नवरात्र 2022: मां दुर्गा के सामने नाचते हैं दर्जनों ‘शेर', मनौती पूरी करने करते हैं नृत्य
सागर, 4 अक्टूबर। नवरात्र को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में पूजा, पाठ, माता की आराधना व मातारानी को प्रसन्न करने के लिए अलग-अलग विधि-विधान व परंपराए हैं। मप्र, छत्तसीगढ से लेकर महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में आज भीं शेर नृत्य की सदियों पुरानी परंपरा चली आ रही है। इसमें दुर्गा पंडालों में माता के सामने बच्चे और युवा शेर बनकर नृत्य करके मातारानी को प्रसन्न करने के जतन करते नजर आते है। माना जाता है मातारानी शेर की सवारी करती हैं, इसलिए शेर नृत्य से माता को जल्दी प्रसन्न किया जा सकता हैं। बुंदेलखंड के लगभग सभी जिलों में शारदीय नवरात्र की अष्टमी व नवमी को शेर नृत्य किया जाता है।
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मां शेरावाली की मनौती पूरी करने बच्चों को शेर बनाकर नचाते हैं
बुंदेलखंड में एक मान्यता है कि जिन दंपति के यहां किन्ही कारणों से बच्चे नहीं होते हैं, वे नवरात्र में जगत जननी के दरबार में जाकर अर्जी लगाते हैं। कई जगह महिलाओं की गोद भी भरी जाती है। मनौती के दौरान इनसे वचन लिया जाता है कि यदि लड़का होगा तो वे उसे माता की मन्नत पूरी करने लिए नवरात्र में शेर के जैसे दरबार में नृत्य करवाएंगे। इसी मन्नत और वचन को पूरा करने के लिए नवरात्र की अष्टमी और नवमी तिथि को पूजन के बाद माता के दरबार में बच्चे और युवा शेर की वेषभूषा में ढोलक व स्थानीय वाद्ययंत्रों की थाप पर नृत्य करते हैं।

अखाड़े और सांस्कृतिक संस्थान भी नृत्य कराते हैं
सागर, दमोह, छतरपुर सहित बुंदेलखंड क्षेत्र में अखाड़ों की परम्परा काफी पुरानी है। इसके अलावा पुराने लोक कलाकारों द्वारा यहां सांस्कृतिक नृत्यों के प्रशिक्षण के लिए संस्थान संचालित हो रहे हैं। इनके माध्यम से भी नवरात्र में बच्चों को शेर नृत्य का आयोजन कराया जाता है। सबसे अहम बात यह कि बच्चों को बाकायदा शरीर पर शेर की चमड़ी की तरह रंग किया जाता है। धारिया और डिजाइन बनाई जाती है। कमर में पीछे पूछ लगाई जाती है, चेहरे पर या तो रंग से शेर का चेहरा डिजाइन किया जाता है या फिर शेर का मुखौटा उपयोग किया जाता है। समूह में शेर बने ये बच्चे शहर के अलग-अलग इलाकों व दुर्गा पंडालों में जाकर शेर नृत्य करते हैं।

शेर नृत्य और नौरता को सागर में किया जा रहा संरिक्षत
लोक कला और सांस्कृतिक नृत्य को संरक्षित करने, नई पीड़ी को इससे जोड़ने के लिए सागर में डॉ. जुगल नामदेव प्रयासरत हैं। वे नवोदित लोककला संस्थान सागर के माध्यम से बच्चों को इन नृत्यों का प्रशिक्षण देते हैं और उन्हें जिला, राज्य और राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मंच उपलबध कराने का प्रयास भी करते हैं। डॉ. जुगल नामदेव बताते हैं कि बीच के कुछ दशकों में शेर नृत्य और नौरता नृत्य को लोग भूल गए थे। संपन्न घरों के लोग नवरात्र से जुड़ी इन परम्पराओं और लोग कलाओं से दूर होते जा रहे हैं। वे अपने संस्थान के माध्यम से बच्चों को शेर नृत्य, नौरता नृत्य व वाद्य यंत्रों का प्रशिक्षण देते हैं। नौरता माता की उपासना और उन्हें प्रसन्न करने के लिए युवतियां व महिलाएं करती हैं तो शेर नृत्य माता की मनौती पूरी करने व माता की कृपा प्राप्ति के लिए किया जाता है।

पहले जंगलों में जाकर नृत्य करते थे, अब शहरों में ही बची परंपरा
दमोह जिले में शेर नृत्य कला को संरक्षित करने के लिए जागृति मंच के माध्यम से प्रयास किए जा रहे हैं। उस्ताद रघुनंदन बताते हैं कि उनके परिवार में बीते चार पीड़ियों से शेर नृत्य को संरक्षित करने पर काम किया जा रहा है। वे नए बच्चों को भी इससे जोड़ने का प्रयास करते रहते हैं। पहले आबादी से दूर जंगल में जाकर शेर नृत्य का आयोजन होता था, जहां प्राकृति के बीच माता की आराधना होती थी। अब जंगल बचे नहीं, इसलिए शहरों में ही दुर्गा पंडालों में यह नृत्य किया जाता है। कई परिवारों की रोजी-रोटी भी शेर नृत्य से जुड़ी हुई है। मूलतः शेर नृत्य माता भवानी को प्रसन्न करने के लिए मनुहार के रुप में किया जाता है।

चाइना और थाईलैंड में भी होता है शेर नृत्य
देश के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के पर्वो पर शेर नृत्य का प्रचलन है। इसमें बुंदेलखंड, महाकौशल, मालवा इलाकों में नौरात्र में शेर नृत्य पारंपरिक रुप से किया जाता है। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ व महाराष्ट्र में भी शेर नृत्य एक समुदाय व जाति विशेष के लोग करते हैं। देश के कई अन्य हिस्सों में नवरात्र से इतर बाघ और लायन की वेषभूषा में परंपरा के साथ यह नृत्य अलग स्वरुप में किया जाता है। केवल भारत ही नहीं बल्कि चाइना और थाईलैंड सहित अन्य देशों में शेर नृत्य को परम्परा अनुसार किया जाता है। इसमें दो-दो युवक शेर की पोशाक पहनकर नृत्य करते हैं। चाइनीज न्यू ईयर के मौके पर चाइना में यह फेमस नृत्य किया जाता है।
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