदा हो गया। तब ये तय हुआ कि देवीलाल को संसदीय दल का नेता चुन लिया जाय और फिर देवीलाल खुद वीपी सिंह का नाम प्रस्तावित कर दें। ऐसी स्थिति में चंद्रशेखर, देवीलाल का विरोध नहीं कर पाएंगे। ये बात चंद्रशेखर से छिपा ली गयी। सचमुच ऐसा ही हुआ। पार्टी की इस अंदरुनी दांवपेंच से चंद्रशेखर बेहद नाराज हो गये। वे तो पहले से वीपी सिंह के विरोधी थे। इस बात ने उनका गुस्सा और भड़का दिया। वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने और देवीलाल उप प्रधानमंत्री बने।

वीपी सिंह की पहली कैबिनेट

वीपी सिंह अल्पमत की सरकार के प्रधानमंत्री बने थे। मंत्रिपरिषद में शामिल होने के लिए कई गुट दबाव बनाने लगे। वीपी सिंह ने इस दबाव को काटने के लिए भरपूर कौशल का इस्तेमाल किया। देवीलाल के समर्थक उन्हें गृहमंत्री बनाने की मांग कर रहे थे। लेकिन वीपी सिंह ने यह कह कर उन्हें कृषि मंत्री बना दिया कि ताऊ तो किसान नेता हैं। कृषि मंत्री के रूप में वे किसानों के लिए सबसे बेहतर काम करेंगे। वीपी सिंह ने मुफ्ती मोहम्मग सईद को गृहमंत्री बना कर एक बड़ी चाल चली। इससे देवीलाल का पत्ता भी कट गया और एक अल्पसंख्यक को गृहमंत्री बनाने का उन्हें श्रेय भी मिल गया। इससे अल्पसंख्यकों के बीच उनकी अच्छी छवि बन गयी।

1989 में लालू-नीतीश क्यों नहीं बन पाये केंद्रीय मंत्री ?

2 दिसम्बर 1989 को जब वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी तब मंत्री बनने के लिए बहुत जोड़तोड़ चल रही थी। वीपी सिंह, देवीलाल, चंद्रशेखर अपने अपने समर्थकों को अधिक से अधिक मंत्री दिलाना चाहते थे। दूसरी तरफ सहयोगी दल (तेलगू देशम पार्टी, द्रमुक, असम गण परिषद) भी अधिक से अधिक मंत्री पद चाहते थे। ऐसी स्थिति में नये सांसदों के लिए शायद ही मौका था। 1977 के बाद 1989 में लालू यादव दूसरी बार सांसद बने थे। वे 1980 और 1984 में छपरा से लोकसभा चुनाव हार गये थे। जब कि नीतीश कुमार पहली बार बाढ़ से सांसद बने थे। उस समय इन दोनों नेताओं की राष्ट्रीय राजनीति में कुछ खास पहचान नहीं थी। जब कि रामविलास पासवान हाजीपुर से 1977, 1980 और 1989 में तीसरी बार सांसद चुने गये थे। एक दलित नेता के रूप में उनकी राष्ट्रीय पहचान बन चुकी थी। इसलिए वीपी सिंह ने उन्हें अपनी पहली कैबिनेट में जगह दी। उन्हें श्रम मंत्री बनाया गया था। जब कि लालू यादव और नीतीश कुमार को कम अनुभव के कारण जगह नहीं मिल पायी थी।

मेहम कांड के बाद वीपी सिंह और देवीलाल में झगड़ा

दिसम्बर 1989 में वीपी सिंह की सरकार बनते ही गुटबाजी शुरू हो गयी। नाराज चंद्रशेखर, वीपी सिंह से हिसाब बराबर करने की ताक में रहने लगे। इसी बीच फरवरी 1990 में हरियाणा के मेहम में विधानसभा उपचुनाव हुआ। देवीलाल सांसद बनने के बाद उपप्रधानमंत्री बन चुके थे। इसकी वजह से उन्होंने मेहम विधानसभा सीट खाली कर दी थी। देवीलाल की जगह उनके पुत्र ओमप्रकाश चौटाला हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। उस समय ओमप्रकाश किसी सदन के सदस्य नहीं थे। ओम प्रकाश चौटाल मेहम उपचुनाव में खड़ा हुए। 27 फरवरी 1990 को उपचुनाव हुआ। वोटिंग में धांधली की शिकायत मिली तो चुनाव आयोग अगले दिन आठ बूथों पर दोबारा मतदान कराने का आदेश दिया। इस पुनर्मतदान में जबर्दस्त हिंसा हुई जिसमें करीब दस लोग मारे गये। इस घटना के बाद वीपी सिंह और देवीलाल के बीच गंभीर मतभेद पैदा हो गया। इस मतभेद की वजह से जनता दल में तीन गुट बन गये- वीपी गुट, देवीलाल गुट और चंद्रशेखर गुट। बाद में इसी गुटबाजी का फायदा लालू-नीतीश को मिला।

तीन बड़ों की लड़ाई में लालू-नीतीश को फायदा

लालू यादव जब दिसम्बर 1989 में केन्द्रीय मंत्री नहीं बन पाये तो वे बिहार में सक्रिय हो गये। 1990 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार हुई। जनता दल भाजपा और अन्य दलों के सहयोग से सरकार बनाने की स्थिति में आ गया। मार्च 1990 में लालू यादव सांसद थे लेकिन बिहार का मुख्यमंत्री बनने के लिए उन्होंने बिसात बिछा दी थी । अब जनता दल विधायक दल का नेता कौन बनेगा ? ये एक बड़ा सवाल था। अनूप लाल यादव, विनायक प्रसाद यादव और मुंशीलाल राय विधायक दल का नेता बनने की होड़ में थे। यही वह समय था जब जनता दल की केन्द्रीय गुटबाजी लालू यादव के काम आयी। वीपी सिंह राम सुंदर दास को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे जब कि देवीलाल लालू यादव के पक्ष में थे। मेहम कांड के बाद देवीलाल, वीपी सिंह को हर मौके पर मात देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने लालू यादव को आगे कर दिया। दूसरी तरफ चंद्रेशेखर किसी भी हाल में वीपी सिंह के उम्मीदवार रामसुदंर दास को हराना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अपनी तरफ से एक तीसरा उम्मीदावर रघुनाथ झा को खड़ा कर दिया। रघुनाथ झा ने सवर्ण विधायकों का वोट काट दिया जिससे लालू यादव विधायक दल के नेता का चुनाव जीत गये और मुख्यमंत्री बने।

नीतीश कुमार ऐसे बने थे केन्द्रीय मंत्री

मार्च 1990 में लालू यादव और नीतीश कुमार देवीलाल के नजदीक आ चुके थे। मई 1990 में प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंत्रीपरिषद का विस्तार किया। उस समय नीतीश कुमार के सिर पर देवीलाल का हाथ था। देवीलाल ने अपने गुट से मंत्री बनाने के लिए अन्य नेताओं के साथ नीतीश कुमार का नाम भी आगे किया था। तब वीपी सिंह ने नीतीश कुमार को कृषि राज्य मंत्री बनाया था।

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