मंदसौर में सच्ची दोस्ती की अनूठी मिसाल, सोहनलाल की अंतिम इच्छा पूरी करने अंबालाल ने शव यात्रा में किया नृत्य
MP News: मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के जवासिया गांव में 30 जुलाई 2025 को एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने सच्ची दोस्ती की परिभाषा को नया आयाम दिया। 71 वर्षीय सोहनलाल जैन की अंतिम यात्रा में उनके जिगरी दोस्त अंबालाल प्रजापत ने नम आंखों के साथ ढोल-नगाड़ों पर नृत्य कर उन्हें विदाई दी।
यह नजारा केवल एक वादे का निर्वहन नहीं था, बल्कि कृष्ण-सुदामा जैसी गहरी मित्रता का प्रतीक था, जिसने पूरे गांव की आंखें नम और दिलों को मुस्कुराहट से भर दिया। जनाजे में नाचे दोस्त, निभाई आखिरी ख्वाहिश। मंदसौर के जवासिया गांव में अंबालाल प्रजापत ने अपने कैंसर से जूझते दोस्त सोहनलाल जैन की तीन साल पुरानी आखिरी ख्वाहिश पूरी की।

चाय की दुकान से शुरू हुई दोस्ती
सोहनलाल जैन और अंबालाल प्रजापत की दोस्ती की शुरुआत करीब 20 साल पहले जवासिया गांव में हुई। सोहनलाल, जो मूल रूप से सीहोर गांव के थे, जवासिया में दुकान खोलने आए थे। अंबालाल ने बताया कि उनकी मुलाकात तब हुई जब वह सोहनलाल को रोज घर की चाय पिलाने लगे। चाय की दुकान पर शुरू हुई दोस्ती धीरे-धीरे इतनी गहरी हो गई कि दोनों दिन में 2-3 बार मिलते और सत्संग में साथ शामिल होते।
दोनों की मित्रता सत्संग और प्रभात फेरी से और मजबूत हुई। सोहनलाल, जो उम्र में बड़े थे, अंबालाल के लिए मित्र से बढ़कर गुरु बन गए। सोहनलाल ने 32 साल पहले गांव में प्रभात फेरी और रामधुन की शुरुआत की थी, जिसमें अंबालाल और शंकरलाल पाटीदार उनके शुरुआती साथी रहे। पिछले 10 साल से दोनों रोज सुबह 5 बजे प्रभात फेरी में शामिल होते थे, जिसने उनके रिश्ते को आध्यात्मिक गहराई दी।
सोहनलाल की अंतिम इच्छा: पत्र में लिखा वादा
सोहनलाल जैन दो साल पहले कैंसर की चपेट में आए थे। उन्होंने रतलाम, मंदसौर, और अहमदाबाद में इलाज करवाया, लेकिन जिंदगी की जंग हार गए। 9 जनवरी 2021 को सोहनलाल ने अपने दोस्तों अंबालाल प्रजापत और शंकरलाल पाटीदार के नाम एक भावुक पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने लिखा, "अंबालाल प्रजापत और शंकरलाल पाटीदार को मेरा अंतिम राम-राम। जब मैं इस दुनिया में न रहूं, तो मेरी अंतिम यात्रा में कोई रोना-धोना नहीं करना। ढोल-नगाड़ों और नृत्य के साथ मुझे खुशी-खुशी विदा करना। मुझसे कोई गलती हुई हो, तो क्षमा करना।"
सोहनलाल का मानना था कि मृत्यु से डरने की जरूरत नहीं, क्योंकि यह जीवन का हिस्सा है। उन्होंने अपनी अंतिम यात्रा को उत्सव की तरह मनाने की इच्छा जताई। यह पत्र सोहनलाल की मृत्यु के बाद उनके संदूक से मिला, जब परिजनों ने उनकी अलमारी की जांच की।
अंतिम यात्रा में नृत्य: अंबालाल का वादा
29 जुलाई 2025 की रात को कैंसर से जूझ रहे सोहनलाल का निधन हो गया। परिजनों को उनके संदूक से पत्र मिला, जिसे पढ़कर अंबालाल और शंकरलाल भावुक हो गए। 30 जुलाई को सोहनलाल की अंतिम यात्रा में अंबालाल ने बैंड-बाजे और डीजे की धुन पर नृत्य किया। शंकरलाल किसी कारणवश शामिल नहीं हो सके, लेकिन अंबालाल ने अकेले ही दोस्ती का फर्ज निभाया।
गांववासियों ने शुरू में अंबालाल को नृत्य करने से रोका, क्योंकि शव यात्रा में नृत्य की परंपरा नहीं थी। अंबालाल ने कहा, 'यह मेरे दोस्त की अंतिम इच्छा थी। मन में पीड़ा बहुत है, लेकिन मैं उसे शब्दों में नहीं बता सकता।'" वायरल वीडियो में अंबालाल लाल शर्ट में ढोल की थाप पर नाचते दिखे, जबकि उनकी आंखों में दर्द साफ झलक रहा था।
सोहनलाल जैन: गांव की आत्मा
सोहनलाल जैन न केवल एक समाजसेवी थे, बल्कि जवासिया गांव की आत्मा थे। वे स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, और शिक्षक दिवस जैसे आयोजनों में स्कूलों में सक्रिय भागीदारी करते और छात्रों को प्रेरित करते थे। उनकी धार्मिक और सामाजिक सक्रियता ने उन्हें गांव में सम्मानित बनाया। उनकी अंतिम यात्रा में पूरा गांव शामिल हुआ, और बैंड-बाजे के साथ श्मशान घाट तक लोग उन्हें विदा करने पहुंचे। यात्रा के दौरान रामधुन चल रही थी, और अंबालाल का नृत्य देखकर ग्रामीण अचंभित रह गए। यह नजारा भावुक और उत्सवपूर्ण दोनों था, जो सोहनलाल की जीवंतता और उनकी दोस्ती की गहराई को दर्शाता था।
सामाजिक कार्यकर्ता रीना शर्मा ने कहा, "यह कहानी न केवल दोस्ती की गहराई को दर्शाती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि मृत्यु को डर नहीं, उत्सव की तरह अपनाया जा सकता है।" समाजशास्त्री डॉ. संजय वर्मा ने कहा, "सोहनलाल और अंबालाल की कहानी मालवा की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं को दर्शाती है, जहां रिश्ते और वादे सर्वोपरि हैं।"
मंदसौर की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
मंदसौर, जो मालवा और मेवाड़ की सीमा पर बसा है, अपनी समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के लिए जाना जाता है। मंदसौर का पशुपतिनाथ मंदिर और जैन तीर्थस्थल इसे विशेष बनाते हैं। जवासिया गांव में प्रभात फेरी और रामधुन की परंपरा सोहनलाल जैसे समाजसेवियों की देन है, जिन्होंने सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया।
यह कहानी कई सवाल और प्रेरणाएं सामने लाती है:
सांस्कृतिक रूढ़ियां: शव यात्रा में नृत्य को कुछ ग्रामीणों ने असामान्य माना, लेकिन अंबालाल ने इसे वादे के रूप में अपनाया। क्या यह समाज में नई परंपराओं की शुरुआत करेगा?
दोस्ती का मूल्य: आज के दौर में, जहां रिश्ते अक्सर सतही होते हैं, क्या ऐसी दोस्ती प्रेरणा बन सकती है?
मृत्यु का उत्सव: सोहनलाल की तरह मृत्यु को उत्सव के रूप में देखने की सोच को समाज कितना स्वीकार करेगा?
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