महाराष्ट्र में BJP की 132 सीटें कैसे? शिंदे, अजित गुट का क्या है रोल, आंकड़ों में जानिए

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के इतिहास में ये पहला मौका है जब बीजेपी को प्रचंड जीत हासिल हुई। इस बड़ी जीत के पीछे कई फैक्टर हैं। असली सच आंकड़ों के विश्लेषण से ही पता चलता, जिसमें दो वर्ष के भीतर महाराष्ट्र के बदले राजनीतिक समीकरणों को का भी अहम रोल है।

बीजेपी को इस बार जिन सीटों पर जीत हासिल हुई है, उनमें से आधी से अधिक सीटें ऐसी हैं, जो बीजेपी की परंपरागत सीट नहीं हैं। यहां तक इन सीटों पर बीजेपी को पिछले चुनावों में जीत हासिल नहीं हुई थी। शिवसेना के बीच टकराव के चलते दो धड़ों बंटी पार्टी और एनसीपी ने पिछले चुनावों में जो सीटें हासिल की थीं, उनमें से 75 सीटें बीजेपी को इस बार हासिल हुई हैं।

Shinde and Ajit roll in BJP Seats

बीजेपी ने महाराष्ट्र में इस बार 89.2 प्रतिशत की स्ट्राइक रेट के साथ 149 में से 132 सीटें जीतीं और महाराष्ट्र चुनाव में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। मौजूदा स्थिति शिवसेना और राकांपा विभाजन के चलते हुई है।

ऐसे में महाविकास अघाड़ी गठबंधन कमजोर नजर आया। हालांकि लोकसभा चुनाव में एमवीए मजबूत स्थिति में रहा। बीजेपी के अपने अकेले प्रदर्शन को छोड़ दें, तो पार्टी 145 के बहुमत के आंकड़े को पार करने के लिए अभी भी शिंदे सेना और अजीत पवार की सीटों की आवश्यकता होगी। कुल मिलाकर, शिंदे सेना और अजित पवार 98 सीटें हासिल करने की बढ़ रहे हैं।

भाजपा ने इस बार सभी एनडीए सहयोगियों के बीच सबसे अच्छा स्ट्राइक रेट हासिल किया है। ऐसे में पार्टी मुख्यमंत्री पद के लिए जोर लगा सकती है, जिसमें वरिष्ठ नेता देवेन्द्र फड़णवीस उसकी स्पष्ट पसंद होंगे। लेकिन शिंदे सेना अपनी एड़ी-चोटी का जोर लगा सकती है और तर्क दे सकती है कि महायुति एकनाथ शिंदे को सरकार का चेहरा बनाकर चुनाव में उतरी थी और राज्य सरकार की नीतियों और वादों ने इस चुनाव में भारी जनादेश के पीछे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा बदलाव उस वक्त देखा गया था शिंदे के नेतृत्व वाले गुट ने शिवसेना ने बगावत कर एमवीए की सरकार गिरा दी और बीजेपी, अजित पवार के साथ मिलकर नई सरकार का गठन किया।

क्या 2019 की स्थिति दोहराएगी बीजेपी

2019 के राज्य चुनावों में, भाजपा ने 105 सीटें और अविभाजित शिवसेना ने 56 सीटें जीती थीं। नतीजों के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर मतभेद पैदा हो गए। जबकि उद्धव ठाकरे ने बारी-बारी से मुख्यमंत्री पद पर सहमति का दावा किया, भाजपा ने ऐसे किसी भी समझौते से इनकार किया। आख़िरकार, सेना ने गठबंधन तोड़ दिया और भाजपा के इतिहास में सबसे स्थायी गठबंधनों में से एक को खत्म कर दिया। हालांकि इस बार ऐसी स्थिति महाराष्ट्र में नहीं दिख रही है। यहां गठबंधन ही सही लेकिन एक मजबूत सरकार बनने जा रही है। ऐसे में सवाल है कि क्या शिंदे सीएम पद छोड़कर गठबंधन के निर्णय पर निर्भर होगें और अगर ऐसी स्थिति नहीं होती है तो गठबंधन में दरार का खतरा है।

बीजेपी को सिर्फ एक पार्टी से गठबंधन की जरूरत
2019 की तुलना में एक बड़ा अंतर है। अजीत पवार की राकांपा के अच्छे प्रदर्शन के साथ, भाजपा को जादुई आंकड़े तक पहुंचने के लिए अपने दो सहयोगियों में से केवल एक की जरूरत है।

रुझानों में एनडीए को स्पष्ट बढ़त मिलने पर मीडिया से बात करते हुए शिंदे ने मुख्यमंत्री के सवाल का सावधानीपूर्वक जवाब दिया। उन्होंने कहा, "हम बैठेंगे और फैसला करेंगे, मोदजी हमारे वरिष्ठ हैं।"

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