MP News: सीमांकन की गुहार लेकर पहुंचा किसान, आवाज ऊंची की तो 70 साल के बुजुर्ग को थाने में बैठा दिया
MP News: जिले के अड़मालिया गांव के एक 70 वर्षीय बुजुर्ग किसान जगदीश दास बैरागी मंगलवार को अपनी भूमि के सीमांकन और बटवारे की गुहार लेकर जनसुनवाई में पहुंचे।
10 किलोमीटर पैदल और फिर 8 किलोमीटर बस का सफर तय कर आए बुजुर्ग किसान को जनसुनवाई में उम्मीद थी कि उनकी वर्षों पुरानी समस्या का हल मिलेगा, लेकिन उनकी व्यथा और भी गहरी हो गई जब पुलिस उन्हें थाने ले गई और 6 घंटे तक बिना भोजन-पानी के बैठाए रखा।

किसान की गुहार, पुलिस की सख्ती
कलेक्टर कार्यालय में जनसुनवाई के दौरान बुजुर्ग किसान ने एसडीएम संजीव साहू के सामने अपनी बात रखते हुए कहा कि उनकी जमीन का बटवारा और सीमांकन लंबे समय से लंबित है। इस दौरान उनकी आवाज थोड़ी ऊंची हो गई, जिस पर कलेक्टर परिसर में तैनात कैंट थाने के दो पुलिसकर्मी करीब 1 बजे उन्हें जबरदस्ती बाइक पर बैठाकर कैंट थाने ले गए। किसान के बेटे किशोरदास के मुताबिक, उनके पिता को शाम 6 बजे तक बिना किसी स्पष्ट कारण के थाने में बैठाए रखा गया और बाद में छोड़ दिया गया। थाने से रिहा होने के बाद उनके बेटे ने उन्हें बस स्टैंड से घर भेजा।
प्रशासन ने दी सफाई
इस घटना को लेकर जब एसडीएम संजीव साहू से बात की गई तो उन्होंने कहा, "बुजुर्ग किसान का बटांकन का मामला तहसीलदार के यहां लंबित था, जिस पर नियमानुसार कार्रवाई की जा चुकी है। मौका मुआयना रिपोर्ट के आधार पर सीमांकन कर दिया गया है। यदि किसान इससे असंतुष्ट हैं तो वे अपील करने के लिए स्वतंत्र हैं।"
एसडीएम ने आगे कहा कि बुजुर्ग किसान का स्वभाव कुछ उग्र है और वह पूरी बात सुनने से पहले ही नाराज हो जाते हैं। हालांकि, उन्होंने माना कि किसान की समस्या गंभीर है और भविष्य में इस मामले पर उचित मार्गदर्शन दिया जाएगा।
सवालों में पुलिस की भूमिका
इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है। किसान संगठनों और स्थानीय लोगों का कहना है कि एक बुजुर्ग किसान को बिना किसी बड़ी चूक के 6 घंटे थाने में बैठाए रखना अमानवीय व्यवहार है। किसान नेताओं का कहना है कि किसानों की आवाज उठाना अगर अपराध हो गया है, तो प्रशासन और पुलिस दोनों को अपनी भूमिका पर मंथन करना चाहिए।
प्रशासनिक प्रक्रियाओं से थक चुके किसान
बुजुर्ग किसान जगदीश दास बैरागी ने बताया कि वे कई बार तहसील और कलेक्टर कार्यालय के चक्कर काट चुके हैं, लेकिन अब तक समाधान नहीं मिला। वे चाहते हैं कि सीमांकन निष्पक्ष तरीके से हो, जिससे परिवार में विवाद खत्म हो और वे चैन से अपने खेत में काम कर सकें।
क्या बदलेगी प्रशासनिक कार्यशैली?
यह घटना एक बार फिर सवाल खड़े करती है कि क्या प्रशासनिक व्यवस्था आम किसानों की समस्याओं को संवेदनशीलता से सुलझा पा रही है? छोटे किसानों को न्याय दिलाने में यदि सिस्टम में देरी और गैर-पारदर्शिता बनी रहेगी, तो ऐसे मामले बार-बार सामने आते रहेंगे।
जनता का सवाल - बुजुर्गों के साथ ऐसा क्यों?
स्थानीय लोगों और किसान संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि बुजुर्ग किसान के साथ हुए इस व्यवहार की जांच हो और दोषियों पर कार्रवाई की जाए। साथ ही किसानों की समस्याओं का समाधान समय रहते किया जाए ताकि भविष्य में कोई बुजुर्ग इंसाफ की गुहार में इस तरह थाने में बैठा न रहे।












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