BMC Election 2026: अजित पवार हुए Out, शिंदे In, भाजपा-शिवसेना के सीट शेयरिंग फॉर्मूले से घबराया विपक्ष
BMC Election Seat Sharing: मुंबई में होने वाले बृहद मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव के लिए सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन में शामिल भाजपा- शिवसेना सीट बंटवारे पर अपनी सहमति की घोषणा कर दी है। बीएमसी चुनाव के लिए उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और भाजपा ने गठबंधन की योजना बनाई है। यह राजनीतिक निर्णय ठाकरे बंधुओं (उद्धव और राज ठाकरे) के एक साथ आने के बाद लिया गया है, जिसने मुंबई के समीकरण बदल दिए हैं।
खास बात यह है कि इस सीट बंटवारे में उपमुख्यमंत्री अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) को कोई सीट नहीं दी गई है। लंबी बैठकों और गहन मंथन के बाद भाजपा और शिंदे गुट की शिवसेना ने यह फार्मूला तय किया है, जिससे पूरा ध्यान अब इन्हीं दोनों दलों पर केंद्रित है।

सूत्रों के अनुसार, भाजपा ने शुरुआत में सभी 227 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी की थी, ताकि सत्ता पर दोबारा काबिज हो सके। हालांकि, बाद में पार्टी ने अपनी रणनीति बदली और शिंदे की शिवसेना के साथ सीट बंटवारे को लेकर बातचीत करने का फैसला किया।
शिवसेना-भाजपा के बीच क्या तय हुआ सीट शेयरिंग फाॅर्मूला?
एकनाथ शिंदे की शिवसेना और सीएम देवेंद्र फडणवीस के बीच हुए प्रस्तावित समझौते के अनुसार, भाजपा 128 सीटों पर और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना 79 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इस तरह कुल 207 सीटों का बंटवारा तय हो गया है। पब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (ए) को भाजपा के कोटे से सीटें दी जाएंगी।
चुनावी रणनीति हुई तय
राहुल शेवाले ने सीट बंटवारे की पुष्टि करते हुए कहा, "गठबंधन में पूरी सहमति है और महायुति मजबूती के साथ चुनाव लड़ेगी।" वहीं, भाजपा मुंबई अध्यक्ष अमित साटम ने बताया कि बैठक में न सिर्फ सीट बंटवारे, बल्कि प्रचार रणनीति और संयुक्त रैलियों पर भी विस्तृत चर्चा हुई।
क्यों साथ चुनाव लड़ने के लिए भाजपा हुई मजबूर?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "दिल्ली में हमारे नेतृत्व ने कोई जोखिम नहीं लेना चाहा, क्योंकि इस निर्णय से गलत संदेश जा सकता था और मुंबई में 150 से अधिक सीटों पर प्रभाव रखने वाले मराठी मतदाता हमसे दूर हो सकते थे।" उन्होंने कहा, "इसी कारण राज्य भाजपा नेतृत्व को शिवसेना के साथ सीट बंटवारे पर समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ा।"
नेता ने यह भी बताया कि शिवसेना ने पहले बराबर सीटों की मांग की थी। चूंकि शिवसेना अपनी इस मांग पर टस से मस नहीं हुई, इसलिए अंततः उसे 78 सीटों का अंतिम प्रस्ताव दिया गया। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि ठाकरे बंधुओं के गठबंधन और उनके 'मराठी मानुष' के एजेंडे को देखते हुए एकनाथ शिंदे को साथ रखना भाजपा की मजबूरी है।
भाजपा-शिवसेना के गठबंधन से बढ़ी विपक्ष की टेंशन
उन्होंने कहा, "हमें भाजपा के मूल वोट बैंक - गुजरातियों, मारवाड़ियों और उच्च जाति के मराठी - के मजबूत होने का पूरा भरोसा है, लेकिन हमें निम्न जाति के मराठी वोटों की भी आवश्यकता है।" नेता ने उम्मीद जताई, "हमें उम्मीद है कि शिंदे अपने साथ बड़ी संख्या में मराठी मतदाताओं को लाएंगे।" उन्होंने बताया कि शिंदे पहले ही शिवसेना के 80 पूर्व पार्षदों को अपने खेमे में शामिल कर चुके हैं, जिनमें से कई का अपने संबंधित वार्डों में अच्छा खासा प्रभाव है।
क्या अजित को आउट करना कोई सोची-समझी रणनीति है?
सूत्रों के अनुसार महायुति में शामिल तीसरी पार्टी एनसपी के मुखिया उपमुख्यमंत्री अजीत पवार से अलग चुनाव लड़ने को कहा गया है। एक सूत्र ने कहा, "पहले शिवसेना के कड़े रुख के कारण भाजपा, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के साथ गठबंधन बनाए रखना चाहती थी। चूंकि अब शिंदे की शिवसेना साथ आ गई है, इसलिए भाजपा को एनसीपी की अब ज़रूरत नहीं है।" सूत्र ने याद दिलाया कि पहले अजीत पवार को अल्पसंख्यक-केंद्रित क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा गया था, ताकि ये वोट कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की ओर न जा सकें।
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