PakistanElections 2018: क्या वाकई इमरान खान हैं सेना के चहेते, क्या सोचते हैं विशेषज्ञ
24 घंटे भी नहीं बचे हैं जब पाकिस्तान की जनता एक बार फिर से चुनावों में वोट डालेगी और अपना नया प्रधानमंत्री चुनेगी। पाकिस्तान जहां हमेशा सेना और इंटेलीजेंस एजेंसी आईएसआई का दबदबा माना जाता है, वहां इस बार पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के मुखिया इमरान खान के पीएम बनने का सपना सच हो सकता है।
इस्लामाबाद। 24 घंटे भी नहीं बचे हैं जब पाकिस्तान की जनता एक बार फिर से चुनावों में वोट डालेगी और अपना नया प्रधानमंत्री चुनेगी। पाकिस्तान जहां हमेशा सेना और इंटेलीजेंस एजेंसी आईएसआई का दबदबा माना जाता है, वहां इस बार पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के मुखिया इमरान खान के पीएम बनने का सपना सच हो सकता है। जहां एक तरफ सेना पर आरोप लग रहे हैं कि वह चुनावों को प्रभावित करने की कोशिशों में हैं तो वहीं दूसरी तरफ क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान सेना की कभी तारीफ करते हैं तो कभी आलोचना। इमरान और सेना के बीच कैसी केमेस्ट्री है, यह एक अजीब तरह का रहस्य बना हुआ है। वहीं कई विशेषज्ञ इस बात पर यकीन करते हैं कि कहीं न कहीं इमरान, सेना के चहेते हैं।

नवाज की पार्टी ने सेना पर लगाया बड़ा आरोप
माइकल कुगेलमैन जो वुड्रू विल्सन इंटरनेशनल सेंटर फॉर स्कॉलर्स में सीनिसर एसोसिएट और डिप्टी डायरेक्टर हैं, उनका मानना है कि 70 वर्षों से पाकिस्तान की सेना अपने अस्तित्व को राजनीति में कैसे न कैसे करके बरकरार रखे है।पीएमएल-एन के कुछ नेताओं का मानना है कि सेना, पर्दें के पीछे सक्रियता से काम कर रही है ताकि नतीजे इमरान के पक्ष में जाए। पीएमएल-एन की ओर से एक ऐसी बात कही गई है जिसे साजिश करार दिया जा रहा है लेकिन कई लोग इस बात को मान रहे हैं। पूर्व पीएम नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान में पिछले कुछ वर्षों में काफी प्रभावी हो चुकी थी लेकिन जो हालात पिछले कुछ दिनों बनें उसने कहीं न कहीं पार्टी को की चुनौती को कमजोर कर दिया जिसका सीधा फायदा इमरान और उनकी पार्टी पीटीआई को मिलता नजर आ रहा है।

सेना की पहली पसंद हैं इमरान
कुगेलमैन की मानें तो हालिया दिनों में पीएमएल-एन के कई समर्थकों को गिरफ्तार किया गया है, नवाज को चुनावों से ठीक तीन हफ्ते पहले जेल भेजा गया और पार्टी के एक टॉप लीडर हनीफ अब्बासी को भी ड्रग्स स्मगलिंग के आरोप में जेल में डाल दिया गया और वह भी चुनावों से सिर्फ चार दिन पहले। इसके अलावा मीडिया को भी कुछ हद सेंसर कर दिया गया है, ये सभी बातें इशारा करती है कि कैसे मिलिट्री और ज्यूडीशियरी पीएमएल-एन के जीतने के प्रयासों को कमजोर करने में लग गई है। हालांकि इस बात को लेकर अभी थोड़ा संदेह है कि इस्लामाबाद में अगर इमरान खान आते हैं तो सेना कितनी सहज होगी लेकिन कुगलेमैन की मानें तो इमरान, सेना की पहली पसंद हैं, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है।

लेकिन जिद्दी हैं इमरान
इमरान भले ही सेना की संभावित पसंद हों लेकिन इमरान बहुत ही जिद्दी और सक्रिय नेता हैं। खान जनता के बीच बहुत ही लोकप्रिय हैं और उनका आत्मविश्वास उनके सकारात्मक गुणों में से एक है और वह सेना के लिए मुश्किल साबित हो सकते हैं क्योंकि वह आने वाले समय में शायद ही अथॉरिटी के आगे कभी झुकें और उनके तेवर देखकर ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता है कि वह सेना के इशारों पर चलेंगे। वहीं अगर बात करें नवाज के भाई शहबाज शरीफ की तो उनके पास जनता का समर्थन उतना नहीं है जितना उनके भाई को मिला है। शहबाज अगर जीते तो फिर वह पीएमएल-एन की ओर से पीएम पद के उम्मीदवार होंगे। हाल ही के एक इंटरव्यू में शहबाज ने सेना और पार्टी के बीच संबंधों को मजबूत करने की बात कही है। ऐसे में अगर बात करें तो सेना के लिए शहबाज का पलड़ा, इमरान की तुलना में थोड़ा भारी है।

लेकिन सेना के समर्थक
इमरान खान के कुछ विचारों से सेना असहमत हो सकती है। खान, कश्मीर के विवाद को सुलझाना चाहते हैं तो वहीं वह चीन के खिलाफ भी बयान दे रहे हैं। साथ ही उन्होंने सेना की आलोचना करने से भी साफ इनकार कर दिया है। इमरान ने हमेशा से ही सेना के समर्थन में बातें कहीं है और आने वाले समय में सेना के साथ मिलकर काम करने की इच्छा जाहिर की है। इमरान ने मई में न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा था, 'यह पाकिस्तान की सेना है कोई दुश्मन की सेना नहीं है और मैं अपनी सेना को अपने साथ लेकर चलूंगा।' एक ऐसा देश जहां पर सेना को राजनीति के अंदर तक घुसा हुआ माना जाता हो वहां पर एक असैन्य नेता की ओर से इस तरह का बयान, उसे सत्ता के चरम पर पहुंचा सकता है।

सेना के साथ इमरान का मतभेद तय
इमरान और सेना के बीच ईरान को लेकर मतभेदा होना तय है, कुगेलमैन ऐसा सोचते हैं। कुगेलमैन का कहना है कि ईरान के लिए इमरान खान का रवैया काफी सकारात्मक है और जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के विरोध में भाषण दिए तो इमरान ने तेज सुर में उनका विरोध किया। इमरान तो यहां तक कह चुके हैं पाकिस्तान को ईरान की तरह बनना चाहिए। ईरान, सऊदी अरब का क्षेत्रीय प्रतिद्वंदी है और सऊदी अरब, पाकिस्तान मिलिट्री के साथ काफी गहरे रिश्ते रखता है। इसके अलावा इमरान खान ने भारत के साथ बेहतर सहयोग की वकालत भी की है। वहीं, खान अक्सर अमेरिका के खिलाफ कई बातें कहते रहते हैं। इमरान तो अमेरिकी ड्रोन को गिराने तक की कसमें खा चुके हैं।

मिल सकता है सेना को सत्ता में आने का मौका
साल 2011 में पाकिस्तान ने काउंटरटेररिज्म के प्रयासों की आलोचना की थी और उन्होंने यहां तक कह डाला था कि 'सेना, अमेरिका से मिले पैसों से अपने ही लोगों की हत्या कर रही है।' साल 2014 में जब सेना ने नॉर्थ वजीरिस्तान में तालिबानी आतंकियों को मारने के लिए फिर से काउंटर टेररिज्म ऑपरेशन चलाया तो उस समय भी इमरान ने शांति के प्रयासों की बात की और तालिबान के साथ शांति वार्ता का समर्थन किया। साल 2018 में इमरान खान ने फिर से सेना की आलोचना की और कहा कि हमें अपने ही लोगों से नहीं लड़ना चाहिए। इस बात के भी आसार है कि पाकिस्तान में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत न मिले लेकिन इमरान खान ने साफ कर दिया है कि ऐसी सूरत में वह गठबंधन की सरकार के साथ नहीं जाएंगे और पीएमएल-एन के साथ तो कतई नहीं। अगर ऐसा होता है तो फिर हो सकता है कि सत्ता सेना के हाथ में आए और मिलिट्री पिछले कुछ वर्षों से जो चाहती है उसे वही मिली।
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