Maharashtra Chunav: MVA किन मुद्दों पर कमजोर पड़ रहा? महायुति का यह कार्ड चल गया तो खेल होना तय!
Maharashtra Chunav 2024: महाराष्ट्र में अब मतदान का दिन बहुत ही करीब आ चुका है। करीब 6 महीने पहले ही यहां जो लोकसभा चुनाव हुए थे, उससे जमीनी समीकरण अब पूरी तरह से बदल चुके हैं। इसका परिणाम क्या हो सकता है, वह हरियाणा विधानसभा चुनावों में दिख चुका है। लोकसभा चुनावों में जो मुद्दे हावी रहे थे, वही विधानसभा चुनावों में भी काम कर जाएंगे, यह कहना बहुत ही मुश्किल है। इसको देखते हुए महायुति ने अपनी पूरी रणनीति ही बदल रखी है।
लोकसभा चुनावों में विपक्षी 'महा विकास अघाड़ी' (MVA) ने राज्य में जबर्दस्त प्रदर्शन किया था। गठबंधन ने 48 में 30 सीटें जीत ली थीं और सत्ताधारी महायुति गठबंधन की अगुवा बीजेपी को लोकसभा में अपने दम पर स्पष्ट बहुमत लाने से रोक दिया था। तब एमवीए के 'संविधान बचाओ' और 'आरक्षण बचाओ' जैसे नैरेटिव ने महायुति की सारी रणनीतियों पर पानी फेर दिया था।

लोकसभा चुनावों वाले मुद्दे बेअसर!
लेकिन, विधानसभा चुनावों में एमवीए में शामिल दल खुद उन नैरेटिव के भरोसे में अब नहीं हैं। सिर्फ लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ही 'संविधान बचाओ' और 'जाति जनगणना' वाली डफली अभी भी बजा रहे हैं। उनके अपनी पार्टी के नेता और सहयोगी इससे ज्यादा महायुति सरकार की एंटी-इंकंबेंसी और स्थानीय मुद्दों जैसे कि महंगाई, किसानों की समस्या और बेरोजगारी को अबकी बार ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं।
अमरावती में एमवीए के एक नेता ने कहा, 'संविधान बचाओ और जाति जनगणना हमारे लिए हमेशा महत्वपूर्ण रहेगा। इसके साथ-साथ, क्योंकि यह विधानसभा चुनाव है, हम राज्य सरकार की नाकामियां उजागर करने पर फोकस कर रहे हैं, जिसने कि समाज के सभी वर्गों,खासकर के किसानों और युवाओं को प्रभावित किया है।' महायुति को भी लग रहा है कि विपक्ष के 'संविधान बचाओ' और 'आरक्षण'वाले मुद्दों का असर अब खत्म हो चुका है।
कैसे बदल गए मुद्दे?
महायुति सरकार 'लाडकी बहिन योजना'चलाकर एक तरह से लड़ाई में वापस लौटी है। वहीं बीजेपी और आरएसएस में फिर से तालमेल हो जाने के बाद इनके चुनाव अभियान में भी पहले से कहीं ज्यादा धार आ चुकी है। जिस तरह से भाजपा ने हिंदू एकता को अपना चुनावी हथियार बनाया है,उससे एमवीए में भी खलबली मची हुई है। ऊपर से मराठा आरक्षण की मांग की वजह से जिस तरह ओबीसी समुदाय के बीच एक आशंका का वातावरण पैदा हुआ है, उसने भी एमवीए को चिंता में डाल रखा है।
विदर्भ में बड़े उलटफेर की आहट!
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक नए हालातों में विदर्भ की सूरत पूरी तरह से बदल सकती है। लोकसभा चुनावों में यहां एमवीए ने लगभग एकतरफा बाजी मारी थी। लेकिन, इस बार ज्यादातर सीटों पर भाजपा और कांग्रेस में सीधी लड़ाई है और बदले सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों के चलते परिणामों में बड़ा उलटफेर हो सकता है।
इसकी वजह ये है कि विदर्भ एक ओबीसी बहुल क्षेत्र है। यहां मराठों को ओबीसी में से कोटा दिए जाने की आशंका को लेकर विशेष रूप से प्रभावशाली कुनबी और तेली जैसी ओबीसी जातियों में भारी नाराजगी है। मराठा आंदोलन के निशाने पर रही बीजेपी और महायुति ने ओबीसी को अपने पाले में करने की भरपूर कोशिशें की हैं। संघ के सक्रिय समर्थन से इनके हौसले और बुलंद हुए हैं।
मराठा आंदोलनकारियों ने जिस तरह से भाजपा और महायुति विरोधी नैरेटिव को हवा दी है, उसके बाद से कांग्रेस बहुत ही सावधान हो चुकी है। टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक कांग्रेस नेता विलास मुत्तेमवार ने कहा, 'मराठा आंदोलन पश्चिम महाराष्ट्र और मराठवाड़ा में हो रहे हैं और विदर्भ में यह कोई मुद्दा नहीं है, जो कि एक बड़ा ओबीसी क्षेत्र है। इसलिए मराठा आंदोलन का विदर्भ के ओबीसी पर कोई असर नहीं होगा।'
मुसलमानों में बढ़ा कांग्रेस-एमवीए के प्रति क्रेज!
अलबत्ता, बीजेपी के 'बटेंगे तो कटेंगे' और 'एक हैं तो सेफ हैं'जैसे नारों ने मुसलमानों के बीच कांग्रेस और महा विकास अघाड़ी की स्थिति जरूर और भी ज्यादा मजबूत कर दी है। कुछ क्षेत्रों में असदुद्दीन ओवैसी का प्रभाव भी दिख रहा है। लेकिन, जिस तरह से भाजपा को 'संविधान बचाओ' और 'आरक्षण' वाले नैरेटिव के बेअसर होने की उम्मीद है और उसका ओबीसी वोट बैंक पर भरोसा बढ़ा है, उसी तरह से दलितों की जो नाराजगी देखने को मिली थी, उसका खतरा भी अब टल चुका है। महायुति ने इस समीकरण को पक्का करने के लिए छोटे-छोटे दलों से तालमेल भी की है।












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