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मिसालः बबीता के हौसले ने बदल दी तस्वीर, चीरा पहाड़ का सीना, अग्रौठा का सूखा खत्म

बुंदेलखंड के छतरपुर जिले के अग्रौठा गांव की बबीता राजपूत बिहार के दशरथ मांझी की तरह पहाड़ का सीना चीरकर माउंटेन गर्ल बन गईं हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें रियल हीरो अवाॅर्ड से नवाजा है।

बबीता राजपूत/ Babita Rajput

बिहार के माउंटेंन मैन दशरथ मांझी की तरह बुंदेलखंड में महज 19 साल की बबीता राजपूत ने सहेलियों संग मिलकर पहाड़ का सीना चीर डाला। छतरपुर जिले का अग्रौठा गांव सदियों से सूखे की मार झेल रहा था, पानी के लिए यहां महिलाएं संघर्ष करती रही हैं, लेकिन बबीता और सहेलियों की अथक मेहनत से गांव का सूखा तालाब अब गर्मी में भी लबालब भरा रहता है। अब बबीता को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रियल हीरो सम्मान से नवाजा है।

बबीता राजपूत ने पानी के लिए पहाड़ का सीना चीरकर खोदी नहर

मध्य प्रदेश में बुंदेलखंड इलाके के छतरपुर जिले का अग्रौठा गांव काफी पिछड़ा और सूखाग्रस्त इलाका रहा है, लेकिन अब इस गांव में पानी की रत्तीभर भी समस्या नहीं है। इसका श्रेय इस गांव की बेटी बबीता राजपूत और उनकी सहेलियों मेहतन का नतीजा है। महज दो साल में उनके गांव की तकदीर बदल गई और भीषण सूखे से जूझने वाला गांव पानीदार हो गया। दरअसल 19 वर्षीय बबीता ने महज 17 साल की उम्र में परमार्थ समाजसेवी संस्था से मिले मार्गदर्शन के बाद गांव के आसपास के नालों पर चेकडैम बनाए, पानी आया तो उनका हौसला बढ़ा और फिर सूखे तालाब को भरने के लिए पहाड़ का सीना चीरने और नहर बनाकर पहाड़ का पानी तालाब में लाने का मिशन शुरू किया था।

बबीता राजपूत ने पानी के लिए पहाड़ का सीना चीरकर खोदी नहर

बबीता और उनकी सहेलियों को जल सहेलियां पुकारा जाता है
मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड से लेकर छतरपुर जिले के बुंदेलखंड में परमार्थ समाजसेवी संस्था सहित महिलाओं के कई समूह काम कर रहे हैं। इनमें महिलाएं जल संरचनाओं को पुनर्जीवित करने में आशातीत सफलता प्राप्त की है। इन महिलाओं को जल सहेलियां नाम से पुकारा जाता है। पूर्व में छतरपुर की महिलाओं को देश की राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू सम्मानित कर चुकी हैं।

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    बबीता ने पानी के लिए महिलाओं को पिटते देखा, तभी से टीस थी
    बबीता ने स्थानीय मीडिया से चर्चा के दौरान अपने मिशन माउंटेन को लेकर जानकारी में बताया था कि उनके गांव में लड़कियों को ज्यादा पढ़ाई-लिखाई की अनुमति नहीं दी जाती, कम उम्र में विवाह कर दिया जाता है। पानी के लिए दो-दो किलोमीटर दूर से सिर पर चार-चार घड़े रखकर पानी लाना पड़ता था। देरी होने पर पति से पिटते हुए महिलाओं का दर्द नजदीक से देखा है। वे खुद पानी के लिए मां के साथ संघर्ष करती रही हैं। उस समय ही पानी की समस्या से निपटने को लेकर कुछ करने की इच्छा जाग्रत हो गई थी। परमार्थ संस्था के डाॅ. संजय सिंह और मानवेंद्र सिंह ने प्रशिक्षण देकर राह दिखाई तो गांव की कुछ महिलाओं को जागरूक कर उनको संग लेकर आगे बढ़ गई थीं। लोग पिता से कहते थे, तुम्हारी बेटी पागल हो गई है, लेकिन अब गांव वाले सम्मान देते हैं।

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