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Maharashtra Lok sabha Chunav: AIMIM की अकेली सीट बचा पाएंगे ओवैसी? औरंगाबाद में इस बार क्यों बदला समीकरण?

Maharashtra Lok Sabha Election: 2019 में एआईएमआईएम ने हैदराबाद से बाहर महाराष्ट्र में एक सीट जीतकर पूरे देश को चौंका दिया था। लेकिन, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के लिए इस बार छत्रपति संभाजी नगर (पहले औरंगाबाद) में वही प्रदर्शन दोहराना आसान नहीं लग रहा है। जबकि, अपने कार्यों के दम पर पार्टी के मौजूदा सांसद इम्तियाज जलील ने लोकप्रियता भी हासिल की है।

पूरे दो दशक यानी 1999 से 2019 तक औरंगाबाद सीट शिवसेना (संयुक्त) के कब्जे में रही और यहां से शिवसेना (यूबीटी) के नेता चंद्रकांत खैरे ही जीतते रहे। 2019 में ओवैसी की पार्टी इस सीट से जीती, लेकिन जीत का अंतर बहुत ही मामूली या करीब 4,500 वोटों का था। लेकिन, महाराष्ट्र में राजनीतिक समीकरण बदलने के बाद इस सीट पर वोटों के गुणा गणित में भी भारी परिवर्तन नजर आ रहा है।

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इस बार 'सेक्युलर' बनकर इंडिया ब्लॉक के लिए वोट मांग रहे चंद्रकांत खैरे
जो चंद्रकांत खैरे यहां से 'खान (मुसलमान) चाहिए कि बाण (धनुष और बाण-शिवसेना का चुनाव निशान) चाहिए' का नारा देकर खुद को हिंदुत्व के नेता के रूप में पेश करके चुनाव जीतते थे, आज इंडिया ब्लॉक के प्रत्याशी होने की वजह से वह खुद को 'सेक्युलर' साबित करने को मजबूर हैं।

क्योंकि, सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील इस सीट पर चुनावी समीकरण इस बार बदल चुका है। इसलिए इंडिया ब्लॉक के उम्मीदवार ने अब ध्रुवीकरण वाला दांव आजमाने की कोशिश छोड़ दी है। टीओआई की एक रिपोर्ट के अनुसार औरंगाबाद शहर में एक प्रॉविजन स्टोर चलाने वाले सैयद अनीस ने शहर में पहले हुए सांप्रदायिक विवादों का हवाला देते हुए कहा, 'वे (खैरे) यहां आए और हमें बताया कि पहले जो कुछ हुआ है, उसे भूल जाना चाहिए।'

2019 में 'हिंदू वोट में विभाजन' की वजह से हारी थी शिवसेना
पिछले चुनाव में खैरे की हार के पीछे कनाड के पूर्व विधायक हर्षवर्धन जाधव की उम्मीदवारी को वजह माना जाता है, जिनके पक्ष में 2,83,798 वोट पड़ गए थे। माना गया कि हिंदू वोटों में यही विभाजन तत्कालीन शिवसेना प्रत्याशी की हार की बड़ी वजह बन गया।

शिवसेना (शिंदे गुट) ने मंत्री संदीपन भूमरे उतारा
इस बार यहां एनडीए की ओर से शिवसेना (मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट) ने राज्य के मंत्री संदीपन भूमरे को उतारा है और जाधव फिर से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में मौजूद हैं। इस लोकसभा सीट की सभी विधानसभा सीटें बीजेपी और शिवसेना के पास है, इसलिए भूमरे को लगता है कि उनकी स्थिति मजबूत है।

औरंगाबाद में इस बार बहुकोणीय मुकाबले की स्थिति
इस तरह से इस बार इस सीट पर बहुकोणीय मुकाबले की स्थिति बन गई है। वैसे खैरे को लगता है कि क्षेत्र के समीकरण में बदलाव उनके पक्ष में हुआ है और वह जलील को हराने में सफल होंगे। लेकिन, ओवैसी की पार्टी के सांसद ने बीते पांच वर्षों में अपने काम के दम पर एक लोकप्रियता भी अर्जित की है।

एआआईएमआईएम प्रत्याशी के काम से बढ़ी है लोकप्रियता
मसलन, एक स्थानीय निवासी धरमपाल अवसरमोल कहते हैं,'इतने वर्षों में हमें जलील जैसा सांसद नहीं मिला, वे औरंगाबाद में 400 बिस्तरों वाला एक अस्पताल बनवा रहे हैं। उनतक पहुंच आसान है, वह दूसरे नेताओं जैसे नहीं हैं।' जब उनसे यह पूछ लिया गया कि जलील की पार्टी एआईएमआईएम पर सांप्रदायिक राजनीति करने के आरोप लगते हैं तो उन्होंने कहा, 'वे सही आदमी हैं, जो गलत पार्टी में हैं।'

लेकिन, जलील के काम से कुछ इलाके के मुसलमान भी खुश नहीं हैं। जैसे सैयद अनीस कहते हैं, 'उन्होंने यहां रोड पर कोई काम नहीं किया है। हां, उन्होंने दूसरे हिस्सों में सड़कों पर कार्य किया है, लेकिन यहां नहीं। हमें वे पहुंच वाले नहीं लगते।' शिवसेना के प्रत्याशी भूमरे को इस बात का भरोसा है कि क्षेत्र के 6 विधायकों में तीन उसके और दो बीजेपी के हैं।

औरंगाबाद का चुनाव परिणाम चौंकाने वाला हो सकता है
पिछली बार जाधव को जो वोट यहां मिले थे, उनमें से ज्यादातर मराठा समुदाय के बताए जाते हैं। लेकिन, भाजपा से नाराजगी की वजह से माना जा रहा है कि इस बार ये वोट उद्धव ठाकरे का पार्टी शिवसेना (यूबीटी) को जा सकता है। इस तरह से इस बार छत्रपति संभाजी नगर की सीट बहुत ही उलझी हुई है, जिसका परिणाम चौंका सकता है।

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