Punjab Politics: पंजाब में कैसे बना अकाली दल का दबदबा? कांग्रेस को बाहर करने वाली पार्टी ने क्यों खोया जनाधार
Punjab Politics Shiromani Akali Dal History: भारतीय राजनीति के इतिहास में क्षेत्रीय दलों का उभार और पतन हमेशा से बेहद दिलचस्प रहा है। पंजाब की राजनीति की कहानी में अगर किसी एक क्षेत्रीय दल ने सबसे गहरी छाप छोड़ी है, तो वह है शिरोमणि अकाली दल। एक समय ऐसा था जब पंजाब की राजनीति कांग्रेस बनाम अकाली दल के इर्द-गिर्द घूमती थी।
दिसंबर 1920 में एक धार्मिक जनसभा से उपजे इस दल का सफर सिर्फ चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहा।आधी सदी से भी अधिक समय तक पंजाब ने दोतरफा चुनावी मुकाबला देखा एक तरफ राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस और दूसरी तरफ अकाली दल (बाद में भाजपा के साथ गठजोड़)।

'किस्सा कुर्सी दा' के इस एपिसोड में कहानी सबसे पुरानी क्षेत्रीय पार्टी शिरोमणि अकाली दल की, जिसने सिख राजनीति को दिशा दी, कांग्रेस को कड़ी चुनौती दी, कई बार सत्ता पर कब्जा किया और फिर धीरे-धीरे अपना जनाधार खोती चली गई।
Shiromani Akali Dal History: 1920 में जब 'पंथ' के रक्षक के रूप में SDA का हुआ जन्म
जम्मू-कश्मीर की 'नेशनल कॉन्फ्रेंस' (1939) और तमिलनाडु की 'द्रमुक' (1949) से भी पुरानी राजनीतिक विरासत समेटे शिरोमणि अकाली दल का गठन दिसंबर 1920 में हुआ था। मूल रूप से यह एक 'कैडर-आधारित' और वैचारिक आंदोलन था, जिसे सिख समुदाय के धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक हितों की रक्षा करने का जनादेश मिला था। उस समय गुरुद्वारा सुधार आंदोलन अपने चरम पर था और अकाली दल इस आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरा।
अकाली दल ने खुद को हमेशा गुरुद्वारों और सिखों की सर्वोच्च संस्था का रक्षक माना। यह एक ऐसा आंदोलन था जिसने आज़ादी के बाद पंजाब का भूगोल, डेमोग्रॉफिक और सियासी भविष्य तय किया। लेकिन स्थापना के बाद से ही यह दल कई बार आंतरिक गुटबाजी का शिकार हुआ। लेकिन जब-जब पंथ पर संकट आया, ये गुट एकजुट भी हुए।
प्रतिनिधित्व की राजनीति से 'पंजाबी सूबा' तक का सफर
विभाजन से पहले औपनिवेशिक पंजाब में सिखों की आबादी महज 15% थी। इस कारण अकाली दल उस दौर में केवल 'प्रतिनिधित्व' की राजनीति करता था। लेकिन 1947 में विभाजन के बाद जब पंजाब की सीमाएं बदलीं, तो अकाली दल ने भारतीय संघ के भीतर ही एक सिख-बहुसंख्यक राज्य यानी 'पंजाबी सूबा' की मांग को लेकर एक बड़ा भाषाई और धार्मिक आंदोलन छेड़ दिया।
साल 1966 में जब पंजाब की सीमाएं दोबारा खींची गईं और हरियाणा व हिमाचल प्रदेश अलग हुए, तब पंजाब एक सिख-बहुसंख्यक राज्य बना। इसके बाद से ही राज्य की सियासत कांग्रेस और अकाली दल के इर्द-गिर्द सिमट गई।
पंजाबी सूबा आंदोलन और अकाली दल का उभार
अकाली दल के सामने कांग्रेस क्यों बनी सबसे बड़ी चुनौती?
बात 1966 की है जब पंजाब की राजनीति लगभग दो ध्रुवों में बंट गई। एक तरफ कांग्रेस थी और दूसरी तरफ अकाली दल। लेकिन समस्या यह थी कि कांग्रेस केवल हिंदू वोटों तक सीमित नहीं थी। पार्टी को बड़ी संख्या में सिख मतदाताओं का भी समर्थन मिलता था। कांग्रेस हर चुनाव में बड़ी संख्या में सिख उम्मीदवार उतारती थी और ग्रामीण तथा शहरी दोनों इलाकों में उसकी मजबूत पकड़ थी। यही वजह रही कि अकाली दल को कई बार मजबूत जनाधार होने के बावजूद पूर्ण बहुमत हासिल करने में कठिनाई होती थी।
आखिर जनसंघ के साथ क्यों किया गठबंधन?
अकाली दल कट्टर पंथिक राजनीति का झंडा बुलंद करता था, लेकिन सत्ता हासिल करने के लिए उसने हमेशा व्यावहारिक समझौते किए। 1966 के बाद अकाली दल ने 'जनसंघ' (जो बाद में भाजपा बनी) के साथ हाथ मिलाया। यह एक 'अप्राकृतिक गठबंधन' था क्योंकि जनसंघ सिखों को हिंदू समाज का अभिन्न अंग मानता था, पंजाबी सूबा आंदोलन का विरोधी था और हिंदी को राज्य की दूसरी आधिकारिक भाषा बनाने की वकालत करता था। इसके बावजूद दोनों दलों के लंबे समय तक साथ बने रहे...
1. सिखों में जातिगत विभाजन और कांग्रेस का दांव
दरअसल, अकाली दल को जल्द ही समझ आ गया था कि पंजाबी सूबा बनने के बाद भी वे अपने दम पर पूर्ण बहुमत नहीं पा सकते। इसकी वजह यह थी कि सिख समुदाय कभी भी एकमुश्त अकाली दल को वोट नहीं देता था। सिख समाज जातियों में बंटा हुआ था। दलित सिख पारंपरिक रूप से कांग्रेस के बड़े समर्थक थे, जबकि अकाली दल को मुख्य रूप से जट सिखों की पार्टी माना जाता था। वहीं कांग्रेस हमेशा भारी संख्या में सिख उम्मीदवारों को टिकट देकर अकालियों के वोट बैंक में सेंध लगाती थी।
2. 1971 का परिसीमन (Delimitation)
साल 1971 में हुए तीसरे निर्वाचन क्षेत्र परिसीमन ने चुनावी गणित बदल दिया। अब निर्वाचन क्षेत्र विशुद्ध रूप से ग्रामीण-शहरी या हिंदू-सिख जनसांख्यिकी वाले नहीं रह गए थे। वे मिश्रित हो चुके थे। इसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिला, जिसका आधार हर वर्ग में था।
3. सामाजिक और सांप्रदायिक संतुलन की मजबूरी
पंजाब में हिंदू आबादी कुल जनसंख्या के आधे से थोड़ी ही कम है। ऐसे में सिखों की पार्टी की छवि के साथ अकालियों के लिए सरकार बनाना नामुमकिन था। यही कारण था कि साल 1997 के विधानसभा चुनाव में जब अकाली दल ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया, तब भी उसने भाजपा को सरकार में शामिल होने का न्योता दिया। यह गठबंधन पंजाब में सांप्रदायिक शांति और सामाजिक संतुलन (सिख-हिंदू एकता) का प्रतीक बन गया।
SDA ने ऐसे किया उग्रवाद के दौर का डैमेज कंट्रोल
1980 और 1990 के दशक में पंजाब आतंकवाद और उग्रवाद की चपेट में आ गया। इस दौर में अकाली राजनीति भी कई विवादों में घिरी रही। स्वायत्तता और केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर उठे मुद्दों ने राज्य में राजनीतिक तनाव बढ़ाया। हालांकि बाद में पार्टी के प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में महसूस किया कि केवल धार्मिक और स्वायत्तता आधारित राजनीति राज्य के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।
1990 के दशक के बाद अकाली दल ने अपनी राजनीतिक दिशा बदली। पार्टी ने खुद को केवल सिखों की पार्टी के रूप में पेश करने के बजाय 'पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत' के नारे को आगे बढ़ाया। इसका सबसे बड़ा परिणाम साल 2012 के विधानसभा चुनावों में देखने को मिला।
पंजाब की राजनीति का यह नियम था कि हर 5 साल में सत्ता बदलती थी। लेकिन 2012 में सुखबीर सिंह बादल की चुनावी रणनीति और भाजपा के साथ मजबूत सोशल इंजीनियरिंग के दम पर अकाली-भाजपा गठबंधन ने इतिहास रच दिया और कांग्रेस को लगातार दूसरी बार सत्ता से बाहर रखा।
अकाली दल ने कैसे खोया अपना मजबूत जनाधार?
लगातार 10 साल सत्ता में रहने के बावजूद आज वही अकाली दल अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं। 2012 की इस ऐतिहासिक जीत के बाद ही अकाली दल के पतन की पटकथा भी लिखी जाने लगी।
कैडर-आधारित पार्टी पूरी तरह से 'बादल परिवार' की जागीर बन गई, जिससे जमीन से जुड़े पुराने नेता हाशिए पर चले गए।राज्य में ड्रग्स (नशा), रेत और ट्रांसपोर्ट माफिया के फलने-फूलने के आरोप सीधे सुखबीर बादल के करीबियों पर लगे। 2015 के बरगाड़ी में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं और कोटकपूरा गोलीकांड ने अकाली दल के मूल 'पंथिक' वोट बैंक (कट्टर सिख मतदाताओं) को उनसे हमेशा के लिए दूर कर दिया।
साल 2020 में कृषि कानूनों के विवाद के बाद भाजपा से नाता तोड़ना अकाली दल के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। सिखों ने उन्हें बेअदबी के लिए नकार दिया और हिंदुओं ने भाजपा से अलग होने के कारण। नतीजतन, पारंपरिक राजनीति से ऊब चुकी पंजाब की जनता ने 2022 में 'आम आदमी पार्टी' (AAP) को प्रचंड बहुमत सौंप दिया। पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा और पंजाब की राजनीति में उसकी भूमिका पहले जैसी नहीं रही।














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