भारतीय सीमा पर हो रही गोलीबारी को कभी नहीं रोकेंगे नवाज शरीफ
इस्लामाबाद। पाकिस्तान लगातार भारत की चौकियों पर रात-रात भर गोलियां बरसा रहा हैं। एक दिन में 40 बार फायरिंग हो रही है लेकिन इस देश के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की ओर से इस मसले पर एक शब्द तक नहीं कहा गया। अपने ही खिलाफ विरोध प्रदर्शन झेल रहे नवाज शायद कुछ कहने की ताकत ही नहीं रखते हैं।

जून 2013 से नवाज शरीफ फिर से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री चुने गए। पाक जैसे अस्थिर देश को स्थिरता देना तो दूर नवाज शरीफ भारत के साथ बढ़ते तनावों और अंदरुनी मसलों जैसे मुद्दों से ही घिरे नजर आने लगे हैं।
विशेषज्ञों की मानें तो पाक के अस्थिर हालातों पर किसी का ध्यान न जाए और लोग उसके बारे में जरा भी जिक्र नहीं करें इसलिए भारत की सीमा पर गोलीबारी को अंजाम दिया जा रहा है।
नवाज नहीं सेना और आईएसआई के हाथ में सत्ता
भले ही पाकिस्तान के अंदरुनी हालातों से भारत का कोई लेना-देना न हो लेकिन यह बात भी सच है कि पाक के हालातों का फायदा पाक, भारत को नुकसान पहुंचाने के लिए उठाता रहता है।
इसका सबसे उदाहरण है भारत-पाक सीमा पर लगातार और रात भर होने वाली फायरिंग। वर्ष 1999 में जब भारत और पाक के बीच कारगिल की जंग लड़ी गई थी, नवाज शरीफ ही प्रधानमंत्री थे और एक बार फिर वह इस देश में सत्ता संभाले हुए हैं।
लाहौर बस सेवा के बाद पाक ने करगिल की जंग के साथ भारत की पीठ पर छुरा घोंपा था। इस बार भी पाक वहीं करने की कोशिशों में नजर आ रहा है। मई में नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण से वापस जाते समय शांति की वकालत करने वाले नवाज शरीफ लगातार टूटते सीजफायर पर खामोश बैठे हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि शरीफ कभी भी इस पर कुछ नहीं कहेंगे क्योंकि जब कभी भी वह पाक की सत्ता संभालते हैं, पाक की सेना और आर्इएसआई और ताकतवर हो जाती है।
नवाज सिर्फ एक कठपुतली प्रधानमंत्री बनकर सबकुछ देखते रहते हैं क्योंकि सत्ता केंद्र सिर्फ आईएसआई और मिलिट्री तक सिमटकर रह जाता है।
जब-जब नवाज आए भारत पर बढ़ा खतरा
वर्ष 1999 में पाक को कारगिल वॉर में करारी हार का मुंह देखना पड़ा और फिर उस समय के सेना प्रमुख जनरल परवेज मुर्शरफ ने तख्तापलट के साथ ही नवाज शरीफ को देश निकाला दे डाला। शरीफ दुबई में निर्वासित जीवन बिताने के बाद पाक वापस आए और फिर 18वें प्रधानमंत्री के तौर पर जनता ने उन्हें चुना।
नवाज शरीफ पहली बार वर्ष 1990 में पाक के प्रधानमंत्री बने थे और इसी समय घाटी में आतंकी वारदातों में इजाफा होने लगा।
90 के दशक को घाटी में चरमपंथ को बढ़ावा देने वाला दशक माना जाता है। वर्ष 93 तक वह पीएम रहे और वर्ष 93 में भारत में मुंबई ब्लास्ट जैसा बड़ा हादसा सामने आया।
हालांकि यह अंडरवर्ल्ड की ओर से अंजाम दिया गया हमला था लेकिन इसके गुनाहगारों को पाक से मदद मिली और आज वह पाक में ही महफूज हैं।
वर्ष 1997 में नवाज फिर प्रधानमंत्री बने और 1999 तक पीएम रहे। वर्ष 1999 में कारगिल की जंग नवाज के ही शासन काल का नतीजा था। नवाज इस बात से हमेशा इंकार करते हैं कि उन्हें कारगिल के बारे में कुछ भी नहीं मालूम था।
हकीकत यही है कि वह उस समय के सेना प्रमुख जनरल परवजे मुर्शरफ के हर प्लान से वाकिफ थे लेकिन सेना और आईएसआई की ताकत के आगे वह मजबूर थे।
आज भी न तो पाक के हालातों में कोई बदलावा आया है और न ही नवाज शरीफ के रवैये में। भारत के लिए नवाज और पाक की नीतियां एक जैसी ही हैं। शायद वह एक कठपुतली प्रधानमंत्री बनकर रह गए हैं जिसका मकसद पाक में लोकतंत्र के झूठे मुखौटे को संभालकर रखना है।












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