टाइगर्स पर टेरिटरी का संकट, जंगलों से बाहर निकल रहे, 4 साल में 248 की गई जान
टाइगर स्टेट मप्र में बाघ बढ़ रहे हैं और जंगल कम हो रहे हैं। प्रदेश में हर साल औसतन 60 लोगों की जान बाघों के हमले में जा रही है। सरकार बाघों और आदिवासियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। फसल नुकसान का मुआवजा बढ़ाया गया है।

मप्र के टाइगर रिजर्व में करीब 700 के आसपास बाघ मौजूद हैं। पन्ना, पेंच, बांधवगढ़, कान्हा-किसली, सतपुड़ा सहित अन्य टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या जिस तेजी से बढ़ी जंगल उसी तेजी से कम हो गए। इधर टाइगर रिजर्व का एरिया जस का तस रहा और बाघ कई गुना बढ़ गए, जिस कारण इनमें आपस में ही टेरिटरी का संकट गहराने लगा और आपसी संघर्ष शुरू हो गया है। बीते दिनों पन्ना में टाइगर टी-7 की मौत भी दो बाघों की लड़ाई में चली गई।

टाइगर रिजर्व, नेशनल पार्क के बाहर घूम रहे टाइगर
जानकारी अनुसार मप्र के टाइगर रिजर्व और नेशनल पार्कों के बाहर खुले जंगलों में भी बाघों की अच्छी-खासी संख्या है। इसके लिएप्रबंधन के लिए सरकार कोई ठोस नीति बनाने पर विचार कर रही है। बाघ या तेंदुए के हमले से प्रदेश में हर साल औसतन 60 लोगों की मौत होती है। पिछले 4 सालों में टाइगर के हमले में 248 लोगों की मौत रिकॉर्ड में दर्ज है। इसके अलावा टाइगर के हमले में 4792 लोग घायल हुए हैं। इनमें 80 फीसदी आदिवासी ग्रामीण हैं।
सरकार किसानों और ग्रामीणों का भरोसा बढ़ाने में जुटी है
टाइगर्स की मौत के दो सबसे बड़े कारण जांच में निकलकर आए हैंं। पहला तो जंगल में क्षेत्राधिकार अर्थात (टेरिटरी) का को नर बाघों में आपसी लड़ाई जानलेवा साबित होती है। कभी-कभी तो दोनों बाघों की घायल होने के बाद जान चली जाती है। दूसरा सबसे बड़ा कारण रिजर्व एरिया से सटे गांवों, बफर जोन के गांवों में फसल को जानवरों से नुकसान से बचाने किसान खेतों के चारों तरफ तार लगाकर उसमें करंट छोड़ देते हैं। अन्य जानवरों के साथ ही टाइगर भी इस करंट की चपेट में आकर जान गवां देते हैं। सरकार किसानों-आदिवासियों के अंसतोष को कम करने, फसल मुआवजा देने और टाइगर की सुरक्षा के लिए प्रयास में जुटी है। फसल मुआवजा के नियम भी बदले जा रहे हैं।












Click it and Unblock the Notifications