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नरसिंहपुर: शिक्षा का घिनौना सच, गोंडी धुबघट प्राइमरी स्कूल में 8 साल से ताला, फिर भी शिक्षकों को मिल रही सैलरी

MP News: मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के करेली ब्लॉक में स्थित गोंडी धुबघट प्राइमरी स्कूल की स्थिति किसी भूतिया इमारत से कम नहीं है। बाहर जंग खाया ताला, दीवारों पर मकड़ी के जाले, टूटी-फूटी खिड़कियों से दिखता गंदा फर्श, बिखरी किताबें, और धूल से अटी कुर्सी-यह दृश्य किसी स्कूल की बजाय परित्यक्त भवन की कहानी बयां करता है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इस स्कूल में पिछले आठ साल से एक भी बच्चा पढ़ने नहीं आया, फिर भी दो शिक्षक नियमित रूप से सरकार से वेतन ले रहे हैं।

यह खुलासा तब हुआ, जब प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) सलीम खान ने जिले के स्कूलों की स्थिति की जांच शुरू की। जांच में सामने आया कि नरसिंहपुर जिले में ऐसे चार प्राइमरी स्कूल हैं, जहां एक भी बच्चा दर्ज नहीं है, और सभी आठ शिक्षक बिना पढ़ाए मुफ्त की तनख्वाह ले रहे हैं। इस मामले ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

ugly truth of education Gondi Dhubghat Primary School is locked for 8 years teachers salary

गोंडी धुबघट स्कूल का हाल: ताला, गंदगी और मकड़ी के जाले

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार नरसिंहपुर जिला मुख्यालय से सात किलोमीटर दूर गोंडी धुबघट गांव का रुख किया। गांव के बीचों-बीच स्थित इस प्राइमरी स्कूल का दृश्य देखकर हर कोई हैरान रह गया। स्कूल की दीवार पर शिक्षा मिशन और स्कूल का नाम लिखा हुआ था, लेकिन दीवारें गंदगी और उपेक्षा की कहानी कह रही थीं। कई सालों से दीवारों को रंगरोगन नहीं हुआ था, और मुख्य दरवाजे पर जंग खाया ताला लटक रहा था, जो शायद महीनों से नहीं खुला था।

खिड़की से अंदर झांकने पर कमरे का हाल और भी दयनीय दिखा। फर्श टूटा हुआ था, किताबें जमीन पर बिखरी पड़ी थीं, और चारों ओर धूल जमा थी। कमरे के बीच में एक कुर्सी पड़ी थी, जिस पर भी धूल की मोटी परत जमा थी। छत पर मकड़ी के जाले लटक रहे थे, और आसपास गंदगी का अंबार था। स्कूल के पास ही बंद पड़ा शौचालय भी गंदगी से भरा हुआ था। यह दृश्य किसी भी तरह से एक शैक्षणिक संस्थान का नहीं, बल्कि एक परित्यक्त भवन का प्रतीत हो रहा था।

गांव वालों का गुस्सा: शिक्षक सिर्फ राष्ट्रीय पर्वों पर आते हैं

टीम के पहुंचने पर गांव वाले इकट्ठा हो गए। कुछ महिलाओं ने भी अपनी बात रखी। गांव वालों ने बताया कि इस स्कूल में पिछले आठ साल से कोई बच्चा पढ़ने नहीं आया। रिकॉर्ड में एक भी छात्र दर्ज नहीं है, फिर भी दो शिक्षक नाममात्र के लिए पदस्थ हैं। हैरानी की बात यह है कि ये शिक्षक पिछले आठ साल में सिर्फ दो बार-15 अगस्त और 26 जनवरी को राष्ट्रीय पर्वों पर-स्कूल आए हैं। बाकी समय स्कूल में ताला लटका रहता है।

एक गांव वाली राधा बाई ने गुस्से में कहा, "हमारे बच्चों को पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक नहीं आता। स्कूल बंद पड़ा है, लेकिन शिक्षकों को तनख्वाह मिल रही है। यह हमारे साथ धोखा है।" गांव के एक अन्य निवासी रामकिशोर ने बताया, "हमारे बच्चों को पढ़ने के लिए पड़ोस के गांव जाना पड़ता है। सरकार को इस स्कूल को फिर से शुरू करना चाहिए या इन शिक्षकों पर कार्रवाई करनी चाहिए।"

जिला शिक्षा अधिकारी की जांच: चार स्कूलों में शून्य नामांकन

प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी सलीम खान ने स्कूलों और शिक्षकों की स्थिति की जांच शुरू की थी। उनकी जांच में सामने आया कि नरसिंहपुर जिले में गोंडी धुबघट सहित चार प्राइमरी स्कूल ऐसे हैं, जहां एक भी बच्चा नामांकित नहीं है। इन चारों स्कूलों में दो-दो शिक्षक नियुक्त हैं, यानी कुल आठ शिक्षक। ये सभी शिक्षक नियमित रूप से वेतन ले रहे हैं, लेकिन स्कूल में पढ़ाने कभी नहीं आते।

सलीम खान ने बताया, "यह एक गंभीर मामला है। इन स्कूलों में बच्चों का नामांकन शून्य होने के बावजूद शिक्षकों को वेतन दिया जा रहा है। यह सरकारी धन का दुरुपयोग है।" उन्होंने इस मामले की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह और शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी है। साथ ही, उन्होंने इन शिक्षकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।

शिक्षकों की जवाबदेही पर सवाल

इस मामले ने शिक्षा विभाग की जवाबदेही और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आठ साल तक एक स्कूल में कोई बच्चा न पढ़े और शिक्षक बिना पढ़ाए वेतन लेते रहें, यह शिक्षा व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों की निगरानी के लिए कोई प्रभावी तंत्र नहीं है, जिसके कारण ऐसी अनियमितताएं पनप रही हैं।

शिक्षा कार्यकर्ता अनिल शर्मा ने कहा, "यह केवल गोंडी धुबघट का मामला नहीं है। मध्य प्रदेश के कई ग्रामीण इलाकों में स्कूल बंद पड़े हैं, और शिक्षक सिर्फ वेतन लेने के लिए नियुक्त हैं। सरकार को जिला स्तर पर एक सख्त निगरानी तंत्र बनाना चाहिए।"

सरकार का रुख और कार्रवाई की मांग

प्रभारी डीईओ सलीम खान ने बताया कि उन्होंने इस मामले में तत्काल कार्रवाई के लिए शिक्षा मंत्री और विभागीय अधिकारियों को पत्र लिखा है। उनकी मांग है कि इन आठ शिक्षकों के खिलाफ निलंबन और विभागीय जांच शुरू की जाए। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो।

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि इन बंद पड़े स्कूलों को फिर से शुरू करने के लिए विशेष अभियान चलाया जाए। गांव में बच्चों का नामांकन बढ़ाने और स्कूलों को फिर से सक्रिय करने के लिए शिक्षा विभाग को स्थानीय समुदाय के साथ मिलकर काम करना चाहिए।

गांव वालों की मांग: स्कूल को फिर से शुरू करें

गोंडी धुबघट के गांव वालों ने मांग की है कि स्कूल को फिर से शुरू किया जाए ताकि उनके बच्चों को यहीं पढ़ाई का अवसर मिले। एक ग्रामीण महिला शांति बाई ने कहा, "हमारे बच्चे पढ़ने के लिए दूर जाते हैं। रास्ते में खतरा रहता है। अगर यह स्कूल फिर से शुरू हो जाए और शिक्षक नियमित आएं, तो हमारे बच्चों का भविष्य सुधर सकता है।"

सियासी हलचल और सामाजिक प्रतिक्रिया

इस मामले ने नरसिंहपुर जिले में सियासी और सामाजिक हलचल मचा दी है। विपक्षी दलों ने इस खुलासे को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। कांग्रेस के स्थानीय नेता रमेश पटेल ने कहा, "यह शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलता है। बीजेपी सरकार बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। इन शिक्षकों पर तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए।"

वहीं, स्थानीय सामाजिक संगठनों ने भी इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति सुधारने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए।

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