Dussehra: 'रावण दामाद, मंदोदरी हमारी बेटी....,' मंदसौर में पूरे साल होती है दशानन की पूजा, नहीं होता दहन
Dussehra 2024: मध्य प्रदेश के कई इलाकों में विजयादशमी पर दशानन की पूजा होती है। मंदौसर जिले के कुछ गांवों लोग रावण को दामाद मानते हैं। इसकी वजह से लोग दशानन की पूजा करते हैं।
मंदसौर में रावण की करीब 42 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई है। शहर के खानपुरा में पूजन करने के लिए नामदेव समाज के लोग आते हैं। यहां की महिलाएं घूंघट में आती हैं और जब प्रतिमा के समीप पहुंचती हैं तब घूंघट निकाल लेती हैं। यहां रावण की पक्की बनी प्रतिमा का सांकेतिक वध करते हैं। मंदसौर में लोग पूरे साल रावण की पूजा करते हैं। मंदसौर को पहले दशपुर के नाम से पहचाना जाता था।

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पौराणिक मान्यता है कि यहां रावण के पैर में धागे बांधने से बीमारियां दूर होती हैं। रावण को बाबा कहकर पूजते है। धागा दाहिने पैर में बांधे जाते हैं। साथ ही क्षेत्र की खुशहाली, समाज सहित शहर के लोगों को बीमारियों से दूर रखने, प्राकृतिक प्रकोप से बचाने के लिए प्रार्थना करते हुए पूजा-अर्चना की जाती है। दशहरे के दिन यहां नामदेव समाज के लोग जमा होते हैं और पूजा-पाठ करते हैं।
उसके बाद शाम के समय राम और रावण की सेना निकलती है। रावण के वध से पहले लोग रावण के सामने खड़े होकर क्षमा-याचना करते हैं। इस दौरान लोग कहते हैं कि आपने सीता का हरण किया था इसलिए राम की सेना आपका वध करने आई है। रावण के 10 मुख होते हैं लेकिन यहां 9 मुख ही हैं और बुद्धु भ्रष्ट होने के प्रतीक के रूप में मुख्य मुंह के ऊपर गधे का सिर लगाया गया है।
नामदेव समाज मंदसौर के सचिव राजेश मेडतवाल ने ये बताया कि रावण के बारे में लोग बुराइयों की बात करते हैं लेकिन वह प्रकांड पंडित थे, ज्ञानी थे, आयुर्वेद का अच्छा ज्ञान था इसलिए उनकी पूजा की जाती है। उन्होंने आगे कहा कि रावण मंदसौर के जमाई माने जाते हैं। प्राचीन शहर मंदसौर दशपुर के नाम से जाना जाता था और दशपुर से मंदोदरी का संबंध माना जाता है।

नामदेव समाज मंदसौर के सचिव ने जानकारी दी की आधार मानते हुए हम रावण की पूजा करते हैं। रावण के पैर में कलावा बांधा जाता है जिसके पीछे मान्यता है कि जो बुखार आता है, वह ठीक हो जाता है। मेडतवाल आगे बताते हैं कि पैर में धागा बांधने को लेकर ये भी है कि जितनी मन्नतें होती हैं, वो पूरी हो जाती हैं। हमने हाथ जोड़कर विनती की है कि हम शाम को राम की सेना के साथ आएंगे, युद्ध लड़ेंगे और बुराई पर अच्छाई की जीत होगी।
एक श्रद्धालु प्रतिभा बताती है कि जब छोटे बच्चे डरते हैं तब उन्हें यहां का धागा बांधा जाता है। धागा बांधे जाने के बाद वे डरते नहीं है। वहीं, प्रमोद नामदेव ने बताते हैं कि वे साल 1992 से ही यहां आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों की भी मान्यता थी कि रक्षा बांधने से अपने नगर और अपने परिवार में सुख शांति रहती है। मुझे यहां आते-आते 32 साल हो गए हैं।
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