बिहार विधानसभा चुनाव में कुमार हैं पर विश्वास नहीं!

पटना (मुकुंद सिंह)। पिछले चुनाव और इस बार के विधानसभा चुनाव में एक बड़ा फर्क है। वो यह कि इस बार कुमार तो हैं, लेकिन विश्वास नहीं। अरे भाई हम आम आदमी पार्टी के कुमार विश्वास की बात नहीं कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं नीतीश 'कुमार' और नेताओं के खोये हुए विश्वास की।

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इस बार किसी नेता और पार्टी का एक-दूसरे पर विश्वास नहीं है। अगर विश्वास की डोर की बात करें तो कुछ ऐसा हाल इस वक्त है, जिसकी तुलना आप पिछले चुनावों से कर सकते हैं।

  • 2010 में- भाजपा और जनता दल यू (जदयू) को एक-दूसरे पर पूरा भरोसा था। इसलिए उनके बीच आसानी से सीटों का बंटवारा हो गया।
  • 2015 में- भाजपा के लिए अपनी दो सहयोगी पार्टियों और तीसरी संभावित सहयोगी पार्टी के साथ सीट बंटवारा मुश्किल साबित हो रहा है। क्योंकि उन पर भाजपा को विश्वास नहीं।

रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा ने अपनी पसंद की सीट चुन कर उस पर काम शुरू कर दिया है। यानी सीटों के बंटवारे की बातचीत होने से पहले ही दबाव बनाया जाने लगा है। इस तरह जीतन राम मांझी ने भी अपनी मांग रख दी है। इनके बीच तालमेल बैठाना भाजपा के लिए मुश्किल हो रहा है।

  • 2010 में- राजद और लोजपा का तालमेल भी परफेक्ट था। लालू प्रसाद और रामविलास पासवान ने एक-दूसरे पर भरोसा दिखाया था। यह भरोसा चुनाव के बाद तक कायम रहा था, तभी लालू प्रसाद ने अपने दम पर पासवान को राज्यसभा में भेजा था।
  • 2015 में- ये दोनों एक दूसरे के साथ नहीं तो भरोसे की बात करना तो दूर, सोचना भी बेईमानी होगा।

महागठबंधन में शामिल होने वाली बाकी दो संभावित पार्टियों कांग्रेस और लेफ्ट की भी अलग अपनी तैयारी है। अगर उनकी मांग और पसंद के मुताबिक सीटें उनको नहीं मिलती हैं तो वे भी अलग लड़ने को तैयार हो रहे हैं।

  • 2010 में- राजद उस वक्त लोजपा के साथ थी तब सीटों का बंटवारा आसानी से हो गया था। राजद 168 सीटों पर लड़ी और लोजपा के खाते में 75 सीटें गईं।
  • 2010 में- राजद जदयू के साथ है। भले ही लालू नीतीश पर कितना ही प्रेम क्यों न बरसा रहे हों, लेकिन जब बात सीटों के बंटवारे की आयी, तो भरोसा टूट गया। दोनों के बीच कोई भरोसा नहीं दिख रहा है। राजद नेताओं की 145 सीटों की मांग ने जदयू की बेचैनी बढ़ाई है।

सो, कुल मिला कर पिछली बार जहां पार्टियों ने भरोसे के साथ तालमेल और सीटों का बंटवारा किया था, उसके उलट इस बार पार्टियां अविश्वास और खींचतान के साथ मजबूरी में गठबंधन बनाती लग रही हैं।

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