Explained: यूपी में OBC और दलित वोटरों ने फिर से कैसे की BJP की ओर वापसी
UP Assembly Bypolls Result: लोकसभा चुनावों में यूपी के चुनाव परिणाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सियासी करियर के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण माना जा सकता है। क्योंकि, इस नतीजे ने लोकसभा में बीजेपी को अकेले के बहुमत से दूर कर दिया। इसकी बड़ी वजह ये रही कि तब विपक्ष ने बीजेपी और इसकी सरकार के खिलाफ ऐसा नैरेटिव सेट किया था कि इसके ओबीसी जनाधार में भी कमी आई और दलित वोटरों ने भी बड़े पैमाने पर मुंह फेर लिया था। लेकिन, यूपी में 9 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के नतीजों से लगता है कि ये दोनों फिर से बीजेपी के खेमें में वापस लौट चुके हैं।
यूपी में 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से 2022 के विधानसभा चुनावों तक कुल चार चुनाव हुए थे और सबमें भाजपा ने धमाकेदार जीत दर्ज की थी। इसकी वजह उसके पीछे ओबीसी और दलित मतदाताओं की बड़े पैमाने पर गोलबंदी ही थी। लेकिन, 2024 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी की अगुवाई वाला इंडिया ब्लॉक इसमें बहुत ही ज्यादा सेंधमारी करने में सफल हुआ और राज्य में भारतीय जनता पार्टी को एक दशक में सबसे बड़े झटका लग गया।

मुश्किल परिस्थितियों में बीजेपी ने मारी बाजी
लेकिन, 20 नवंबर, 2024 को हुए विधानसभा उपचुनावों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में पार्टी ने एक बार फिर से बाजी पलट दी है। 9 सीटों में से वह अकेले 6 सीटें जीत गई है और सातवीं सीट पर उसके सहयोगी राष्ट्रीय लोक दल (RLD) ने कब्जा किया है। यह चुनाव सत्ताधारी बीजेपी के लिए अपने समीकरण को फिर से पटरी पर लाने के लिए बहुत ही कठिन था, क्योंकि यह 9 सीटें राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में हैं।
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निषाद पार्टी को सीटें नहीं देने की रणनीति भी काम आई
अलग-अलग इलाकों में होने की वजह से इन सभी सीटों के लिए अलग-अलग राजनीतिक समीकरण बिठाने की आवश्यकता थी। और उसी तरह से हर सीट के लिए भिन्न जातीय गोलबंदी को अंजाम देने की भी जरूरत थी। इसलिए पार्टी ने हर सीट के लिए अलग-अलग रणनीति तैयार की और इसकी कमान खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संभाली। इसी रणनीति के तहत बीजेपी ने कटेहरी और मझवां में अपने प्रत्याशी उतारे। 2022 के विधानसभा चुनाव में सीटों के तालमेल के तहत यह दोनों सीटें उसने अपनी सहयोगी निषाद पार्टी को दी थी।
करहल में भी सपा को दी कांटे की टक्कर
बीजेपी की रणनीति सफल रही और पार्टी ये दोनों ही सीटें जीत गई। कटेहरी में तो तीन दशकों के बाद उसका भगवा परचम लहरा सका। इसके साथ ही कड़े मुकाबले के बावजूद पार्टी फूलपुर सीट अपने पाले में रखने में सफल रही। पार्टी के लिए खुश होने की बात ये है कि इसका वोट शेयर करहल में भी बढ़ गया जो कि सपा और उसके मुखिया अखिलेश यादव का गढ़ है, जिसे उन्होंने कन्नौज से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद छोड़ा है।
भाजपा ने यहां के लिए अलग रणनीति अपनाई थी। अनुजेश यादव जैसे स्थानीय यादव चेहरे को उतारने का उसका मकसद ही यही था कि इस वर्ग के वोटरों में जनाधार का और विस्तार किया जाए। यही वजह है कि यहां पार्टी ने सपा प्रत्याशी तेज प्रताप यादव को कड़ी चुनौती दी, जिससे उनकी जीत का मार्जिन घटकर सिर्फ 14,725 वोट रह गया। 2022 में अखिलेश ने यहां एसपी सिंह बघेल जैसे दिग्गज भाजपा नेता को 67,504 वोटों से हराया था।
ओबीसी और दलित मतदाताओं के समर्थन के बिना ये जीत मुमकिन नहीं
बीजेपी के लिए सपा से छीनकर कटेहरी विधानसभा सीट जीतना बिना ओबीसी और दलित मतदाताओं के समर्थन के मुमकिन नहीं था। बीजेपी ने यहां से पूर्व बीएसपी नेता धर्मराज निषाद को उतारा था, जो दलितों मतदाताओं के बीच काफी लोकप्रिय रहे हैं। वे पहले भी तीन बार के विधायक रह चुके हैं।
कटेहरी में दलितों के अलावा ब्राह्मण मतदाता भी बड़ी तादाद में हैं। सपा ने यहां से अंबेडकर नगर के सांसद लालजी वर्मा की पत्नी शोभावती वर्मा को उतारा था। इस साल लोकसभा चुनाव में लालजी वर्मा की जीत की वजह से यह सीट खाली हुई थी। वे 2017 और 2022 दोनों बार इस विधानसभा सीट से जीत चुके थे। इसके बावजूद यहां से भाजपा का जीतना काफी मायने रखता है।
सभी सियासी चुनौतियों से निपटने में सफल रहे सीएम योगी
2024 के लोकसभा चुनावों में निराशा हाथ लगने के बाद यूपी में बीजेपी के सामने शुरू में दो बड़ी चुनौतियां थीं। एक तो पार्टी संगठन और सरकार के बीच ज्यादा तालमेल बिठाने की और दूसरी ओबीसी और दलित मतदाताओं में अपने खिसके जनाधार को वापस अपने खेमे में वापस लाने की। उपचुनावों के परिणाम को देखने के बाद राजनीति के विशेषज्ञ भी मान रहे हैं कि सीएम योगी और बीजेपी इन दोनों ही चुनौतियों से निपटने और मुख्य प्रतिद्वंद्वी सपा और उसके सुप्रीमो को किनारे करने में सफल रहे हैं।
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यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि उपचुनाव के लिए खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मोर्चा संभाला था और सभी 9 सीटों पर अपने मंत्रियों को तैनात कर रखा था। सीएम खुद जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं से संपर्क में रहे और इस कामयाबी में उनके 'बटेंगे तो कटेंगे' जैसे नारों ने भी निर्णायक भूमिका निभाई, जिसने विपक्ष के साथ सीधी लड़ाई में पार्टी के जनाधार को गोलबंद करने में गजब की सफलता हासिल की।












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