MP News: पचमढ़ी की नई उड़ान, अभयारण्य से 395.93 हेक्टेयर जमीन मुक्त, मोहन यादव कैबिनेट का बड़ा फैसला
MP News cabinet: मध्य प्रदेश की "क्वीन ऑफ सतपुड़ा" कहलाने वाली पचमढ़ी को अब नई आजादी मिलने वाली है! मंगलवार, 6 मई 2025 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की कैबिनेट ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया, जिसके तहत पचमढ़ी अभयारण्य की 395.93 हेक्टेयर जमीन को वन क्षेत्र से हटाकर नजूल (रेवेन्यू) भूमि घोषित कर दिया गया।
इस फैसले ने न केवल पचमढ़ी के विकास के दरवाजे खोल दिए, बल्कि जमीन की खरीद-बिक्री और व्यावसायिक गतिविधियों का रास्ता भी साफ कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के बाद लिया गया यह कदम पचमढ़ी को पर्यटन और विकास के नए दौर में ले जाने का वादा करता है। आइए, इस रोमांचक खबर के हर पहलू को खंगालते हैं और जानते हैं कि पचमढ़ी की यह "आजादी" कितनी खास है!

पचमढ़ी का अभयारण्य, 47 साल पुरानी कहानी
पचमढ़ी, जो अपनी हरी-भरी वादियों, झरनों, और प्राकृतिक सुंदरता के लिए देश-दुनिया में मशहूर है, 1 जून 1977 को वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 18(1) के तहत अभयारण्य घोषित किया गया था। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व का हिस्सा रहे इस अभयारण्य में बाघ, तेंदुआ, भालू, और कई दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। लेकिन इस अधिसूचना के समय एक बड़ी चूक हो गई थी-अभयारण्य की सीमाओं को ठीक से सीमांकित नहीं किया गया। नतीजा? अभयारण्य में शामिल कुछ क्षेत्रों में न तो सरकार विकास कार्य कर पा रही थी, न ही स्थानीय लोग जमीन का उपयोग कर पा रहे थे।
पचमढ़ी के स्थानीय निवासी रमेश साहू ने बताया, "हमारी जमीन अभयारण्य का हिस्सा थी, लेकिन हम उसका मालिकाना हक नहीं ले पा रहे थे। न बेच सकते थे, न उस पर कुछ बना सकते थे। यह हमारे लिए बंधन जैसा था।" अभयारण्य की सख्त पाबंदियों के कारण पर्यटन और व्यावसायिक गतिविधियां भी सीमित थीं, जिससे पचमढ़ी का विकास रुका हुआ था।
MP News cabinet: सुप्रीम कोर्ट का फैसला, पचमढ़ी को मिली राहत
यह मामला सालों तक लटका रहा, लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर फैसला सुनाया। कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह अभयारण्य की सीमाओं को स्पष्ट करे और उन क्षेत्रों को बाहर करे, जो व्यावसायिक या आवासीय उपयोग के लिए जरूरी हैं। कोर्ट के इस फैसले ने पचमढ़ी के लिए नई संभावनाएं खोल दीं।
मोहन यादव सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए मंगलवार को कैबिनेट बैठक में 395.93 हेक्टेयर जमीन को अभयारण्य से बाहर करने का प्रस्ताव पारित किया। यह जमीन अब नजूल (रेवेन्यू) भूमि के तौर पर दर्ज होगी और पचमढ़ी भूमि विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (Pachmarhi Special Area Development Authority) के स्वामित्व में आएगी। इस फैसले के बाद पचमढ़ी अभयारण्य का नया नोटिफिकेशन जारी होगा, जिसमें सीमाएं स्पष्ट की जाएंगी।
क्या बदलेगा पचमढ़ी में? विकास का नया दौर
- इस फैसले ने पचमढ़ी के लिए विकास की नई राह खोल दी है। अब इस 395.93 हेक्टेयर जमीन पर निम्नलिखित गतिविधियां संभव होंगी:
- जमीन की खरीद-बिक्री: स्थानीय लोग और निवेशक अब इस जमीन को खरीद-बेच सकेंगे, जिससे रियल एस्टेट को बढ़ावा मिलेगा।
- पर्यटन का विस्तार: होटल, रिसॉर्ट, और पर्यटक सुविधाओं के लिए जमीन का उपयोग हो सकेगा, जिससे पचमढ़ी की पर्यटन क्षमता बढ़ेगी।
- आवासीय और व्यावसायिक विकास: नए रिहायशी इलाके, दुकानें, और छोटे उद्योग स्थापित किए जा सकेंगे।
- बुनियादी ढांचा: सड़क, बिजली, और पानी की आपूर्ति जैसे विकास कार्यों में तेजी आएगी।
पर्यटन विशेषज्ञ अनिल वर्मा ने कहा, "पचमढ़ी पहले से ही हिल स्टेशन के रूप में मशहूर है, लेकिन अभयारण्य की पाबंदियों ने इसके विकास को बांध रखा था। अब यह फैसला पचमढ़ी को शिमला और मसूरी जैसा पर्यटक गंतव्य बनाने का रास्ता खोलेगा।"
MP News cabinet: स्थानीय लोगों का उत्साह: "अब हमारी जमीन हमारी होगी!"
पचमढ़ी के स्थानीय निवासियों में इस फैसले को लेकर जबरदस्त उत्साह है। कई परिवारों की जमीनें सालों से अभयारण्य के दायरे में होने के कारण बेकार पड़ी थीं। एक स्थानीय निवासी श्यामलाल पटेल ने कहा, "हमारी जमीन थी, लेकिन हम उसका कुछ कर नहीं पा रहे थे। अब हम उसे बेच सकते हैं या उस पर घर बना सकते हैं। यह हमारे लिए आजादी जैसा है!"
हालांकि, कुछ पर्यावरणविदों ने इस फैसले पर चिंता जताई है। सतपुड़ा वन्यजीव संरक्षण समिति के सचिव राजेश गुप्ता ने कहा, "जमीन को अभयारण्य से बाहर करना ठीक है, लेकिन यह सुनिश्चित करना होगा कि इससे जंगल और वन्यजीवों को नुकसान न हो। विकास और संरक्षण में संतुलन जरूरी है।" सरकार ने आश्वासन दिया है कि अभयारण्य की नई सीमाएं तय करते समय पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी जाएगी।
मोहन यादव का मास्टरस्ट्रोक: सियासी और आर्थिक फायदा
यह फैसला मोहन यादव सरकार के लिए सियासी और आर्थिक दोनों मोर्चों पर मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है। पचमढ़ी होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) जिले का हिस्सा है, जो मध्य प्रदेश की सियासत में अहम भूमिका निभाता है। स्थानीय लोगों की सालों पुरानी मांग पूरी होने से सरकार की लोकप्रियता बढ़ेगी। साथ ही, पर्यटन और रियल एस्टेट के जरिए क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा, जिससे आर्थिक गतिविधियां तेज होंगी।
कैबिनेट बैठक में वन मंत्री रामकिशोर कांवरे ने कहा, "यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप है। हमने सुनिश्चित किया है कि इससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होगा। पचमढ़ी का विकास अब नई रफ्तार पकड़ेगा।" मुख्यमंत्री मोहन यादव ने X पर पोस्ट किया, "पचमढ़ी को नई पहचान देने का समय आ गया है। अभयारण्य से 395.93 हेक्टेयर जमीन को मुक्त कर हम विकास और पर्यटन को बढ़ावा देंगे।"
पचमढ़ी का पर्यटन: नया स्वर्ण युग?
पचमढ़ी पहले से ही धौलपुर चोटी, बी फॉल, पांडव गुफाएं, और जटाशंकर मंदिर जैसे पर्यटक स्थलों के लिए मशहूर है। लेकिन अभयारण्य की पाबंदियों के कारण नए होटल, रिसॉर्ट, या साहसिक गतिविधियों (जैसे ट्रैकिंग, रॉक क्लाइंबिंग) को शुरू करना मुश्किल था। अब इस फैसले के बाद पर्यटन उद्योग में उछाल की उम्मीद है।
स्थानीय टूर ऑपरेटर संजय मिश्रा ने कहा, "पचमढ़ी में पर्यटकों की संख्या हर साल बढ़ रही है, लेकिन सुविधाओं की कमी थी। अब नए रिसॉर्ट और रेस्तरां खुल सकेंगे। यह पचमढ़ी को मध्य प्रदेश का 'मिनी शिमला' बना सकता है।" पर्यटन विभाग ने भी पचमढ़ी में इको-फ्रेंडली टूरिज्म को बढ़ावा देने की योजना बनाई है, जिसमें सतपुड़ा की प्राकृतिक सुंदरता को संरक्षित रखते हुए विकास पर जोर होगा।
पचमढ़ी का इतिहास: प्रकृति और संस्कृति का संगम
पचमढ़ी का नाम पांच गुफाओं (पच मढ़ी) से आया है, जो पांडवों से जुड़ी मानी जाती हैं। ब्रिटिश काल में यह हिल स्टेशन गर्मियों की राजधानी रहा था। 1999 में इसे सतपुड़ा टाइगर रिजर्व का हिस्सा बनाया गया, और 2009 में यूनेस्को ने इसे बायोस्फीयर रिजर्व घोषित किया। लेकिन अभयारण्य की सख्ती ने स्थानीय लोगों और पर्यटन को बांधे रखा था। अब इस फैसले ने पचमढ़ी को प्रकृति और विकास के बीच संतुलन का मौका दिया है।
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