ISI से बदला लेने के लिए किया तहरीक-ए-तालिबान ने आर्मी स्‍कूल पर हमला

पेशावर। मंगलवार के दिन पाकिस्‍तान के पेशावर में जो कुछ हुआ, उसके बाद अगर अब भी पाक आतंकवाद पर आंखें बंद किए बैठा रहेगा , तो कहीं न कहीं मुश्किलें और बढ़ेंगी। पेशावर में आर्मी पब्लिक स्‍कूल पर हमले की जिम्‍मेदारी तहरीक-ए-तालिबान (टीटी)ने ली है। यह हमला आईएसआई को संगठन की ओर से साफ इशारा है कि वह किसी भी हालत में कमजोर नहीं पड़ेंगे।

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यह हमला आईएसआई को एक चुनौती के तौर पर है जिसके जरिए पाक सेना और आईएसआई को एक संदेश देने की कोशिश की गई है कि अभी वह कमजोर नहीं पड़े हैं। उनमें अभी इतनी ताकत है कि वह सेना और इंटेलीजेंस को एक साथ निशाने पर ले सकते हैं।

संगठन में फूट डालती आईएसआई

मई 2014 में आईएसआई की वजह से संगठन में फूट पड़ी और यह पहला मौका था। आईएसआई पिछले कई वर्षों से इस कोशिशों में लगी हुई है। लेकिन मंगलवार का हमला आईएसआई को एक बड़ी चुनौती है। टीटी बंट रहा

है और इसके सदस्‍यों में फूट पड़ रही है, इसकी पहली झलक उस समय देखने को मिली जब, इसके ग्रुप के कुछ सदस्‍यों ने कहा कि वह अब सही रास्‍ते पर चलना चाहते हैं।

इस बयान से संगठन के कुछ सदस्‍यों को काफी चोट पहुंची थीं और उन्‍होंने कसम ली कि वह आईएसआई से इसका बदला जरूर लेकर रहेंगे।

इस बयान के साथ ही सदस्‍यों में फूट के पीछे आईएसआई के दिमाग को जिम्‍मेदार करार दिया गया। जून में कराची एयरपोर्ट पर हुआ हमला भी इस संगठन की खुद को ताकतवर सा‍बित करने की कोशिशों का नतीजा था।

इस हमले के बाद इस संगठन के स्‍पोक्‍सपर्सन शाहदुल्‍ला शाहिद की ओर से बयान दिया गया कि अभी इससे भी ज्‍यादा खतरनाक आना बाकी है।

मजबूत है तहरीक-ए-तालिबान की जमीं

मंगलवार को आर्मी पब्लिक स्‍कूल टीटी की ओर से किया गया हमला इस संगठन की ओर से यह बताने की कोशिश है कि जो लोग सोचते हैं कि तहरीक-ए-तालिबान अपनी जमीन खोता जा रहा है, वह इस हमले को ध्‍यान में रखें।

आईएसआईएस का बढ़ता असर इस संगठन के लिए एक सबसे बड़ी परेशानी है। हाल ही में एक संगठन तहरीक-ए-तालिबान को छोड़कर गया है और बताया जा रहा है कि इस संगठन की ओर से आईएसआईएस को समर्थन देने की बात कही गई है।

यह टीटी के लिए एक बड़े झटके की तरह है क्‍योंकि खुर्रम, पेशावर, ओराकजाई और खैबर इलाकों में मौजूद संगठन के अहम कमांडर्स को पहले ही खत्‍म किया जा चुका है।

लश्‍कर को कमजोर नहीं होने देना चाहती ISI

अगर आईएसआई टीटी को तोड़ता है तो यह उसके लिए और भी ज्‍यादा फायदेमंद हो सकता है क्‍योंकि लश्‍कर-ए-तैयबा, टीटी की मौजूदगी में उस हद तक शक्तिशाली नहीं हो सकता जितना कि यह चाहता है।

आईएसआई कभी भी लश्‍कर को कमजोर नहीं पड़ने देगी क्योंकि यह एक ऐसा संगठन है जो हमेशा से आईएसआई की हर बात को मानता आया है। इसके अलावा जिस तरह से पाक सेना की ओर से तहरीक-ए-तालिबान के कुछ कमांडर्स के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, उसकी वजह से भी कुछ लोग इस संगठन को छोड़ रहे हैं।

संगठन में महसूद और मौलाना फजुल्‍लाह के लिए वफादार कमांडर्स जो कि पाक के यूसूफजई समुदाय से आते हैं, वह संगठन का नेतृत्‍व ठीक तरह से नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में अगर वह संगठन के नेतृत्‍व को आगे बढ़ाते रहेंगे तो फिर ज्‍यादा दिनों तक वह संगठन की जिम्‍मेदारी नहीं संभाल पाएंगे।

पाक सेना की कार्रवाई के खिलाफ गुस्‍सा

तहरीक-ए-तालिबान का एक ग्रुप इस बात को महससू करता है कि मौलाना फजुल्‍लाह ही पाक सेना के खिलाफ लड़ने के लिए काफी बेकरार थे। वहीं एक और ग्रुप है जो इस बात को मानता है कि संगठन को पाक सेना के खिलाफ कार्रवाई करने से बचना होगा।

संगठन को छोड़कर गया मौलाना फजुल्‍लाह का ग्रुप अब तक पाक सेना की ओर से उनके खिलाफ की गई कार्रवाई में 900 आतंकियों को खो चुका है।

पाक सेना के खिलाफ लड़ने में हिचकिचाहट की वजह से ग्रुप के सदस्‍यों में यह भावना है कि इस वजह से पाक सेना उन्‍हें निशाना बना रही है और वह अपने 900 कैडरों को गंवा चुके हैं।

संगठन में विभाजन के बाद गई संगठन भी बन गए हैं जिनमें से जमात-उल-अहरार और साथ ही जुंदाल्‍लाह सबसे अहम हैं जिन्‍होंने वाघा बॉर्डर पर हमला किया था।

आईएसआईए तहरीक-ए-तालिबान को खत्‍म करने के लिए इस कदर बेकरार थी कि उसकी कार्रवाई में हकीमुल्‍लाह महसूद की मौत हो गई। उसकी मौत के बाद इस बात के इशारे मिलने लगे थे कि संगठन के सदस्‍य इस बात को मानने लगे हैं कि अब खान सैयद महसूद को संगठन का नेतृत्‍व करना चाहिए।

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