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ह‍िन्‍दुस्‍तान में दो पीठ वाले ऊंट! रेग‍िस्‍तान के बजाय बर्फ में रहते हैं, क्या अपने देखा है कभी?

सागर, 27 जुलाई। ऊंट भी रेयर या दुर्लभ हो सकते हैं? रेग‍िस्‍तान के बजाय क्‍या बर्फ में रह सकते हैं? इनकी दो पीठ (double hump) हो सकती हैं? जाह‍िर है ये सवाल आपको सोचने पर मजबूर कर देंगे। तीनों सवालों के जवाब यद‍ि हां में म‍िले तो आश्‍चर्य होगा, लेकिन यह सच है। ह‍िन्‍दुस्‍तान का एक इलाका ऐसा है जहां दो पीठ वाले रेयर प्रजात‍ि के ऊंट पाए जाते हैं, वह भी बर्फीले मैदानों और बर्फ से ढंके पहाड़ों पर म‍िलते हैं।

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    ह‍िन्‍दुस्‍तान की नुब्रावैली में दो पीठ वाले दुर्लभ ऊंट! बर्फ में रहते हैं, आप देखे हैं कभी...

    बैक्‍ट्र‍ियन केमल ऊंट की बाहरी प्रजात‍ि है

    बैक्‍ट्र‍ियन केमल ऊंट की बाहरी प्रजात‍ि है

    डबल हम्‍प अर्थात दो पीठ या दोहरी कूबड वाले ऊंट का वैज्ञान‍िक नाम "बैक्‍ट्र‍ियन केमल" है। हमारे यहां इसे लद्दाखी ऊंट भी कहते हैं। यह मध्‍य एश‍िया में पाया जाता है। यह मूलत: मंगोल‍िया, कजाक‍िस्‍तान, चीन और गोबीडेसर्ट की मूल प्रजात‍ि है। भारत में यह ऊंट गुलाम भारत के भी पहले अफगान‍िस्‍तान और मंगोल‍ियां के व्‍यापार‍ियों के साथ आए थे, लेक‍िन वापस नहीं जा पाए। बाद में इन्‍हें लद्दाख में खेती के काम में उपयोग क‍िया जाने लगा।

    इन पर सफारी का आनंद भी ल‍िया जा सकता है

    इन पर सफारी का आनंद भी ल‍िया जा सकता है

    नुब्रा घाटी में डबल हम्‍प वाले ऊंटों को पर्यटन के ल‍िए भी उपयोग क‍िया जाता है। इन ऊंटों पर सैलानी बैठक सफारी का आनंद भी लेते हैं। इनकी पीठ पर एक से तीन लोग तक बैठ सकते हैं। करीब 18 हजार फीट की ऊंचाई पर दुर्गम रास्‍तों पर ये आवागमन का सबसे अच्‍छा साधन हैं। इनके शरीर पर लंबे और झबरीले बाल होते हैं, साल में एक बार इनके बाल काटे भी जाते हैं।

    नुब्रावैली में ही क्‍यों पाए जाते हैं

    नुब्रावैली में ही क्‍यों पाए जाते हैं

    लद्दाख की नुब्रा बैली लेह से करीब 150 क‍िलोमीटर दूर है। यह स‍ियाचीन ग्‍लेश‍ियर से लगा हुआ इलाका है। यहां साल के अध‍िकांश समय मौसम बर्फीला और ठंडा रहता है। शीतल नद‍ियों, ऊंची पहाडी श्रंखला और बर्फीले मैदानों में प्रकृतिक सौंदर्य व लुभावने-मनमोहन प्राकृत‍िक सौंदर्य में यह धरती का स्‍वर्ग प्रतीत होता है। यही वह इलाका है जहां डबल हम्‍प वाले ऊंट आसानी से मैदानों में द‍िखते हैं। सैकडों साल पहले जब ये ऊंट व्‍यापार‍ियों के साथ यहां आए तो क‍िसी कारणवश वापस नहीं जा पाए और यहीं के होकर रह गए। इनकी संख्‍या भी बढी और स्‍थानीय लोगों ने इन्‍हें अपना ल‍िया।

    अफगान‍िस्‍तान व मंगोल‍िया से आए थे, वापस नहीं जा पाए

    अफगान‍िस्‍तान व मंगोल‍िया से आए थे, वापस नहीं जा पाए

    लद्दाख की नुब्रा वैली दुर्लभ ऊंटों के ल‍िए जानी जाती है। यहां दो पीठ (double hump) वाले ऊंट पाए जाते हैं। गर्म और रेग‍िस्‍तान में रहने वाले ऊंट यहां बर्फीले मैदान और पहाडों पर म‍िलते हैं। इनका उपयोग सैलान‍ियों को घुमाने के साथ ही खेती व बार्डर सेक्‍युर‍िटी में क‍िया जाता है। बताया जाता है कि गुलाम भारत के पहले अफगान‍िस्‍तान और मंगोल‍िया की तरफ से व्‍यापारी इन्‍हें लाए थे।

    सेना में उपयोग के ल‍िए ऊंटों पर लंबा र‍िसर्च भी क‍िया है

    सेना में उपयोग के ल‍िए ऊंटों पर लंबा र‍िसर्च भी क‍िया है

    भारतीय सेना में दो कूबड वाले ऊंटों की भर्ती को लेकर सेना ने पहले इन पर लंबे समय तक र‍िसर्च भी कराया है। दुर्गम इलाकों में ये सेना के उपयोग में क‍िस तरह और क‍िस प्रकार आ सकते हैं, इनकी वजन उठाने की क्षमता, मौसमी पर‍िस्‍थ‍ित‍ियों में सहनशीलता, इनकी बीमार‍ियां, खान-पान, बगैर खाए-प‍िए क‍ितने द‍िन रह सकते हैं, इस पररक्षा अनुसंधान व‍िकास संगठन ने लंबी र‍िसर्च की गई है।

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