महाराष्ट्र में कहां उलझ गया विपक्ष, 'इंडी' अलायंस में सीट-बंटवारे पर क्या चल रहा है खेल?
महाराष्ट्र बिहार और तमिलनाडु के बाद उन राज्यों में से है, जहां विपक्षी इंडिया ब्लॉक की बुनियाद ज्यादा गहरी और पुरानी है। मतलब, इसमें जितनी भी पार्टियां शामिल हैं, वह पहले से ही महा विकास अघाड़ी (MVA) के तहत एक ही मंच पर हैं। सवाल है कि फिर भी यहां विपक्षी गठबंधन अबतक सीटें फाइनल क्यों नहीं कर पाया है।
यूपी की 80 लोकसभा सीटों के बाद महाराष्ट्र में ही सबसे ज्यादा 48 सीटें हैं। उत्तर प्रदेश में तो अब लग रहा है कि इंडिया ब्लॉक अंतिम सांसें गिन रहा है।

आठ सीटों पर आपसी दावेदारी से उलझा है मामला
लेकिन, महाराष्ट्र में जो सीटों के बंटवारे में देरी हो रही है, उसकी वजह कुछ लोकसभा सीटें हैं, जिसकी दावेदारी के मोह ने कांग्रेस, एनसीपी शरदचंद्र पवार और शिवसेना उद्धव बाल ठाकरे तीनों को आगे बढ़ने से रोक रखा है।
मुंबई की दो सीटों पर भी नहीं निकल रहा समाधान
जानकारी के मुताबिक 40 सीटों पर तो फिर भी डील पक्की हो चुकी है, लेकिन 8 सीटों पर ऐसा पेच फंसा हुआ है कि कोई रास्ता निकालना मुश्किल हो रहा है। खबरों के मुताबिक इन सीटों में मुंबई की दो सीटें भी शामिल हैं, जिनपर न तो शिवसेना (यूबीटी) समझौते के लिए तैयार है और न ही कांग्रेस का मोह खत्म हो रहा है।
मुंबई की जिन सीटों को लेकर मतभेद की खबरें हैं, उनमें मुंबई साउथ सेंट्रल और मुंबई नॉर्थ वेस्ट बताई जा रही हैं। यहां उद्धव की पार्टी इसलिए दावेदारी कर रही है कि यहीं दादर भी है, जहां उसका पार्टी मुख्यालय है।
पिछली बार शिवसेना के राहुल शेवाले यहां कांग्रेस को हराकर जीते थे, जो कि अब उद्धव के साथ नहीं हैं। वहीं कांग्रेस की ओर से पार्टी की मुंबई प्रमुख वर्षा गायकवाड़ दावेदार बताई जा रही हैं।
इसी तरह मुंबई नॉर्थ वेस्ट सीट पर 2019 में शिवसेना के गजानन कीर्तिकर ने कांग्रेस के दिग्गज संजय निरुपम को हराया था। निरुपम कांग्रेस के उन नेताओं में से हैं, जो उद्धव की आलोचना भी करते रहे हैं और वह यहां फिर से दावेदारी जता रहे हैं।
जबकि, उद्धव की पार्टी यहां से अमोल कीर्तिकर को संभावित उम्मीदवार मानकर चल रही है, जो शिवसेना सांसद के ही बेटे हैं और लेकिन वह शिवसेना (यूबीटी) में रह गए हैं।
मुंबई के बाहर 6 सीटों पर जारी है खींचतान
इसी तरह से पुणे लोकसभा सीट कांग्रेस और एनसीपी शरदचंद्र पवार के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई बनी हुई है। दोनों में से कोई भी पार्टी यहां अपनी दावेदारी नहीं छोड़ना चाह रही है।
पिछले चुनाव में इस सीट से भाजपा के गिरिश बापट ने कांग्रेस उम्मीदवार को सवा तीन लाख वोटों के अंतर से हराया था। लेकिन, कांग्रेस इसकी डिमांड इसलिए कर रही है, क्योंकि उससे पहले ये उसकी परंपरागत सीट रही है। लेकिन, पवार की पार्टी को उम्मीद है कि शरद पवार का इलाके में इतना प्रभाव है कि अबकी बार वह भाजपा को रोकने में ज्यादा सक्षम हो सकते हैं।
इनके अलावा जिन सीटों पर तीनों सहयोगी दलों के बीच बातचीत अटकी हुई है, उनमें नासिक, कोल्हापुर, वर्धा, भंडारा-गोंदिया, अकोला और हिंगोली लोकसभा की सीटें बताई जा रही हैं।
पार्टियों के लिए 2019 से बदल चुके हैं हालात
सीटों के बंटवारे में परेशानी की असल वजह ये है कि कांग्रेस के अलावा उसकी दोनों ही पार्टियों की परिस्थितियां बदल चुकी हैं। पिछली बार भाजपा के साथ गठबंधन में शिवसेना को बड़ी सफलता मिली थी। लेकिन, असली शिवसेना अब मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के साथ रह गई है।
उसी तरह से कांग्रेस के साथ एनसीपी लड़ी थी, लेकिन वह विभाजित हो चुकी है और असली पार्टी अजित पवार के साथ रह गई है। यही वजह है कि फिलहाल सीटों के बंटवारे की घोषणा होने में देरी हो रही है।












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