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Maharashtra: INDIA bloc में हाहाकार!दबाव में उद्धव,कब तक निभा पाएंगे राहुल गांधी,शरद पवार का साथ?

Maharashtra Election effect: महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) या इंडिया ब्लॉक की एकता पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। सबसे ज्यादा उथल-पुथल उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) में मची हुई है, जिसमें इस गठबंधन में बने रहने को लेकर सवाल उठने लगे हैं। पार्टी के अंदर इस तरह की बातें होने लगी हैं कि कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी (एसपी)के साथ होने से मुसलमान वोट मिल भी रहे हों, तो भी इसकी कीमत पर अपने मूल 'हिंदू और मराठी' वोटरों को गंवाने से क्या फायदा?

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक उद्धव ठाकरे की पार्टी पर अंदर के नेताओं से चुनावों में शर्मनाक हार के बाद विपक्षी गठबंधन छोड़ने का दबाव बढ़ता ही जा रहा है। पहले स्थानीय निकाय चुनावों में अलग रास्ते चलने की बात उठ रही थी, लेकिन अब तो एमवीए या इंडिया ब्लॉक छोड़ने की मांग शुरू हो गई है।

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शिवसेना (यूबीटी) का कार्यकर्ताओं का भरोसा हुआ डांवाडोल!
जानकारी के मुताबिक शिवसेना (यूबीटी) के नव-निर्वाचित 20 विधायकों में से ज्यादातर ने सोमवार को उद्धव के साथ हुई मीटिंग में यही कहा कि पार्टी के अस्तित्व के लिए यही जरूरी है कि किसी भी गठबंधन में जाने की जगह अकेले चला जाए।

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सूत्रों का कहना है कि विधानसभा चुनावों में एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 57 सीटें मिलने के बाद उद्धव की पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं का भी विश्वास डांवाडोल हो चुका है। वे अब एमवीए के वजूद और उसके मतलब पर ही सवाल उठाने लगे हैं।

हालांकि, सूत्रों का यह भी कहना है कि अभी तक उद्धव, उनके बेटे और पार्टी नेता आदित्य ठाकरे और पार्टी सांसद संजय राउत यही कह रहे हैं कि बीजेपी के खिलाफ एकजुटता बनाए रखने के लिए विपक्षी गठबंधन में बने रहना जरूरी है।

विचारधारा पर अडिग रहने की शुरू हुई मांग
विधान परिषद में नेता विपक्ष अंबादास दानवे ने कहा है, 'हमारे कई एमएलए को लगता है कि शिवसेना (यूबीटी) के लिए यह स्वतंत्र रास्ते पर चलने का समय है, अकेले चुनाव लड़ें और किसी भी गठबंधन के भरोसे नहीं रहे।'

उनका ये भी कहना है कि 'शिवसेना कभी भी सत्ता के पीछे भागने के लिए नहीं बनी है....जब हम अपने विचारधारा पर अडिग रहेंगे तो यह (सत्ता) स्वाभाविक रूप से आएगी।'उनका कहना है कि अकेले चलने से पार्टी को'आधार पर खड़े होने'में मदद मिलेगी।

हाल ही में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले ने तंज कसा था कि आने वाले दिनों में उद्धव के साथ 20 एमएलए में से सिर्फ आदित्य और उनके ममेरे भाई ही रह जाएंगे, लगता है कि उन्हें पार्टी के अंदर चल रही इन्हीं गतिविधियों की भनक लग चुकी थी।

उद्धव पर विरोधी लगाते हैं पिता की विचारधारा से विश्वासघात का आरोप
दरअसल, विधानसभा चुनावों के नतीजों से यही संदेश निकला है कि बीजेपी और उसकी सहयोगी शिवसेना यह नैरेटिव मतदाताओं तक पहुंचाने में सफल रही है कि उद्धव ठाकरे और उनकी शिवसेना (यूबीटी) ने कांग्रेस से हाथ मिलाकर अपने पिता पार्टी संस्थापक बालासाहेब ठाकरे और उनके हिंदुत्व की विचारधारा के साथ 'विश्वासघात' किया है। पार्टी अपना नाम और चुनाव निशान तो पहले ही शिंदे सेना के हाथों गंवा बैठी थी।

पूरे इंडिया ब्लॉक पर अकेले भारी पड़ी शिंदे की शिवसेना
शिवसेना (यूबीटी) के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक बात क्या हो सकती है कि महा विकास अघाड़ी (शिवसेना (यूबीटी),कांग्रेस और एनसपी (एसपी)) ने कुल मिलाकर जो 46 सीटें जीती हैं, उससे कहीं ज्यादा 57 सीटें महायुति में अकेले शिंदे की शिवसेना ने जीती है। उद्धव की पार्टी (9.96%) को शिंदे के दल से 3% वोट भी कम मिले हैं। जबकि पांच महीने पहले लोकसभा चुनावों में उसे 16.72% वोट मिले थे।

उद्धव पर 'हिंदुत्व' की विचारधारा की ओर लौटने का बढ़ रहा दबाव
अब पार्टी के नेताओं को लगता है कि अस्तित्व बचाना है तो अकेले चलना ही विकल्प है, ताकि बची-खुची पार्टी और समर्थक भी बेहाथ न होते चले जाएं।

हालिया चुनावों में शिवसेना (यूबीटी) के टिकट पर चुनाव हारने वाले पार्टी के एक नेता ने कहा, 'सेना ने हमेशा ही मराठी क्षेत्रवाद और हिंदुत्व को आगे बढ़ाया। कांग्रेस और एनसीपी का ज्यादा ही सेक्युलर और समाजवाद की ओर रुझान है। बीजेपी ने जिस तरह की सफलता हासिल की है, जिसके बारे में बहुतों को लगता है कि उसके पक्ष में हिंदू वोट एकजुट हुआ है, सेना (यूबीटी) के भीतर यह चिंता बढ़ रही है कि कांग्रेस और एनसीपी को जगह देने के लिए यह हिंदुत्व के पथ से भटक रही है।'

पार्टी नेताओं को लगता है कि बीजेपी का ये कहना कि सेना (यूबीटी)'मुसलमानों की ओर झुक रही है और अपने हिंदुत्व की जड़ के साथ विश्वासघात कर रही है'का शायद असर पड़ रहा है। नासिक सेंट्रल के एक पार्टी नेता के मुताबिक,'मुसलमान वोट मिलना फायदेमंद है, लेकिन अगर उस वोट से समर्थक दूर जा रहे हैं, तो उसके महत्त्व पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।'

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पार्टी टिकट पर चुनाव हारने वाले उम्मीदवारों का दावा है कि कई शिवसैनिक 'इतनी बड़ी हार के बाद यहां तक कि ठाकरे के प्रति निष्ठा पर भी सवाल उठाने लगे हैं।'इससे पहले दावा किया जाता था कि शिंदे के साथ पार्टी के नेता गए हैं और कैडर अभी भी उद्धव ठाकरे के साथ बने हुए हैं।

Following a dismal election outcome, Uddhav Thackeray's leadership in the Maharashtra India Bloc is questioned. Party members urge a shift away from alliances due to concerns over losing core voter support.
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