Explained: महाराष्ट्र में MVA से BJP और महायुति की ओर कैसे झुके दलित वोटर?
Dalits Voting pattern in Maharashtra: महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद जैसे-जैसे एक-एक सीटों पर हुए मतदान का विश्लेषण हो रहा है, जमीनी सच्चाई से पर्दा उठ रहा है। राज्य में अनुसूचित जातियों (SC) के लिए आरक्षित सीटों या उन सीटों पर जहां दलित जातियों की आबादी कम से कम 15% है, वोटिंग पैटर्न के विश्लेषण से लग रहा है कि दलित वोटर महा विकास अघाड़ी (MVA) से निकलकर बीजेपी की अगुवाई वाले महायुति की ओर शिफ्ट हो गए हैं।
लोकसभा चुनावों में विपक्षी एमवीए या इंडिया ब्लॉक ने सत्ताधारी एनडीए या महायुति के खिलाफ जो 'संविधान और आरक्षण खत्म करने' वाला नैरेटिव चलाया था, उसकी वजह से इनके दलित वोट बैंक में बहुत बड़ी सेंधमारी हो गई थी। लेकिन, महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के वोटिंग पैटर्न को परखने के बाद कहा जा सकता है क बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने एक बार फिर से दलितों का दिल जीत लिया हैं।

दलित वोटरों में चल गया बीजेपी और महायुति का सिक्का
महाराष्ट्र में अनुसूचित जातियों या दलितों के लिए विधानसभा की 29 सीटें आरक्षित हैं। इसी तरह से 67 सामान्य सीटें ऐसी हैं, जहां करीब 12% दलित आबादी (2011 की जनगणना के अनुसार) वाले प्रदेश में 15% से ज्यादा दलित मतदाता हैं। भाजपा और महायुति ने इस चुनाव में किस तरह से इन क्षेत्रों में सफलता पाई है, उसका अंदाजा कुछ आंकड़ों को देखने से लग जाता है।
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अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 29 सीटों पर महायुति को 49.48% वोट मिले हैं। वहीं कम से कम 15% दलित आबादी वाली सामान्य सीटों पर इसे 48.14% वोट मिले हैं। अगर महा विकास अघाड़ी के प्रदर्शन की तुलना करें तो उन्हें आरक्षित सीटों पर मात्र 39.43% वोट मिले हैं। लगभग ऐसी ही स्थिति सामान्य सीटों पर भी अनुमानित है।
दलितों के आरक्षित 29 सीटों में 20 पर महायुति जीता
अब बात करते हैं दलितों के लिए आरक्षित सीटों की। इनके लिए आरक्षित 29 सीटों में से महायुति को 20 सीटें मिली हैं, वहीं एमवीए के खाते में सिर्फ 9 सीटें गई हैं। इसी तरह से कम से कम 15% दलित आबादी वाली 67 सामान्य सीटों में से महायुति 59 सीटें जीत गया है और एमवीए के खाते में मात्र 8 सीटें गई हैं।
आरक्षित सीटों में भी बीजेपी को सबसे ज्यादा कामयाबी
महायुति को दलित मतदाताओं के प्रभाव वाली सीटों पर यह जो सफलता मिली है, उसका सबसे बड़ा हिस्सा भाजपा के पास गया है। महायुति जो दलितों के लिए आरक्षित 20 सीटें जीता है, उसमें से आधी यानी 10 बीजेपी को मिली हैं। इसके बाद एनसीपी ने 5 और शिवसेना ने 4 सीटें जीती हैं। 1 सीट महायुति की छोटी सहयोगी के खाते में गई है।
दलितों के लिए आरक्षित सीटों पर एमवीए का प्रदर्शन बहुत खराब
वहीं 'बीजेपी संविधान बदल देगी, आरक्षण खत्म कर देगी' का अभियान चलाकर लोकसभा में महायुति का बेड़ा गर्क करने वाले एमवीए की अगुवा कांग्रेस पार्टी विधानसभा चुनावों में दलितों के लिए आरक्षित सीटों में सिर्फ 4 ही जीती है। उसके बाद उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को 3 और शरद पवार की एनसीपी (एसपी) को 2 सीटें मिली हैं।
15% से अधिक दलित आबादी वाली 67 सीटों में बीजेपी अकेले 42 सीटें जीती
वहीं 15% से अधिक दलित आबादी वाली 67 सामान्य सीटों में भारतीय जनता पार्टी ने अकेले 42 सीटें जीती हैं। इसके बाद 8 एनसीपी और 6 शिवसेना को मिली हैं। इनके अलावा 3 सीटें महायुति के छोटे सहयोगी दलों ने जीती हैं। वहीं एमवीए ने जो 8 सीटें जीती हैं, उनमें से 3 कांग्रेस को और शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (एसपी) को 2-2 सीटें मिली हैं। एक सीट पीजेंट्स एंड वर्क्स पार्टी के खाते में गई है।
लोकसभा चुनावों में ऐसी सीटों पर एमवीए का था दबदवा, सभी 5 आरक्षित सीटें जीता था
हम महाराष्ट्र में दलित वोटों के एमवीए से बीजेपी या उसके सहयोगियों में ट्रांसफर होने की जो बात कर रहे हैं, यह तब अच्छे से मालूम पड़ेगा, जब हम इस साल के लोकसभा चुनावों के आंकड़े देखेंगे।
लोकसभा चुनावों में दलितों के लिए सुरक्षित विधानसभा सीटों वाले इलाके में जहां महायुति को मात्र 10 क्षेत्रों में बढ़त मिली थी, वहीं एमवीए ने 18 सीटों पर बाजी मारी थी। एक सीट पर निर्दलीय की बढ़त थी।
वहीं 15% से ज्यादा दलित वोटरों वाले विधानसभा क्षेत्रों में जहां एमवीए को 37 सीटों पर बढ़त मिली थी, वहीं महायुति सिर्फ 26 सीटों पर ही बढ़त बना सका था। यही वजह है कि लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सभी 5 लोकसभा सीटों पर एमवीए का कब्जा हो गया था। 4 विधानसभा सीटों में से 2-2 पर एआईएमआईएम और निर्दलियों को बढ़त मिली थी।
दलित आबादी वाली सीटों पर महायुति की जीत का मार्जिन भी दोगुनी से ज्यादा
यही नहीं विधानसभा चुनावों में एससी के लिए आरक्षित सीटों में महायुति प्रत्याशियों की जीत का मार्जिन भी एमवीए उम्मीदवारों की तुलना में औसतन दोगुनी से ज्यादा रही है। यही पैटर्न 15% से अधिक दलित वोटरों वाली सामान्य सीटों पर भी नजर या है।
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कुल मिलाकर एक लाइन में यही निष्कर्ष निकलता है कि अगर 'संविधान और आरक्षण मिटाने' वाले नैरेटिव ने लोकसभा चुनावों में महायुति या एनडीए का किला ध्वस्त कर दिया था तो विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'एक हैं, तो सेफ हैं' और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के 'बटेंगे तो कटेंगे' वाले नारों ने दलित,ओबीसी और आदिवासी वोटरों को महायुति के पक्ष में पूरी तरह से गोलबंद करने का काम किया।
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