Chhagan Bhujbal: अजित पवार की NCP को कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं भुजबल?
Chhagan Bhujbal News: एनसीपी नेता छगन भुजबल को देवेंद्र फडणवीस सरकार में मंत्री नहीं बनाया गया है, इसके लिए वह अपनाी ही पार्टी के चीफ और डिप्टी सीएम अजित पवार से नाराज हैं। उन्होंने जो संकेत दिए हैं,उससे लगता है कि वह एनसीपी से निकलने की सोच रहे हैं। भुजबल महाराष्ट्र के बड़े ओबीसी नेताओं में से गिने जाते रहे हैं,इसलिए यह समझना जरूरी है कि अगर वह इस तरह का कदम उठाते हैं,तो एनसीपी को कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं।
छगन भुजबल का पार्टी बदलने का इतिहास नया नहीं है। इसलिए,अगर वह एनसीपी नेतृत्व के खिलाफ खुलकर नाराजगी जता रहे हैं तो निश्चित तौर पर कई तरह के विकल्पों पर विचार भी कर रहे होंगे। उन्होंने अजित पवार पर अपनी मर्जी से पार्टी चलाने का आरोप लगाया है।

जहां नहीं चैना, वहां नहीं रहना- छगन भुजबल
छगन भुजबल मंत्री नहीं बनाए जाने के लिए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस या उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को दोष नहीं दे रहे हैं। उन्होंने अपने खास अंदाज में कुछ इस तरह से अपना असंतोष जारी किया है,'जहां नहीं चैना, वहां नहीं रहना।'ऐसा पहली बार नहीं है।
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छगन भुजबल पहले शिवसेना और फिर शरद पवार गुट का साथ छोड़ चुके हैं
1991 के दिसंबर में 17 बागी विधायकों के साथ वह शिवसेना तोड़कर निकल गए थे, क्योंकि पार्टी के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे ने महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष का नेता तय करते हुए उन्हें नजरअंदाज कर दिया था। 33 साल बाद वह उसी सियासी मोड़ पर खड़े हैं।
छगन भुजबल को अगला विकल्प चुनने में उम्र बनेगी चुनौती
हालांकि, तब शिवसेना और भुजबल दोनों का सियासी कद ऊपर की ओर बढ़ रहा था। लेकिन, आज की तारीख में क्या भुजबल वही कहानी दोहराने में सफल हो सकेंगे, यह बहुत बड़ा सवाल है। इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि भुजबल 77 वर्ष के हो चुके हैं और राज्य में अगला प्रमुख चुनाव फिलहाल कम से कम पांच वर्ष बाद ही होने की गुंजाइश बची है।
छगन भुजबल को एनसीपी से निकलने में कई चुनौती
सिर्फ उम्र ही उनके संभावित नए राजनीतिक सफर में आड़े नहीं आएगी, बल्कि कई लंबित मुकदमे और ओबीसी के बीच उनका घटता प्रभाव भी उनके लिए कम चुनौती बनकर नहीं खड़ी होगी। अगर वह एनसीपी तोड़ना चाहते हैं तो पार्टी के 41 विधायकों में से कम से कम 28 का जुगाड़ करना होगा। यह फिलहाल संभव नहीं लगता और विधायकी से इस्तीफा देने का फैसला किया तो सियासत में नए सिरे से पांव जमाना भी मुश्किल हो सकता है।
जब भुजबल ने बालासाहेब से बगावत की थी, तब मंडल आंदोलन चरम पर था। माली जाति से होने की वजह से उन्होंने खुद को आसानी से ओबीसी के चैंपियन के रूप में पेश कर दिया। सियासी आक्रमकता तो उन्हें बाल ठाकरे से शिक्षा में मिली थी। मराठी मानुष की राजनीति करने की ट्रेनिंग भी उन्हें शिवसेना ने दी थी।
अब शरद पवार का सियासी आशीर्वाद भी किस काम का?
शिवसेना से निकलने के बाद भुजबल को तब के मराठा दिग्गज शरद पवार का साथ मिल गया। कांग्रेस में उनका कद सबपर भारी था। लेकिन,जब 90 के दशक के आखिर में पवार ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर एनसीपी बनाई तो भुजबल ने उनके साथ ही बने रहने में फायदा समझा। आगे चलकर जब भी महाराष्ट्र कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की सरकारें बनीं, पवार के प्रताप से भुजबल को 'मलाईदार' विभाग मिलते रहे। वे गृहमंत्री से लेकर पीडब्ल्यूडी मंत्री और यहां तक कि उपमुख्यमंत्री भी बन गए।
तेलगी घोटाले में नाम आया, लेकिन उनकी राजनीति फीकी नहीं पड़ी। क्योंकि, सिर पर पवार का पॉवर था तो महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में कोई हाथ लगाने वाला नहीं दिखता था। लेकिन, 2014 में जब बीजेपी-शिवसेना सत्ता में आ गई और उसके बाद वह मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में दो साल के लिए जेल गए तो उनकी पहले जैसी चलती नहीं रह गई।
शरद पवार का आशीर्वाद लिया और अजित पवार के साथ निकल लिए
2019 में फिर से बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की जीत हुई। अगर उद्धव ठाकरे पलटी नहीं मारते और शिवसेना, कांग्रेस, एनसीपी गठबंधन की महा विकास अघाड़ी सरकार नहीं बनती और भुजबल का सियासी सितारा तब भी गर्दिश में ही होता। लेकिन, उद्धव सीएम बने और शरद पवार के आशीर्वाद ने उन्हें फिर से मंत्री पद दिला दिया। जुलाई, 2023 में जब अजित पवार ने चाचा से बगावत की तो भुजबल ने भतीजे का हाथ पकड़ लिया और फिर से एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली सरकार में मंत्री बन गए।
लेकिन, पिछले रविवार को जब मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अपने मंत्रिपरिषद का विस्तार किया और उसमें 39 नए मंत्री शामिल किए, तो उसमें भुजबल का नाम नहीं होना सबको चौंका गया। इसके लिए उन्होंने सीधे तौर पर अजित पवार को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि सीएम तो उन्हें मंत्री बनाने के लिए तैयार थे।
अजित पवार को भुजबल का विकल्प मिल चुका है?
वैसे राजनीति के धुरंधर शरद पवार ने भुजबल के साथ-साथ कुछ और ओबीसी नेताओं को भी खड़ा किया था, उनमें से धनंजय मुंडे भी शामिल हैं। बाद में वह भी भुजबल की तरह ही अजित पवार के साथ महायुति में चले आए थे और अजित पवार की सिफारिश पर जिस तरह से उन्हें मंत्री बनाया गया है, उससे लगता है कि एनसीपी चीफ अपनी मंशा पहले ही साफ कर चुके हैं।
महायुति के लिए चुनाव में मन से जोर नहीं लगाने का भी संदेह
जहां तक शिवसेना की बात है तो वह तो पहले से ही भुजबल से नाराज थी, क्योंकि कहा जाता है कि उन्होंने नंदगांव सीट पर पार्टी के आधिकारी उम्मीदवार के खिलाफ अपने भतीजे समीर भुजबल को निर्दलीय चुनाव लड़वा दिया। हालांकि, आधिकारिक तौर पर भुजबल उनसे दूरी बनाए हुए थे। इसके अलावा भी उनको लेकर यह चर्चा है कि उन्होंने अपने प्रभाव वाली सीटों पर महायुति के प्रत्याशियों के लिए पूरा जोर नहीं लगाया, बावजूद महायुति की बंपर जीत हुई है।
भुजबल का घट चुका है सियासी प्रभाव!
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एक समय भुजबल उम्मीद कर रहे थे कि वह धीरे-धीरे राज्यसभा में प्रवेश कर लेंगे और बाकी की राजनीति आराम के साथ बिताएंगे। लेकिन, जिस तरह से उन्होंने जल्दबाजी में अजित पवार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और शरद पवार के खेमे के पास अब वह हैसियत नहीं है, ऐसे में उनका एनसीपी छोड़ना कोई बेहतर विकल्प है, ऐसा लग तो नहीं रहा है।












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