मतदान के दिन आप पार्टी में उत्साह, भाजपा में खीज
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। अब से कुछ देर बात खत्म हो जाएगा दिल्ली में मतदान। 10 फरवरी को मतगणना होगी। बेशक, इसके बीच भी पार्टियों का हमला प्रतिहमला जारी रहने वाला है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा का मत आप से ज्यादा था, लोकसभा चुनाव में और ज्यादा हो गया। इसलिए परिणाम कुछ भी हो सकता है।
इस चुनाव में जिस तरह का प्रचार अभियान हुआ उसकी प्रतिध्वनि लंबे समय तक सुनाई पड़ेगी।
आम आदमी पार्टी की भूमिका
सबसे अच्छी रणनीति, भाव-भंगिमा आम आदमी पार्टी की रही। अरविन्द केजरीवाल ने अकेले सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों में सभायें कीं। केजरीवाल भले राजस्व सेवा के अधिकारी रहे हों और बाद में एनजीओ बनाकर काम किए हों, अभिनय में उनका सामना करना दूसरे नेताओं के लिए कठिन है। इसलिए हर आरोप और हर सही गलतियों, दोषों, झूठों..... को उभारने पर उनका भोलेपन से जवाब देना और अपनी गलतियों का दोष भी विपक्ष पर मढ़ देने की उनकी कला ने दोनों प्रतिद्वंद्वी पार्टियों को परेशान किया।
मीडिया के साथ भी उनके लोगों ने अच्छे संबंध बनाये। खूब विज्ञापन भी दिए। उनके प्रवक्ता पहले के समान में मेरे को छोड़कर सारे भ्रष्ट, पापी, बेईमान, झूठा साबित करने के लिए जान-प्राण लगाये रखे।
वरिष्ठ लेखक अवधेश कुमार मानते हैं कि यह देखना होगा कि दिल्ली में राजनीति का तापमान जितना गरम हुआ उसके भाप से मतदान की संख्या बढ़ती है या नहीं। अगर मतदान इसके आसपास रहता है तब भी यह आकलन करना कठिन होगा कि कौन पार्टी आगे है।
रिकॉर्ड मतदान का अनुमान
चुनाव आयोग ने इस बार रिकॉर्ड मतदान का अनुमान लगाया है।कांग्रेस ने पहले ही हथियार डाल दिया। केन्द्रीय नेताओं ने गिनी-चुनी सभायें की। राहुल गांधी की सभाओं में लोग आ रहे थे। बावजूद इसके पार्टी उत्साहहीनता की दशा में ही पड़ी रही। कांग्रेस को मेहनत करने से किसने रोका था? कहीं ऐसा तो नहीं कि जानबूझकर ऐसा किया गया ताकि भाजपा को क्षति पहुंचे और नरेन्द्र मोदी का प्रभाव कम दिखाने का मौका मिले। अगर यह रणनीति है तो इसे आत्महंता नीति ही कही जाएगी।
भाजपा के अंदर खीज रहे नेता
जानकार मानते हैं कि भाजपा की रणनीति अनेक दृष्टियों से एक परिपक्व पार्टी की नहीं थी। पहले चले मोदी के साथ का नारा और समूची दिल्ली में होर्डिंग, पोस्टर, बैनर। चुनाव की तिथि घोषित होने के बाद किरण बेदी आईं और मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार हो गईं। इससे मिनट भर के अंदर पार्टी के अंदर निराशा और खीझ पैदा हो गयी। जब नेताओं को इसका आभास हुआ तो अमित शाह ने पहले दिल्ली प्रदेश की बैठक ली, केन्द्रीय मंत्रियों की, नेताओं की, उसके बाद पन्ना प्रमुखों, बूथ प्रभारियों की।
किरण बेदी का आना
किरण बेदी का आना आप के लिए ज्यादा अनुकूल था। उनको अवसरवादी से लेकर बहुत कुछ कहा गया और भाजपा को उनकी रक्षा करनी पड़ी। प्रतिदिन केजरीवाल से पूछे जाने वाले प्रश्नों में ज्यादातर ऐसे थे जो पहले कितनी बार पूछे जा चुके थे। अंतिम दिन जो 10 प्रश्न पूछे गए उसमें कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे जनता प्रभावित होती। केजरीवाल के खिलाफ एक दमदार उम्मीदवार तक न उतारने से पार्टी रणनीति की दयनीयता और उजागर हुई। अब इंतजार करते हैं 10 फरवरी का।
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