Maharashtra Elections: चुनावी रेवड़ियां जीत तो दिलवा सकती हैं, लेकिन ये बड़े संकट भी पैदा करती हैं!
Maharashtra Chunav 2024: महाराष्ट्र के कपास किसान पहले से ही कम पैदावार और बाजार में उचित भाव नहीं मिलने से परेशान हैं। लेकिन उनकी फसल तैयार है; और कपास तोड़ने के लिए उन्हें पहले से भी ज्यादा जेब ढीली करनी पड़ रही है। किसानों की समस्या ये है कि महाराष्ट्र की महायुति सरकार ने जो 'लाडकी बहिन योजना' जैसी अन्य कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं, उसके चलते मजदूर काम करने से कन्नी काटने लगे हैं।
चुनावी रेवड़ियों की वजह से इस तरह का वास्तविक संकट कोई पहले बार नहीं देखा जा रहा है। इससे पहले भी देश के किसानों को इस तरह की दिक्कतों से दो-चार होना पड़ा है। खासकर छोटे और मझोले किसानों को इसका खामियाजा सबसे ज्यादा भुगतना पड़ता है।

खाते में पैसे आए, खेतों से बनाने लगीं दूरी!
महाराष्ट्र में करोड़ों महिलाओं के खातों में लाडकी बहिन योजना के तहत 7,500 रुपए आ चुके हैं। टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे में पारंपरिक तौर पर इस मौसम में विदर्भ इलाके में कपास तोड़ने के काम में जुटी रहनी वाली महिलाएं खेतों में आने से कतरा रही हैं।
नागपुर से 100 किलोमीटर दूर तारोदा गांव में कपास किसान अर्जुन तिमांडे का कहना है कि मराठवाड़ा के नांदेड़ या विदर्भ के पुसद या सिंदेवाही जैसे क्षेत्रों से आने वाले खेतिहर मजदूर अभी तक नहीं पहुंचे हैं। उनका कहना है, 'दिवाली हो चुकी है और कॉटन बॉल तोड़े जाने के लिए तैयार हैं। आमतौर पर कपास तोड़ने का काम महिलाएं ही करती हैं, लेकिन इस साल लगता है कि वह लाडकी बहिन योजना के पैसे से ही गदगद हैं।'
कपास तोड़ने के लिए अब दुगुनी देनी पड़ रही है मजदूरी!
नागपुर के पास कन्हान के संजय सत्यकार ने भी कपास की पहली फसल तोड़ने की तैयारी कर रखी है। वे कहते हैं, 'फसल अच्छी है, लेकिन खेतिहर मजदूरों की भारी कमी के चलते कटाई का काम बहुत ही धीमा हो गया है।' 'पिछले साल महिलाएं 200 रुपए में लगभग पूरे दिन काम काम करती थीं। अब मुझे आधे दिनों के लिए ही 250 रुपए देने पड़ रहे हैं।'
किसानों की बढ़ी खेती की लागत, छोटे किसानों का बढ़ गया संकट
विदर्भ के सभी जिलों में लगभग यही हाल है। सोयाबीन और कपास दोनों के रेट एमएसपी से भी कम हैं। अब ज्यादा पैसे देने की वजह से खेती की लागत बढ़ रही है, जिससे किसानों को या तो घाटा हो रहा है, या नाम मात्र का लाभ मिल रहा है। कुछ जानकारों का कहना है कि मजदूरों का संकट करीब एक दशक पहले कम दर पर अनाज देने के साथ शुरू हुआ।
नहीं थम रहा चुनावी रेवड़ियों का सिलसिला!
इस बीच विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) ने अपने चुनावी घोषणापत्र में लाडकी बहिन योजना के बदले महालक्ष्मी योजना लागू करने का वादा कर दिया है। इसके तहत विपक्षी गठबंधन ने महिलाओं को लाडकी बहिन के 1,500 रुपए के बदले 3,000 रुपए हर महीने देने का वादा कर दिया है।
'मनरेगा' की वजह से पहली बार देखा गया था ऐसा संकट!
खेतिहर मजदूरों के संकट की वजह से विशेष रूप से छोटे और मझोले किसानों की पीड़ा पहली बार तब बढ़ी थी, जब 2006 में केंद्र में यूपीए-1 की सरकार ने 'मनरेगा' की शुरुआत की थी। इसके तहत 100 दिन की रोजगार की गारंटी दी जाती है। इस योजना के कई सारे सकारत्मक पहलुओं के बीच खेतिहर मजदूरों की किल्लत बहुत बड़ी समस्या बनकर खड़ी हुई।
आमतौर पर मनरेगा मजदूरों की मजदूरी आम खेतिहर मजदूरों से ज्यादा होती है। आलोचना शुरू हुई कि मनरेगा के काम में कम मेहनत, कार्यों पर मामूली निगरानी और अन्य सुविधाओं की वजह से कृषि कार्यों में संकट खड़े होने लगे।
इसका असर कृषि उत्पादों के पैदावार पर भी पड़ने लगा और छोटे किसानों की कृषि से जुड़ी लागत भी बढ़ गई। इसकी वजह से कई छोटे और मझोले किसानों के लिए कृषि का कार्य करना बहुत ही मुश्किल होता चला गया।












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