महाराष्ट्र में क्यों चौंकाने वाले हो सकते हैं इस बार के चुनाव नतीजे, किन किरदारों का बढ़ गया है रोल?

Maharashtra Chuanv 2024: महाराष्ट्र में मतदान का समय काफी नजदीक आ चुका है। 20 नवंबर को वोटिंग है और अब चुनावों में कुछ चीजें बहुत ही साफ हो रही हैं। अभी तक जो स्थिति दिख रही है, उससे एक बात साफ है कि इस बार राज्य में ऐसा चुनाव होने जा रहा है, जिसमें कई नेता प्रमुख किरदार में हैं। 23 नवंबर को किसका क्या कद होगा, अभी से भविष्यवाणी करना मुश्किल है।

मोटे तौर पर देखें तो राज्य में इस बार अलग-अलग दलों और गठबंधनों के 5 प्रमुख नेता हैं, जिनका किरदार तय करेगा कि प्रदेश की आगे की सियासी तस्वीर किस तरह की होने वाली है। वैसे तो महाराष्ट्र की 288 सीटों पर आमतौर पर बहुकोणीय मुकाबला देखा जा रहा है, लेकिन मोटे तौर पर सत्ताधारी महायुति और विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) गठबंधनों के बीच ही कांटे की टक्कर लग रही है।

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एकनाथ शिंदे ने खुद की अलग छवि तैयार की
इस बार के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में जिन पांच नेताओं की भूमिका प्रमुख लग रही है, उसमें सबसे पहले स्थान पर मुख्यमंत्री और शिवसेना के प्रमुख एकनाथ शिंदे हैं। मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना की वजह से वे काफी चर्चा में हैं, जिसकी वजह से एमवीए के सूरमा शरद पवार भी महायुति की रणनीति का लोहा मान चुके हैं। पिछले कुछ समय से शिंदे ने खुद को मराठा नेता के रूप में भी प्रोजेक्ट करना शुरू किया है।

देवेंद्र फडणवीस फिर से अपने अवतार में
उन्हीं की तरह उपमुख्यमंत्री और बीजेपी के दिग्गज देवेंद्र फडणवीस ने फिर से अपने किरदरार को उसी तरह से ढालने की कोशिश की है, जिसकी अगुवाई में पांच साल पहले राज्य में एनडीए ने एंटी-इंकंबेंसी को हराकर चुनावों में बड़ी जीत दर्ज की थी। वे महायुति सरकार के मुख्य कर्ताधर्ता तो हैं ही, उन्होंने आरएसएस को फिर से भाजपा की सहायता के लिए सक्रिय करवाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

कुल मिलाकर लोकसभा चुनाव में महायुति के खिलाफ एमवीए ने जो माहौल बनाया था, उससे उबरने में फडणवीस का रोल बहुत बड़ा है और अगर इसका फायदा सत्ताधारी गठबंधन को मिलता है तो उसका श्रेय भी उन्हीं को जाएगा।

अजित पवार साबित हो सकते हैं चुनाव के एक्स फैक्टर
महायुति की ओर से इस चुनाव के तीसरे किरदार एनसीपी चीफ और डिप्टी सीएम अजित पवार हैं। उन्होंने जिस तरह से नवाब मलिक को टिकट देने में बीजेपी के दबाव को नहीं माना है और भाजपा के 'बटेंगे तो कटेंगे' वाले नारे से खुले तौर पर दूर रहने की कोशिश की है, उससे यह साफ है कि उन्होंने महायुति गठबंधन में रहकर भी अपने लिए एक अलग मैदान बनाने की कोशिश की है।

वैसे उनकी खुद की बारामती सीट ही फिलहाल फंसी हुई लग रही है, लेकिन जिस तरह से उन्होंने चाचा शरद पवार की परछाई और भाजपा-एनसीपी के प्रभाव से अलग रखकर खुद को एक स्वतंत्र भूमिका में पेश करने की कोशिश की है, वह 23 नवंबर को इस चुनाव का एक्स फैक्टर साबित हो सकता है।

कांग्रेस दूर की रणनीति पर कर रही है काम!
इस चुनाव में कांग्रेस की कोशिश महा विकास अघाड़ी में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभर कर मुख्यमंत्री पद पर दावा ठोकने की है, लेकिन उसने प्रदेश के किसी एक नेता को प्रोजेक्ट करने से परहेज किया है। ना ही उसने पार्टी सांसद राहुल गांधी पर ही लोकसभा चुनावों की तरह पूरा दांव लगाया है। पार्टी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नेताओं से उम्मीदें लगाए बैठी है। उसे अपने वोट बैंक पर पक्का यकीन है और पार्टी सिर्फ उसे सहेजे रखने के लिए काम कर रही है। अगर इस रणनीति से कांग्रेस का सिक्का चल गया तो वह इस चुनाव में भी साइलेंट किलर बन सकती है।

कांग्रेस के प्रदर्शन के भरोसे उद्धव ठाकरे?
कांग्रेस में किसी एक किरदार का प्रभाव नहीं नजर आ रहा है, लेकिन उसकी सहयोगी शिवसेना-यूटीबी के चीफ उद्धव ठाकरे के लिए यह राजनीति की बहुत ही मुश्किल लड़ाई है। लोकसभा चुनावों में पार्टी में टूट की वजह से उनके पक्ष में जो सहानुभूति का एक माहौल था, वह अब उस स्तर पर तो कतई नहीं रह गई है। उनके किरदार का आखिर क्या परिणाम निकलेगा, यह बहुत कुछ उनकी सहयोगी कांग्रेस के वोट बैंक पर निर्भर है।

शरद पवार ने चल दिया सबसे बड़ा सहानुभूति कार्ड!
महा विकास अघाड़ी के सबसे बड़े किरदार आज भी एनसपी-एससीपी चीफ शरद पवार हैं। आगे कोई चुनाव नहीं लड़ने का संकेत देकर उन्होंने बहुत बड़ा सहानुभूति कार्ड चला है। उनका सारा सियासी दांव बारामती पर टिका है, जहां उनकी पार्टी का भतीजे अजित पवार के साथ सीधी टक्कर है। वैसे पवार खुद भी मान चुके हैं कि लाडकी बहिन योजना जैसे कल्याणकारी कार्यक्रमों से महायुति को फायदा मिल सकता है।

शरद पवार के संरक्षण में महायुति गठबंधन को अपने वोट बैंक के साथ-साथ सबसे बड़ी उम्मीद मराठा मतदाताओं से है। जिस तरह से चुनाव के ठीक पहले मराठा कोटा आंदोलनकारी मनोज जारांगे पाटिल ने चुनाव में अलग से प्रत्याशी उतारने की अपनी बात से पलटी मारी है, उससे लगता है कि यह परोक्ष तौर पर एमवीए की राह आसान करने के लिए किया गया है।

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क्योंकि, भाजपा जहां ओबीसी वोट बैंक को गोलबंद करने में लगी रही, वहीं मराठा वोट बंटने से एमवीए को ज्यादा नुकसान होने की आशंका थी। पवार खुद भी मराठा हैं और अगर उनकी रणनीति काम कर गई तो महायुति की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। यही वजह है कि 23 नवंबर को किसी एक गठबंधन या दल के पक्ष में जनादेश आएगा या फिर त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनेगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। लेकिन, अभी तो यही लग रहा है कि नतीजे जो भी आएं, वह हरियाणा की तरह ही चौंकाने वाले हो सकते हैं!

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