Maharashtra Election: क्या दलित वोट के लिए महायुति की नई रणनीति से MVA को लगेगा झटका?
Maharashtra Election 2024 News: 2024 के लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र में विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) के 'संविधान और आरक्षण पर खतरे' के दावे ने बीजेपी, शिवसेना और एनसीपी के गठबंधन महायुति की लुटिया डुबो दी थी। राज्य की 48 लोकसभा सीटों के जो नतीजे आए उसके विश्लेषण से पता चलता है कि दलित (अनुसूचित जाति-SC) वोट बड़े पैमाने पर एमवीए की ओर चला गया।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में लोकसभा चुनावों वाला हाल न हो इसके लिए लगता है कि बीजेपी से उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, शिवसेना से मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और एनसीपी से उपमुख्यमंत्री अजित पवार की अगुवाई वाले सत्ताधारी महायुति गठबंधन दलितों के 'भ्रम' को दूर करने के लिए काफी सक्रिय हुआ है।

लोकसभा चुनावों में महायुति को हुआ दलित वोटों का नुकसान
लोकसभा चुनावों में एमवीए ने महाराष्ट्र में 30 सीटें जीती थीं और महायुति के खाते में मात्र 17 सीटें आई थीं। 48वीं सीट भी विपक्षी गठबंधन समर्थित प्रत्याशी के ही खाते में गई थी। इंडिया ब्लॉक की अगुवा कांग्रेस, उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) और शरद पवार की एनसीपी (एससीपी) तब 'संविधान और आरक्षण पर खतरे' वाले दावे को भुनाने में पूरी तरह से सफल हो गई थी।
दलित मतदाताओं के मन में तब विपक्ष के दावे का डर किस कदर बैठ गया था, वह इससे पता चलता है कि महाराष्ट्र के जिन 88 विधानसभा क्षेत्रों में दलित मतदाताओं की संख्या 15% से ज्यादा है, उनमें से 51 सीटें पर इस साल के लोकसभा चुनावों में एमवीए को बढ़त हासिल हुई थी थी। वहीं महायुति महज 32 सीटों पर ही आगे रहा था।
2019 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी-शिवसेना का रहा था दबदबा
जबकि, 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में इन्हीं 88 विधानसभा सीटों (दलित मदतादाताओं की अच्छी तादाद वाली सीटों) में तब बीजेपी और उसकी सहयोगी शिवसेना 46 सीटें जीती थी और 33 पर ही कांग्रेस और एनसपी को कामयाबी मिल सकी थी।
लोकसभा चुनावों में क्यों मिला एमवीए को दलित वोटों का फायदा?
इस बार के लोकसभा चुनावों में बीआर अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर की वंजित बहुजन अघाड़ी की मौजूदगी के बावजूद दलितों के मन में 'संविधान बदले जाने और आरक्षण खत्म किए जाने' वाला डर इस कदर बिठाया गया था कि एमवीए को जीत मिली और वीबीए का भी पत्ता साफ हो गया।
कुछ प्रभावशाली जातियों का ही रहा है दलितों में दबदबा
लोकसभा चुनावों के बाद दलित वोटरों के बीच अपना पुराना प्रभाव कायम करने को लेकर महायुति फिर से काफी सक्रिय हुआ है। 2011 की जनगणना के मुताबिक राज्य में अनुसूचित जातियों (SC) की आबादी लगभग 12% है, जिनमें करीब 59 अलग-अलग जातियां शामिल हैं।
गैर-अंबेडकरवादी दलितों पर महायुति डाल रही है डोरे!
लेकिन, इसमें से महार जैसी कुछ जातियों ने राजनीतिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से सबसे ज्यादा तरक्की की है। बाकी अन्य छोटी-छोटी दलित जातियां आज भी महारों के मुकाबले काफी पिछड़े हैं।
महाराष्ट्र के दलितों में जो अंबेडकरवादी जातियां हैं, वही शुरू से प्रभावशाली रहे हैं, इनमें महार सबसे आगे हैं। बीआर अंबेडकर के प्रभाव में महार समुदाय बौद्ध बन चुके हैं। बौद्ध बन चुके (महार) की आबादी दलितों का करीब 40% है, जो आमतौर पर बीजेपी और उससे जुड़ी पार्टियों का प्रमुखता से विरोध करती नजर आती हैं।
अनुसूचित जातियों के उपवर्गीकरण वाले मुद्दे से भी फायदा मिलने की उम्मीद!
बीजेपी और उसके सहयोगियों की नई रणनीति में बाकी छोटी-छोटी दलित जातियों पर ही फोकस करना शामिल है। इनके लिए अनुसूचित जातियों में सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार उप-वर्गीकरण की चर्चा शुरू की गई है। दिलचस्प बात ये है कि महार जैसी प्रभावशाली दलित जातियां ही इसका भी विरोध कर रही हैं।
इसके जवाब में ही सत्ताधारी गठबंधन अनुसूचित जातियों के उप-वर्गीकरण की वकालत कर रहा है, जिससे मातंग जैसी दलित जातियों के प्रभावित होने की संभावना है। इस समुदाय पर अंबेडकरवाद का खास प्रभाव नहीं दिखता और यह खुद को हिंदू संस्कृति से जोड़े हुए हैं।
अंबेडकरवादियों की तुलना में इस समुदाय को आज भी इनके दलित होने का उतना लाभ नहीं मिला है। लाभ के मामले में ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी अंबेडकारियों के हाथ ही लगती रही है।
महायुति गठबंधन ने दलितों के उप-वर्गीकरण के साथ-साथ जो मुख्यमंत्री लाडकी बहिन योजना शुरू की है, उसका भी लाभ छोटी-छोटी दलित जातियों को मिल रहा है, क्योंकि वे समाज में चुनिंदा दलित जातियों के मुकाबले आज भी काफी पीछे हैं। उप-वर्गीकरण होने पर इन्हें कोटा के अंदर कोटा का लाभ मिलने की उम्मीद जगी है।
चुनाव तारीखों की घोषणा से एक दिन पहले ही 15 अक्टूबर को महायुति सरकार ने उप-वर्गीकरण के मुद्दे पर विचार के लिए हाई कोर्ट के रिटायर्ज जज अनंत बदर की अगुवाई में एक सदस्यीय समिति गठित की है।
किसे वोट देंगे गैर-अंबेडकरवादी दलित?
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक औरंगाबाद के एक राजनीतिक कार्यकर्ता और दलित उद्यमी सिद्दांत वाघमारे ने कहा है, 'दलित वोटरों के बीच राजनीतिक परिदृश्य अस्थिर है....ज्यादा मुखर और राजनीतिक रूप से जागरूक अंबेडकरवादी बीजेपी का दृढ़ता से विरोध कर रहे हैं, जबकि दलित समुदाय का एक अहम हिस्सा पार्टी से मिल रहे प्रोत्साहनों पर प्रतिक्रिया दे सकता है।' 'बीजेपी इन गैर-अंबेडकरवादी दलित मतों को अपने पक्ष में कर पाती है या नहीं, वही आखिरकार इस चुनाव के परिणाम को निर्धारित करेगा।'












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