Sachin Vaze news:मुंबई पुलिस के किन-किन अफसरों का रहा विवादों से नाता, कुछ के नाम पर फिल्में भी बनीं
मुंबई: उद्योगपति मुकेश अंबानी के घर के बार विस्फोटकों से भरी एसयूवी रखे जाने के मामले में मुंबई पुलिस के असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वाजे नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी के हत्थे चढ़ चुके हैं। कथित तौर पर आतंकवाद से जुड़े इस मामले में मुंबई पुलिस के एक अधिकारी की गिरफ्तारी से पूरे देश में सनसनी मची है। दावा तो यहां तक किया जा रहा है कि उनका सत्ताधारी शिवसेना के नेताओं के साथ अभी भी साठगांठ है। संदेह इसलिए पैदा हो रही है कि जिस विस्फोटकों से भरी कार की जांच के सिलसिले में एनआईए ने उन्हें पकड़ा है, पहले मुंबई पुलिस ने उससे जुड़ी जांच उन्हें ही सौंप दी थी। वैसे, मुंबई पुलिस के बड़े अफसरों का अपराध,अंडरवर्ल्ड और राजनीति से मिलीभगत का यह कोई पहला मामला नहीं है। मुंबई पुलिस में ऐसे कई दागी अफसर सामने आ चुके हैं, जिनके कारनामों को लेकर कुछ फिल्में भी बन चुकी हैं और बाद में उनका नाम बहुत गंभीर विवादों से भी जुड़ चुका है।

सचिन वाजे: एनकाउंटर,विवाद और राजनीति
16 साल तक निलंबित रहने के बाद सचिन वाजे 9 महीने पहले ही पुलिस फोर्स में फिर से शामिल हुए थे। एकबार फिर से उनकी पुलिसगीरी सवालों के घेरे में आ चुकी है। मुंबई पुलिस के कई दूसरे अफसरों की तरह ही वाजे भी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के नाम से कुख्यात रहे हैं। अंबानी के घर के बाहर से विस्फोटकों की बरामदगी और संबंधित एसयूवी मालिक मनसुख हिरेन की हत्या के मामले में नाम आने से पहले वह 2003 में संदिग्ध आतंकी ख्वाजा यूनुस की हिरासत में मौत के मामले में कथित हाथ होने के केस में सस्पेंड भी किए जा चुके हैं। यूनुस 2002 के घाटकोपर बम धमाके का संदिग्ध था। वाजे का सियासत में रसूख ऐसा रहा है कि उन्होंने 2008 में पुलिस सेवा से इस्तीफा भी दे दिया था, लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने उसे मंजूर नहीं किया। 2007 में तो वे शिवसेना में भी शामिल हो गए थे। उन्हें पिछले साल जून में ही मौजूदा सरकार ने फिर से मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच में शामिल किया था। वाजे के सियासी दबदबे का अंदाजा इसी से लग जाता है कि एक निचले स्तर के पुलिस अधिकारी होने के बावजूद उन्हें मुंबई पुलिस ने कुछ समय के बीच में कई सारे हाई-प्रोफाइल केस सौंप दिए थे। इनमें टीआरपी स्कैम, कार डिजाइनर दिलीप छाबरिया स्पोर्ट्स कार स्कैम, अन्वय नाइक सुसाइड केस में वरिष्ठ टीवी पत्रकार अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी और फेक सोशल मीडिया फॉलोअर्स मामला।
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दया नायक- द एनकाउंटर स्पेशलिस्ट
दयानंद नायक या दया नायक के नाम 83 एनकाउंटर करने का रेकॉर्ड है। इसलिए एनकाउंटर स्पेशलिस्ट का जब भी कोई जिक्र होता है, सबसे पहला नाम मुंबई पुलिस के इसी अफसर का आता है। दया ने जिन लोगों का एनकाउंटर किया, उसमें छोटा राजन गैंग के गुर्गे भी शामिल रहे हैं। उनके खिलाफ अंडरवर्ल्ड से साठगांठ के आरोप में महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम ऐक्ट (एमसीओसीए) भी लगाया गया, लेकिन बाद में कई जांच के बाद उन्हें क्लीनचिट मिल गई। 2003 में उनपर आय से ज्यादा संपत्ति का मुकदमा भी दर्ज हुआ। ज्ञात स्रोत से अधिक संपत्ति अर्जित करने के केस में 2006 में एंटी-करप्शन ब्यूरो ने उन्हें गिरफ्तार किया था। उनसे जब हिरासत में पूछताछ की गई तो कथित रूप से उनकी अकूत संपत्ति का खुलासा हुआ। उन्होंने अवैध कमाई से जो कई प्रॉपर्टी बनाई थी, उसमें मुंबई के मलाड में युग धर्मा अपार्टमेंट में एक आलीशान पेंटहाउस भी शामिल है। इस केस के बाद उन्हें भी निलंबित किया गया था। बाद में मकोका मामले में 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने उनपर लगे सभी आरोपों को खत्म कर दिया और 2012 में उन्हें फिर से एसीपी के तौर पर सेवा में बहाल किया गया। बॉलीवुड में उन पर दो चर्चित फिल्में 'अबतक छप्पन' और 'डिपार्टमेट' बन चुकी है। पहले में नाना पाटेकर ने और दूसरे में राणा दग्गुबाती ने उनका किरदार निभाया था।

प्रदीप शर्मा- 113 एनकाउंटर
मुंबई पुलिस में एक और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट हुए हैं, जिनके नाम 100 से ज्यादा एनकाउंटर का रेकॉर्ड है। इनमें कई अपराधी गैंग के सरगना और आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के 3 संदिग्ध भी शामिल हैं। इनपर अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम से साठगांठ करने, मुंबई के मलाड में जमीन हड़पने और 2006 में छोटा राजन गैंग के लखन भैया के फर्जी एनकाउंटर के आरोप लग चुके हैं। ख्वाजा यूनुस की हिरासत में मौत केस भी ये आरोपी थे। लखन भैया केस में 2010 में इनकी गिरफ्तारी भी हुई थी, लेकिन, 2013 में मुंबई की एक अदालत ने इन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया था। हालांकि उन्हें सेवा से हटा दिया गया था। रामगोपाल वर्मा की हिंदी फिल्म 'डिपार्टमेंट' में अभिनेता संजय दत्त ने इनका किरदार निभाया था।

विजय सालस्कर- 75 से 80 एनकाउंटर
2008 के मुंबई हमले में शहीद होने से पहले विजय सालस्कर कई एनकाउंटर के लिए जाने जाते थे। जब 26 नवंबर, 2008 को वो पाकिस्तानी आतंकियों के हमले के शिकार हुए, उस समय वो मुंबई में एंटी-एक्सटॉर्शन सेल के चीफ थे। उन्हें देश के लिए शहादत पर 2009 में अशोक चक्र से भी सम्मानित किया गया था। लेकिन, उनका पुलिस करियर भी बेदाग नहीं रहा था। 2004 में उन्होंने गैंगस्टर अरुण गवली गैंग के दो गुर्गों को कथित एनकाउंटर में ढेर कर दिया था, लेकिन उनपर आरोप लगे कि वह एनकाउंटर फर्जी था।(ऊपर की तस्वीर-सांकेतिक)

रवींद्रनाथ अंग्रे- 52 एनकाउंटर
रवींद्रनाथ अंग्रे के नाम जो 52 एनकाउंटर हैं, उनमें अंडरवर्ल्ड डॉन सुरेश माचेकर और गैंगस्टर अमर नाइक गैंग के लोग भी शामिल हैं। 2008 में ठाणे के एक बिल्डर गणेश वाघे ने उनके खिलाफ धमकी देने, जबरन वसूली और लूट की शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद इन्हें गिरफ्तार करके निलंबित कर दिया गया था। 2009 में उनकी रिहाई हुई, लेकिन दोबारा से वाघे के भाई की हत्या की कोशिश के मामले में उन्हें गिरफ्तार किया गया था। कई महीने जेल में रहने के बाद 2011 में सत्र न्यायलय ने परिस्थिति जन्य साक्ष्य या चश्मदीद के नहीं होने की वजह से उन्हें बरी कर दिया था। बाद में उनका ट्रांसफर गढ़चिरौली कर दिया गया, लेकिन जब उन्होंने वहां ड्यूटी ज्वाइन करने से मना किया तो उन्हें सेवा से हटा दिया गया। 2015 में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे, लेकिन नवंबर, 2018 में उन्होंने कांग्रेस का हाथ पकड़ लिया।(ऊपर की तस्वीर-सांकेतिक)

मुंबई के पुलिस कमिश्नरों का भी रहा है विवादों से नाता
मुंबई पुलिस के मौजूदा चीफ परमबीर सिंह और पूर्व चीफ राकेश मारिया भी कई तरह के विवादों में रह चुके हैं। मारिया पर लंदन के आधिकारिक दौरे पर पूर्व आईपीएल कमिश्नर भगोड़े ललित मोदी से मिलने के आरोप लग चुके हैं तो सिंह भी मुंबई के उन्हीं एनकाउंर स्पेशलिस्ट पुलिस अफसर के दौर के अधिकारी रहे हैं, जिन अधिकारियों पर कथित फर्जी एनकाउंटर के आरोप लग चुके हैं। परमबीर सिंह की तैनाती को लेकर राज्य में सत्ताधारी शिवसेना और भाजपा के बीच भी तकरार रही है। क्योंकि, इनपर राज्य के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार को हाई-प्रोफाइल सिंचाई घोटाले में क्लीनचिट दिए जाने को लेकर सवाल उठ चुके हैं।












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