क्या महाराष्ट्र का राजनीतिक संकट उद्धव ठाकरे के नियंत्रण में है या संजय राउत कर रहे हैं खोखले दावे ? जानिए
मुंबई, 21 जून: महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार अपने ढाई साल के कार्यकाल के सबसे गंभीर राजनीतिक संकट में फंसी है। उद्धव सरकार में शहरी विकास और पीडब्ल्यूडी (पब्लिक अंडरटेकिंग) विभाग के कैबिनेट मंत्री और शिवसेना के कद्दावर नेता एकनाथ शिंदे के 21 विधायकों के साथ गुजरात में डेरा डालने की रिपोर्ट है। शिंदे ने यह कदम उसी दिन उठाया है, जब एमवीए सरकार के विधायकों के भाजपा के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग की वजह से सत्ताधारी गठबंधन को जोरदार झटका लगा है। लेकिन, शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत अभी भी दावा कर रहे हैं कि उद्धव सरकार को कोई खतरा नहीं है और जल्द ही सबकुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन, आइए पड़ताल करते हैं कि क्या राउत के दावों में कोई दम भी है या फिर वह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी कर रहे हैं ?

शिंदे शिवसेना के वफादार कार्यकर्ता- राउत
शिवसेना के वरिष्ठ नेता एकनाथ शिंदे के 21 एमएलए के साथ सूरत में कैंप करने के बावजूद पार्टी ने दावा किया है कि ये कुछ भी नहीं है और दिन खत्म होने तक सबकुछ सुलझा लिया जाएगा। लेकिन, सवाल है कि अबकी बार महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी सरकार की अगुवा शिवसेना नेताओं के दावों में कोई दम है या फिर वह सिर्फ सियासी स्टंट करने में लगे हुए हैं। क्योंकि, शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा है कि 'महाराष्ट्र सरकार को गिराने की कोशिशों के तहत एकनाथ शिंदे का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो कि सफल नहीं होगा। शिंदे पार्टी के वफादार कार्यकर्ता हैं, जो कई बार हमारे साथ आंदोलनों में हिस्सा ले चुके हैं। वो बाला साहेब के सैनिक हैं।' उन्होंने यह भी दावा किया है कि शिंदे के साथ संपर्क स्थापित कर लिया गया है।

विधान परिषद चुनाव में 10 में से 5 सीटें जीत गई बीजेपी
लेकिन, कम से कम जो चीजें सामने दिखाई पड़ रही हैं, उससे तो नहीं लगता कि शिवसेना के दावों में खास दम है। पहला तथ्य ये है कि एकनाथ शिंदे ने 21 समर्थक एमएलए के साथ भाजपा शासित गुजरात में पनाह लिया है। यानी उन्होंने ऐसा क्या सोचकर किया है, उसे समझने में जरा भी असमंजस नहीं होना चाहिए। शिंदे ने यह कदम विधान परिषद चुनाव के नतीजे आने के तत्काल बाद उठाया है, जिसमें भाजपा 10 में से 5 सीटें जीत चुकी है, जबकि उसके पास 4 से ज्यादा को जीत दिलाने की क्षमता नहीं थी। बीजेपी के दावे के मुताबिक पार्टी के पक्ष में सत्ताधारी एमवीए के 21 वोट टूट कर पड़े हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल के मुताबिक पार्टी उम्मीदवारों को 134 प्राथमिकता वाले वोट मिले हैं, जबकि इसके पास सदन में 106 एमएलए ही हैं। पार्टी के पक्ष में सात निर्दलीयों का वोट आने की बात भी कही जा रही है। इससे पहले शिवसेना राज्यसभा चुनाव में भी भाजपा से पटखनी खा चुकी है, जब बीजेपी के तीनों उम्मीदवार संसद के ऊपरी सदन में पहुंच गए।

पवार कर चुके हैं फडणवीस के रणनीति की तारीफ
उद्धव ठाकरे की सरकार में उनकी पार्टी शिवसेना, कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी शामिल है। बावजूद इसके यह गठबंधन राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों में अपना वोट बचाने में नाकाम रहा है और बीजेपी क्रॉस-वोटिंग के सहारे क्षमता से ज्यादा सीटें जीती है। जबकि, चुनाव से पहले एमवीए के नेता बड़े-बड़े दावे कर रहे थे। लेकिन, फडणवीस की रणनीति के सामने सत्ताधारी गठबंधन के सभी धुरंधर अबतक बौने साबित हुए हैं। राज्यसभा के परिणाम के बाद शरद पवार ने उन्हें 'चमत्कार करने वाला' बताया था। पवार महाराष्ट्र की राजनीति में इतने धुरंधर हैं कि उनके मन में क्या चल रहा है, यह सिर्फ वही जान सकते हैं। ऊपर से उनकी पार्टी के दो-दो बड़े नेता एक पूर्व कैबिनेट मंत्री और एक वर्तमान मंत्री मनी-लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों में जेल में हैं। जाहिर है कि इसकी वजह से उनपर भी पार्टी के अंदर से काफी दबाव है। इन नेताओं के खिलाफ कार्रवाई के लिए महाराष्ट्र के सत्ताधारी दल लगातार केंद्र सरकार की आलोचना करते रहे हैं।

शिंदे ने भाजपा-शासित राज्य में डाला डेरा
अब जरा सोमवार से महाराष्ट्र की राजनीति के बदले घटनाक्रम पर गौर फरमाइए। राज्यसभा चुनाव में मात खाने के बाद उद्धव ठाकरे को देवेंद्र फडणवीस ने विधान परिषद चुनाव में भी मात दिया है। चुनाव परिणाम आने के साथ शिंदे पिछली ही रात गुजरात निकल गए। उधर फडणवीस केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मिलने दिल्ली पहुंच गए। ये वही फडणवीस हैं, जो 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा में शिवसेना-बीजेपी के घोषित सीएम प्रत्याशी थे, लेकिन चुनाव के बाद उद्धव ठाकरे ने पवार और सोनिया गांधी की टीम से सेटिंग करके उनकी कुर्सी छीन ली थी।

सबसे गंभीर राजनीतिक संकट में फंसी है उद्धव सरकार
उधर क्रॉस-वोटिंग के बाद मिली हार के बाद कांग्रेस ने भी अपने एमएलए को दिल्ली बुला लिया है। शिवसेना और कांग्रेस राज्य में सरकार में है, लेकिन पहले भी उनके नेता अक्सर अलग-अलग दिशाओं में चलते दिखाई पड़े हैं। इसलिए, महाराष्ट्र में शिंदे की वजह से जो राजनीतिक परिस्थितियां पैदा हुई हैं, वह कोई ऐसी नहीं है, जिसे ठाकरे के प्रवक्ता राउत के बयानों से सामान्य किया जा सके। सच्चाई ये है कि ठाकरे सरकार पर यह राजनीतिक संकट वास्तविक है और शायद ढाई साल के उनके कार्यकाल में सबसे गंभीर भी।












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