मध्य प्रदेश में कंस वध की अनोखी परंपरा, चौराहे पर बिठाकर लाठियों से पीटा जाता है

भारत एक मात्रा ऐसा देश है जिसमे विभिन्न जाती धर्म समुदाय के लोग रहते हैं और इन सबकी अपनी अलग अलग परम्पराएँ है। इन्ही परम्परा में कुछ ऐसी भारत की परम्पराएं जो अनोखी होने के साथ साथ आश्चर्य करने वाली भी है। मध्यप्रदेश के शाजापुर में करीब 269 वर्षों से कंस वधोत्सव की अनूठी परंपरा निभाई जा रही है। घमंड व अत्याचार के प्रतीक कंस मामा के पुतले को कंस चौराहे पर बैठाया जाता है और फिर यहाँ मौजूद लोग कंस वध के बाद लाठियों से पीटते हुए कंस के पुतले को घसीटकर ले जाते हैं।

इस तरह होता रहा आयोजन

इस तरह होता रहा आयोजन

मथुरा में श्रीकृष्ण के मामा कंस के वधोत्सव की परंपरा का निर्वहन प्राचीन समय से किया जाता रहा है। वहीं मथुरा के बाद शाजापुर में करीब 269 वर्षों से यह आयोजन हो रहा है। शाजापुर में यह आयोजन भव्य पैमाने पर किया जाता है। कंस वधोत्सव समिति के संयोजक तुलसीराम भावसार एवं समिति पदाधिकारी अजय उदासी ने बताया कि कंस के पुतले को कंस चौराहे पर बैठा दिया गया है। इस बार कार्तिक माह की दशमी 3 नवंबर को रहेगी और इसी दिन कंस वध किया जाएगा।
समिति संयोजक भावसार ने बताया कि कंस वधोत्सव का कार्यक्रम दशमी पर होता है। दशमी की शाम को कलाकार देव व दानव की वेषभूषा में तैयार होते हैं। इसके पश्चात देव व दानवों का जुलूस निकलता है। यह जुलूस बालवीर हनुमान मंदिर से आजाद चौक में पहुंचेगा। यहां पर रात 11 बजे तक देव व दानवों में चुटीले संवादों का वाक युद्ध होगा। पारंपरिक वेषभूषा में सजे धजे कलाकार देर रात तक वाक युद्ध करेंगे। रात 11 बजे कलाकार आजाद चौक से सोमवारिया बाजार में कंस चौराहा पर पहुंचेंगे। यहां पर एक बार फिर से वाकयुद्ध होगा। इसके पश्चात रात को 12 बजते ही कंस वध किया जाएगा। पारंपरिक वेषभूषा में श्रीकृष्ण बने कलाकार द्वारा कंस के पुतले का वध किया जाकर उसे सिंहासन से नीचे गिराया जाएगा। यहां पर पहले से ही हाथ में लाठी और डंडे लिए हुए तैयार लोग लाठियों से पीटते हुए कंस के पुतले को घसीटते हुए ले जाएंगे।

गवली समाजजनों का किया जाएगा सम्मान

गवली समाजजनों का किया जाएगा सम्मान

समिति संयोजक भावसार ने बताया कि सोमवारिया बाजार में रात 11.45 बजे गवली समाजजनों के पहुंचने पर समाज के वरिष्ठों का साफा बांधकर और पुष्पमाला से स्वागत किया जाएगा। उन्होंने बताया कि विगत दो वर्ष से कोरोना संक्रमण के चलते आयोजन को सीमित किया गया था लेकिन इस बार इसकी तैयारियां वृहद रूप से की जा रही है। नगर में चल समारोह में देवता बनने वाले कलाकार लोगों का अभिवादन करेंगे। वहीं दानवों का रूप धरे कलाकार राक्षसी अट्टहास से सभी को डराएंगे।

कंस वध का महत्व और मान्यताएं

कंस वध का महत्व और मान्यताएं

बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न कंस वध के उत्सव को दर्शाता है। इस विशेष दिन, भगवान श्रीकृष्ण ने 'कंस' की हत्या करके राजा उग्रसेन को भारत के मुख्य शासक बनाया था। कंस वध' का त्यौहार बुराई के अंत और ब्रह्मांड में भलाई के स्थायित्व को दर्शाता है और इसे अधर्म पर धर्म की जीत के रूप में मनाया जाता है। कंस वध कार्तिक महीने में शुक्ल पक्ष के दसवे दिन मनाया जाता है | यह त्योहार दीपावली के बाद आता है | श्री कृष्ण ने अपने माता -पिता और अपने दादा उग्रसेन को बंदी ग्रह से आजाद करने के लिए और मथुरा की प्रजा को कंस के अत्याचारों से मुक्त करने के लिए कंस का वध किया | इस प्रकार अच्छाई की बुराई पर जीत हुई |
इस परंपरा की मान्यता यह है कि भगवान श्री कृष्ण की सेना में छज्जू चौबे शामिल हुए थे और ब्रजवासियों के सहयोग से कृष्ण ने कंस का वध किया था। इसी की याद में यह आयोजन किया जाता है।

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