OMG- दिल्ली का नाम हो जाए बंदर नगर
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) कहां से आ गए हैं दिल्ली में इतने बंदर? आपको कोई इस तरह का इलाका बड़ी से मुश्किल से मिलेगा जिधर बंदरों ने अपनी डराने वाली दस्तक ना दे दी हो। पहले बंदर दिल्ली के पहाड़ी और जंगली इलाकों जैसे जेएनयू, वसंत कुंज, रामाकृष्ण पुरम, सिविल लाइंस,राजेन्द्र नगर वगैरह में ही होते थे।
राष्ट्रपति भवन भरा बंदरों से
पर इधर दस-पंद्रह सालों से तो हद हो गई। सैकड़ों बंदर प्रेसिडेंट हाउस से लेकर लुटियन दिल्ली के बंगलो में घूम रहे हैं। सैकड़ों ही बंदर दिल्ली के सबसे खासमखास क्नाट प्लेस में दिवारों पर कूदते-फांदते मिल जाएंगे। ये जनपथ जैसे बाजारों में आराम से बैठे हुए मिल जाएंगे।
कनाट प्लेस स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर और शिव मंदिर में भी ये खासी तादाद में है। इधर मंदिरों में पूजा करने आए लोगों के हाथों से केले छीनते हुए आप इन्हें रोज देख सकते हैं। दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में भी बंदर कम नहीं है।
डिप्टी मेयर की मौत
कुछ साल पहले राजधानी के डिप्टी मेयर एस.एस. बाजवा तो बंदरों के हमले में अपने घर की छत से गिर ही गए थे। जिसके चलते इनकी मौत हो गई थी। उसके बाद बंदरों को पकड़ने का अभियान तेज चला। फिर सब शांत हो गया।
मेनका के घर बंदर
केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी के अशोक रोड स्थित बंगले में भी बंदर खूब घूमते रहते हैं। केन्द्र सरकार के अहम भवनों जैसे शास्त्री भवन, उद्योग भवन, कृषि भवन में भी बंदर ही बंदर है। इन जगहों से बंदरों को भगाने के लिए लंगूर की सहायाता ली गई। पर उससे भी एक हद तक ही लाभ हुआ। लंगूर के वेष में इंसानों से भी बंदर एक हद तक ही डरे।
अब एक ताजा मामले में ईस्ट दिल्ली के मयूर विहार इलाके में रहने वाले एक सज्जन अरविंद अक्षण ने बंदर के काटने पर पुलिस में शिकायत लिखवाई। उनका कहना था कि बंदर ने ना केवल उन्हें काटा बल्कि वह तो उनका लंच बाक्स भी छीन कर भाग गया।
बंदरों से मुक्ति पाने के लिए दिल्ली नगर निगम ने तमाम योजनाएं बनाई, उन्हें लागू भी किया पर बात नहीं बनी। एक योजना के तहत बंदरों को पकड़कर हिमाचल प्रदेश में छोड़ने की बात थी। इस पर कुछ काम भी हुआ। फर उसके बाद मामला लटक गया क्योंकि एक्टिविस्ट इसका विरोध करने लगे।













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