बिहार चुनाव: यादव वोट पर टिका है पटना का भविष्य

पटना (मुकुन्द सिंह)। सूबे की राजनीति में जाति की कितनी अहम भूमिका है, इसका स्पष्ट प्रमाण पटना के सभी 14 विधानसभा क्षेत्र हैं। इनमें कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहां पर यादव वोट हावी हो रहा है।

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बांकीपुर और कुमहार सीटें

पटना के दो अहम क्षेत्र यथा बांकीपुर और कुम्हार जहां कायस्थ समाज बहुतायत में हैं तो वहां जीत उन्हीं उम्मीदवारों को मिलती है जो इस समाज से संबंध रखते हैं। बांकीपुर विधायक नीतिन नवीन और कुम्हरार विधायक अरूण कुमार सिन्हा इसके स्पष्ट प्रमाण हैं। वहीं पटना जिले के ग्रामीण इलाकों में तस्वीर बिल्कुल दूसरी हो जाती है। जिले के पांच विधानसभा क्षेत्रों में यादवों का राज है।

ये क्षेत्र हैं पटना साहिब, बख्तियारपुर, फतुहां, दानापुर और मनेर। इनमें से दो भाजपा और तीन पर राजद का कब्जा है। हालांकि बदली परिस्थिति में दोनों गठबंधनों के पास जीतने की चुनौती है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि बिहार की राजनीति में शेर का दर्जा पा चुके रणबांकुरों को भी अपनी मांद बचाने की चुनौती बदली हुई राजनीति ने पेश कर दिया है।

पटना साहिब विधानसभा क्षेत्र

यहां भाजपा के कद्दावर नेता और विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता नंद किशोर यादव का कब्जा बरकरार है, के सामने भी इस बार अपना ताज बचाने की चुनौती है। वजह यह है कि पिछली बार उन्हें यादव मतों में बिखराव के अलावा जदयू कोटे के वोट भी मिले थे, जिसके कारण उन्होंने अच्छे मार्जिन से जीत हासिल किया था। पिछली बार उन्हें 91 हजार 419 मत हासिल हुए थे जबकि कांग्रेसी उम्मीदवार परवेज अहमद को 26 हजार 82 वोट मिले थे।

राजद ने राजेश कुमार को अपना उम्मीदवार बनाकर नंद किशोर यादव को सहायता पहुंचायी थी। श्री कुमार को तब केवल 8271 मत ही मिल सके थे। हालांकि यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं कही जायेगी कि पिछली बार पटना साहिब विधानसभा क्षेत्र में हिन्दू बनाम मुस्लिम के आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण हुआ था। लेकिन इस बार चूंकि राजद, जदयू और कांग्रेस का गंठजोड़ है इसलिए राजनीतिक समीकरणों में बदलाव संभव है।

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फतुहां विधानसभा क्षेत्र

यह क्षेत्र मुख्य रूप से यादव मतदाताओं की बहुलता के कारण अपनी अलग पहचान रखता है, वहां भी इस बार चुनौतियां सभी के समक्ष होने की संभावना है। पिछली बार यादव एवं राजपूत के बीच लड़ाई में राजद के डा. रामानंद यादव जीत गये थे। हालांकि यह नीतीश लहर का परिणाम था कि यादव बहुल क्षेत्र होने के बावजूद उन्हें जदयू के उम्मीदवार अजय कुमार सिंह से कड़ी टक्कर मिली थी।

इस चुनाव में डा. यादव को 50 हजार 218 मत और श्री सिंह को 40 हजार 562 मत मिले थे। इस बार राजद-जदयू के बीच गठबंधन होने से परिस्थितियां इस गठबंधन के पक्ष में जा सकती हैं लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि संघर्ष खत्म हो जायेगा। इसकी वजह यह है कि पूर फतुहां विधानसभा क्षेत्र में राजपूत जाति के मतदाताओं की संख्या आबादी के हिसाब से यादव के बाद दूसरे स्थान पर है। कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि यदि पिछली बार जदयू ने यहां से किसी राजपूत को अपना उम्मीदवार बनाने के बजाय किसी यादव को अपना उम्मीदवार बनाया होता तो वर्ष 2010 का परिणाम कुछ और होता।

दानापुर विधानसभा क्षेत्र

एक ऐसा क्षेत्र है जहां लड़ाई मुख्य रूप से यादव उम्मीदवारों के बीच ही होता रहा है और जीत उसी को मिलती है जो यादव जाति के वोटरों के साथ-साथ अन्य जातियों के मतदाताओं को भी प्रभावित कर सके। पिछली बार यहां से आशा देवी को कुख्यात रीतलाल यादव ने निर्दलीय होकर कड़ी चुनौती दी थी जबकि राजद के उम्मीदवार सच्चिदानंद राय 11 हजार 495 मत लाकर मूकदर्शक की भूमिका में नजर आये थे। इस चुनाव में आशा देवी को 59 हजार 423 और रीतलाल यादव को 41 हजार 506 मत हासिल हुए थे।

इस बार रीतलाल यादव राजद के साथ है। इसके अलावा चूंकि राजद-जदयू का गठबंधन है तो संभव है कि गठबंधन के उम्मीदवार को यादव जाति के अलावा अन्य जातियों के मतदाताओं का समर्थन भी हासिल होगा। वहीं भाजपा के लिए सकारात्मक यह है कि उसके साथ लालू प्रसाद के रामकृपाल यादव हैं। यानी यादव मतदाताओं में मत विभाजन मुमकिन है। यानी जीत और हार का फैसला यादव मतों में विभाजन ही तय करेगा।

बख्तियारपुर क्षेत्र

यह क्षेत्र यादव बहुल विधानसभा क्षेत्र है। पिछली बार यहां से राजद के अनिरूद्ध यादव जीतने में कामयाब हुए थे जबकि उनका मुकाबला करने के लिए भाजपा को भी बख्तियारपुर के जातिगत समीकरण के आगे घुटने टेकते हुए विनोद यादव को अपना उम्मीदवान बनाना पड़ा था। इसके बावजूद अनिरूद्ध यादव 52 हजार 782 मत हासिल करने में सफल हुए थे।

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