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'एक गांव, एक गणपति': कैसे दो महामारियों ने महाराष्ट्र में बदली गणेश उत्सव की परंपरा ? जानिए

मुंबई, 4 सितंबर: महाराष्ट्र में गणपति उत्सव के दौरान लोग जहां एक तरफ घर-घर में गणेश प्रतिमा स्थापित करके पूजा करते हैं, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक गणपति प्रतिमा स्थापित करने की परंपरा भी बढ़ती जा रही है। इस साल महाराष्ट्र के हजारों गांव में देखा गया कि पूरे गांव में एक ही सार्वजनिक गणपति मूर्ति स्थापित की गई। दअरसल, 'एक गांव, एक गणपति' की यह नीति, कई दशकों पुरानी एक अवधारणा का हिस्सा है, जिसकी शुरुआत एक महामारी के बाद आज से 61 साल पहले हुई थी। इस बार इस परंपरा में बढ़ोतरी देखी गई है तो इसका कारण भी कोरोना महामारी है, जिसके चलते पिछले दो वर्षों में बहुत ही सीमित पूजा हो पाई थी। लेकिन, इसबार पहले की तरह ही पूजा की अनुमति थी, लेकिन फिर भी 'एक गांव, एक गणपति' की अवधारणा वाली नीति की लोकप्रियता बढ़ गई।

'एक गांव, एक गणपति' की लोकप्रियता बढ़ी

'एक गांव, एक गणपति' की लोकप्रियता बढ़ी

महाराष्ट्र में गणेश उत्सवर घर-घर का त्योहार है। लेकिन, लोग साथ ही साथ समूहों में या मंडलों में पूजन का आयोजन भी करते हैं। भगवान विनायक की प्रतिमाएं स्थापित करते हैं। पूरे महाराष्ट्र में एक जैसी स्थिति है। अब तो गणेश पूजा पूरे देश में लोकप्रिय हो चुका है। न्यूज एजेंसी पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक कई दशक पहले महाराष्ट्र के अगरोली गांव से गणेश पूजा में एक नई परंपरा शुरू हुई थी और आज वह कई गांव में लोकप्रिय हो गई है। यह है- 'एक गांव, एक गणपति' वाला दृष्टिकोण। तब में और आज में एक बहुत बड़ी समानता भी है। उस समय यह तरीका फ्लू महामारी के चलते अपनानी पड़ी थी और अब कोरोना महामारी ने उसे अपनाने के लिए लोगों को प्रेरित किया है।

1961 में अगरोली गांव से शुरू हुई थी परंपरा

1961 में अगरोली गांव से शुरू हुई थी परंपरा

1961 की बात है। अगरोली गांव में , जो कि आज नवी मुंबई इलाके का एक हिस्सा है 'एक गांव, एक गणपति' की नीति अपनाई गई थी। लोगों को इस नीति को अपनाने के लिए प्रेरित करने के पीछे वामपंथी नेता भाऊ सखाराम पाटिल का हाथ बताया जाता है। तब इलाके में फ्लू महामारी के बाद पाटिल ने सुझाव दिया कि हर घर में अपनी गणेश प्रतिमा स्थापित करने की जगह, पूरे गांव में एक गणपति स्थापित होनी चाहिए। मकसद ये था कि इससे लोगों के खर्चे घटेंगे।

कैसे शुरू हुई 'एक गांव, एक गणपति' की परंपरा ?

कैसे शुरू हुई 'एक गांव, एक गणपति' की परंपरा ?

अगरोली गांव तब मुख्य तौर पर मछुआरों और छोटे-मोटे कृषि आधारित काम से जुड़े लोगों की बस्ती हुआ करती थी। इनकी आमदनी मछली पकड़ने, नमक बनाने या धान की खेती पर निर्भर थी। अगरोली के सार्वजनिक गणेश मंडल के एक ट्रस्टी दिलिप वैद्य ने कहा, 'लोग गरीब थे, लेकिन फिर भी कई परिवार त्योहार के लिए पैसे उधार लेते थे और कर्जदार बन जाते थे।' जब गांव में एक ही गणपति स्थापित करने का प्रस्ताव आया तो शुरू में लोग इसको लेकर चिंतित हो गए थे। वह किसी तरह की अनहोनी की आशंका से परंपरा तोड़ने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे। लेकिन, धीरे-धीरे लोग मान गए और गांव में 11 दिनों के लिए एक ही गणेश प्रतिमा स्थापित करने के लिए तैयार हो गए।

कोविड महामारी ने इस नीति की लोकप्रियता बढ़ाई

कोविड महामारी ने इस नीति की लोकप्रियता बढ़ाई

भाऊ पाटिल के पोते भूषण पाटिल ने कहा है, 'यह पहला गांव था जहां 'एक गांव, एक गणपति' की व्यवस्था लागू की गई थी और यह परंपरा 60 से अधिक वर्षों से जारी है।' उनका कहना है कि इससे गांव की एकजुटता बढ़ाने में भी मदद मिली है। उन्होंने कहा, 'गांव में 1,500 परिवार हैं और हर घर से त्योहार में योगदान रहता है। उनके मुताबिक यह व्यवस्था महाराष्ट्र में और जगहों पर भी चल रही है और कोविड-19 महामारी के बाद नए सिरे से शुरू हुई है।

कैसे पूरे महाराष्ट्र में फैली यह परंपरा

कैसे पूरे महाराष्ट्र में फैली यह परंपरा

कोल्हापुर रेंज के पुलिस के आईजी मनोज लोहिया ने बताया है, 'एक गांव, एक गणपति की अवधारणा अब पश्चिमी महाराष्ट्र में भी लोकप्रिय है, खासकर सतारा, सांगली और सोलापुर और पुणे जिलों के ग्रामीण इलाकों में।' इस साल सतारा जिले के 593 गांव में कॉमन गणेश प्रतिमा स्थापित की गई है। उन्होंने कहा कि सांगली में 200, सोलापुर में 300 और पुणे जिले में 400 गांव में भी यही नीति लागू की गई है। धीरे-धीरे यह महाराष्ट्र में काफी लोकप्रिय हो गया है और हजारों गांवों यह व्यवस्था शुरू हो चुकी है। औरंगाबाद रेंज के आईजी केएमएम प्रसन्ना ने कहा कि इससे समाज में एक सौहार्द का वातावरण निर्मित हुआ है और सब मिलकर त्योहार मनाने लगे हैं।

71,338 गणेश मंडलों को मिली सार्वजनिक पूजा की अनुमति

71,338 गणेश मंडलों को मिली सार्वजनिक पूजा की अनुमति

आईजी प्रसन्ना का कहना है कि कोरोना महामारी के बाद लोगों ने महसूस किया कि त्योहार पर होने वाले खर्च को कम किया जाए। कई जगहों पर पुलिस और प्रशासन ने भी इसे प्रोत्साहित किया, ताकि विभिन्न मंडलों के बीच होने वाली प्रतिस्पर्धा और तनाव को भी कम किया जा सके। महाराष्ट्र के पुलिस विभाग के आंकड़ों के मुताबिक इस साल 71,338 गणेश मंडलों ने सार्वजनिक पंडालों में गणेश प्रतिमा स्थापित करने की अनुमति ली है।

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