MP News: मातृ-शिशु मृत्यु दर का संकट, SRS रिपोर्ट में फिर सबसे खराब, जीतू पटवारी ने CM यादव पर साधा निशाना

मध्य प्रदेश एक बार फिर मातृ और शिशु मृत्यु दर (MMR और IMR) के मामले में देश के सबसे खराब प्रदर्शन वाले राज्यों में शुमार हो गया है। हाल ही में 27 जून 2025 को जारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की ताजा रिपोर्ट ने इस गंभीर स्थिति को उजागर किया है।

इस रिपोर्ट के आधार पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मध्य प्रदेश सरकार और स्वास्थ्य विभाग के कामकाज पर तीखे सवाल उठाए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव को एक पत्र लिखकर स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और सरकारी नीतियों की नाकामी पर जोरदार हमला बोला है।

Maternal-infant mortality crisis worst again in SRS report Jeetu Patwari targets CM Yadav

SRS रिपोर्ट का खुलासा: मध्यप्रदेश में हालात चिंताजनक

सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में शिशु मृत्यु दर (IMR) 40 प्रति 1000 जीवित जन्म है, जो राष्ट्रीय औसत 26 से 60% अधिक है। इसका मतलब है कि हर 1000 नवजात शिशुओं में से 40 बच्चे अपना पहला जन्मदिन नहीं मना पाते। ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर 43 है, जबकि शहरी क्षेत्रों में 28, जो ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी को उजागर करता है। मातृ मृत्यु दर (MMR) भी चिंताजनक है, जहां हर एक लाख जीवित जन्मों पर 159 माताओं की मौत हो रही है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि मध्यप्रदेश में मातृ मृत्यु का लगभग 60% हिस्सा शहरी क्षेत्रों के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में और 20% जिला अस्पतालों में हो रहा है। यह स्थिति शहरी स्वास्थ्य सुविधाओं में भी व्यवस्थागत खामियों और धन के अप्रभावी उपयोग को दर्शाती है। मध्यप्रदेश की तुलना में मणिपुर जैसे राज्य में IMR केवल 3 है, जो प्रदेश की स्थिति को और भी गंभीर बनाता है।

जीतू पटवारी का तीखा हमला

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इस रिपोर्ट को आधार बनाकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को एक खुला पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने सरकार की स्वास्थ्य नीतियों और कथित "विकास" के दावों पर सवाल उठाए हैं। पत्र में पटवारी ने लिखा, "SRS की ताजा रिपोर्ट ने यह खुलासा किया है कि हमारे प्रदेश में हर 1000 में से 40 बच्चे अपना पहला जन्मदिन भी नहीं मना पाते। यह आंकड़ा न केवल शर्मनाक है, बल्कि यह सरकार की नाकामी का जीता-जागता सबूत है।"

पटवारी ने स्वास्थ्य बजट पर सवाल उठाते हुए कहा, "आपकी सरकार जिस 'कागजी विकास' की गंगा बहा रही है, वह कितनी गहरी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हम हर महीने कर्ज लेकर इस 'विकास-रथ' को आगे बढ़ा रहे हैं। प्रदेश का सालाना स्वास्थ्य बजट ₹4500 करोड़ है, लेकिन यह पैसा जाता कहां है? क्या यह कुपोषण के उन 'घोटालों' में समा जाता है, जिनकी रिपोर्ट CAG हर साल देता है?" उन्होंने सरकार पर "कर्ज, करप्शन और कमीशन के ट्रिपल-इंजन" के जरिए आर्थिक अराजकता फैलाने का आरोप लगाया।

सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

इस रिपोर्ट ने मध्यप्रदेश में सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। कांग्रेस नेताओं और सामाजिक संगठनों ने इसे सरकार की नाकामी का प्रतीक बताया है। @MahilaCongress ने अपने एक्स पोस्ट में लिखा, "मध्यप्रदेश में डबल इंजन की सरकार है और बीते 5 वर्षों में मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाओं पर 10,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन यह राज्य आज भी शिशु मृत्यु दर (IMR) में देश में पहले नंबर पर है। मध्य प्रदेश, अफ्रीका के सब-सहारा क्षेत्र जैसे पिछड़े इलाकों जैसा हो गया है।"

रोशनी यादव ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, "5 साल में 10 हजार करोड़ खर्च... फिर भी मध्यप्रदेश शिशु मृत्यु दर में देश में नंबर 1! 120 ही अस्पतालों में सीजेरियन की सुविधा है और शिशु रोग विशेषज्ञों के 70% पद खाली हैं।"

मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने इस मुद्दे पर चिंता जताई है और स्वास्थ्य अधिकारियों को स्थिति सुधारने के लिए तत्काल कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला ने हाल ही में एक कार्यक्रम में स्वीकार किया कि इन संकेतकों में मामूली सुधार हुआ है, लेकिन अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

मातृ-शिशु मृत्यु के कारण और चुनौतियां

SRS रिपोर्ट और अन्य अध्ययनों के अनुसार, मध्यप्रदेश में मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव (47%), गर्भावस्था से संबंधित संक्रमण (12%), और उच्च रक्तचाप संबंधी विकार (7%) शामिल हैं। शिशु मृत्यु के प्रमुख कारणों में समयपूर्व जन्म और कम वजन (36.1%), निमोनिया (17.4%), जन्म के समय श्वासावरोध (11.5%), और जन्मजात असामान्यताएं (5.7%) शामिल हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, शिशु रोग विशेषज्ञों की भारी कमी, और सीजेरियन जैसी आपातकालीन सुविधाओं का केवल 120 अस्पतालों में उपलब्ध होना इस संकट को और गहरा रहा है। इसके अलावा, सरकारी मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों में संसाधनों का अप्रभावी उपयोग और भ्रष्टाचार की शिकायतें भी सामने आ रही हैं।

सरकार के सामने चुनौती

मध्यप्रदेश की स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने, शिशु रोग विशेषज्ञों की भर्ती करने, और मातृ-शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों के प्रभावी कार्यान्वयन पर ध्यान देना होगा। जन स्वास्थ्य अभियान (JSAI) के राष्ट्रीय संयोजक अमूल्य निधि ने कहा, "MP का IMR राष्ट्रीय औसत से 60% अधिक है। शहरी क्षेत्रों में भी 60-70% मातृ मृत्यु सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हो रही है, जो धन के दुरुपयोग और स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है।"

आगे क्या?

यह रिपोर्ट मध्यप्रदेश के लिए एक चेतावनी है कि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के बिना न तो शिशु मृत्यु दर और न ही मातृ मृत्यु दर को नियंत्रित किया जा सकता है। सरकार को न केवल बजट का सही उपयोग सुनिश्चित करना होगा, बल्कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के लिए दीर्घकालिक नीतियां बनानी होंगी।

जीतू पटवारी ने अपने पत्र में यह भी मांग की है कि सरकार इस मामले में एक श्वेत पत्र जारी करे, जिसमें पिछले पांच वर्षों में स्वास्थ्य बजट के उपयोग और कुपोषण से निपटने की योजनाओं का ब्योरा हो। इस बीच, सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा छाया हुआ है, जहां लोग सरकार से जवाबदेही और ठोस कदमों की मांग कर रहे हैं।

मध्यप्रदेश के लिए यह समय है कि वह अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त करे, ताकि माताओं और बच्चों की जान बचाई जा सके और प्रदेश देश के अन्य राज्यों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सके।

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